Thursday, November 16, 2017

Kati Patang (कटी पतंग)

                        कटी पतंग

पहाड़ी की उस ऊँची ढ़लान पर बनी इकलौती पगडंडी पर सोनू की साईकिल हवा से बातें करते हुए लगभग फिसलती हुई नीचे जा रही थी और पास ही पहाड़ी के दूसरी तरफ उसका घर था।
पगडंडी के दोनों तरफ जंगल था जहां चीड़ के पौधे काफी दूर-दूर तक घने मालूम पड़ते थे पर सोनू कभी उन जंगलों में नहीं जाता था क्योंकि उसकी मम्मी कहती थीं उन जंगलों में भूखे भेड़ियों के साथ साथ और भी कई सारे खतरनाक जानवर रहते थे।
सोनू को अपनी साईकिल से पहाड़ी पर बनी उस पतली पगडंडी पर से चढ़ना और उतरना बहुत अच्छा लगता था।पगडंडी खत्म होती थी नीचे मेन रोड पर जो बजार और दूसरे शहरों की ओर जाती थी।
सोनू अपने मम्मी-पापा के साथ इससे पहले कई बार बजार गया था।हलांकि अकेले वो आज पहली बार अपनी साईकिल से जा रहा था।
अपनी धुन में मस्त सोनू फिल्मी गीत गुनगुनाते हुए और हवा से बातें करते हुए बजार की ओर बढ़ रहा था।
हवा की दिशा सोनू की ठीक उल्टी थी और तेज हवा जैसे उसके कानों में गुनगुनाते हुए जा रही थी।
हवा के तेज थपेड़े मानों उसके गालों को सहलाते हुए उसे गुड लक कह रहे थे।
कल सोनू का पंद्रहवां जन्मदिन था।और ये दिन सोनू के लिए बहुत खास था।
सोनू को पतंग उड़ाना बहुत पसंद था पर उसके गाँव में ये परम्परा थी कि लड़के अपने पंद्रहवें जन्मदिन पर अपनी पतंग खुद खरीदने जाते थे और उसी दिन पतंग उडा़ते थे।
हालांकि ये परम्परा कई सालों पहले ही बंद हो गयी थी पर सोनू के लिए ये खुशी की बात थी क्योंकि आज तक उसने पतंग नहीं उडा़यी थी।
बचपन में वो अपने भाई रवि और उसके दोस्तों को पतंगबाज़ी करता देख बहुत खुश होता था।ओर जब वो उनसे पतंग माँगता तो उसे चिढा़ने लगते और रवि तो उसे डाँट कर भगा देता था।
भागकर वो सीधे दादाजी के पास जाता था और जब वो उन्हें पूरी बात बताता तो वो हँसते और कहते,"एक दिन तू खुद अपने लिए पतंग लेने जायेगा।"
और तभी उन्होंने उसे इस पुरानी परम्परा के बारे में बताया था।
पिछले कुछ सालों में मोबाइल और कम्प्यूटर ने पतंगबाज़ी के दौर पर पूर्ण विराम लगा दिया था।
लेकिन सोनू को अभी भी पतंगबाज़ी का शौक था।वो खुश था कि कल अपनी पहली पतंग उडा़येगा।
यही सब सोंचते हुये वो अपने गाँव से काफी दूर निकल आया था।
उसके पैर अब भी साईकिल के पैडलों पर जमे थे।और साईकिल तेजी से उस सड़क पर फिसलती जा रही थी।
पहाड़ी इलाकों को पार करने के बाद वो शहर में पहुंच गया।आज पहली बार सोनू अकेला इतनी दूर आया था वरना आज से पहले वो सिर्फ अपने पापा के साथ ही बाजार गया था।पर अब सोनू बडा़ हो चुका था हालांकि उसके मम्मी-पापा को इस बात पर कतई यकीन न था लेकिन सोनू का यही मानना था।
खैर आज तो वो अपने लिए एक अच्छी सी पतंग और एक अच्छा माँझा खरीदने आया था।और इसीलिए उसकी नजरें आसपास के दुकानों में किसी पतंग की दुकान को खोजने में लगी थीं।
सोनू को उसके स्कूल के लड़कों नें बताया था कि पहाड़ी के नीचे शहर के बाजार में एक दुकान थी पतंग की हालांकि उन्होंने उसे चेतावनी भी दी थी कि वो इकलौती बची पतंग की दुकान थी।
खैर फिलहाल सोनू की नजरें बेचैनी से अपने चारों ओर उस दुकान को तलाशने में जुटी थीं।
उसने साईकिल की रफ्तार एकदम धीमी कर ली थी ताकि आसानी से वो उन दुकानों में अपनी मनपसंद पतंग की दुकान देख ले।
काफी दूर तक चलने पर भी उसे वो पतंग की दुकान नहीं मिली।लेकिन वहां सड़क के आखिरी छोर पर एक मिट्टी के खिलौनों की छोटी सी दुकान सजी हुई थी।जहाँ एक बूढ़ा आदमी जमीन पर टाट बिछा कर बैठा था और उसके सामने दूसरे टाट पर मिट्टी से बने छोटे-छोटे कई खिलौने थे।जैसे मिट्टी के बने हुए हाथी, घोडे़, ऊंट, बन्दर, शेर और भिन्न-भिन्न आकार के मिट्टी के गुल्लक।
सोनू की नजरें अब भी आस-पास उस पतंग की दुकान को खोजने में व्यस्त थी।तभी उसकी नजर उस बूढ़े बाबा पर पड़ी जो मिट्टी के खिलौने बेंच रहे थे उनके चेहरे पर झुर्रियों और चोट के निशानों की भरमार थी और  उन्होंने एक पुराना सा कुर्ता और पैजामा पहना हुआ था।जो काफी गंदा लग रहा था। आज शायद उनका एक भी खिलौना नहीं बिका था लेकिन फिर भी उनके चेहरे पर जरा सी भी झुंझलाहट नहीं दिखाई दे रही थी।सोनू उनके गंदे कपडों को देख कर नाक सिकोड़ने लगा।
खैर तभी उनकी नजर भी सोनू पर पड़ी
"अरे बबुआ इधर आओ"
अचानक उनके इस तरह बुलाने से सोनू जरा सकपका गया।जैसे वो कोई गलती करता पकड़ा गया हो।
खैर उस बूढ़े बाबा ने आगे बोलना जारी रखा।
"अरे उधर काहे खड़े हो बबुआ इधर आऔ और देखो यहां कितने अच्छे-अच्छे खिलौनें हैं।ये देखो हाथी, ये घोड़े,ये बंदर और भी देखो यहां कितने सारे खिलौने हैं।"
उन्होंने एक-एक खिलौना उठाकर दिखाते हुए कहा।पर सोनू अनमने ढंग से थोड़ा आगे बढ़ा और बोला-
"नहीं बाबा मुझे ये सब नहीं चाहिए"
सोनू के मना करते ही बेचारे उस बूढ़े का चेहरा उतर गया।लेकिन अगले ही पल उन्होंने एक मिट्टी का गुल्लक उठाया।
"कोई बात नहीं बबुआ ये गुल्लक ही ले लो देखो कितने सारे रंग बिरंगे गुल्लक हैं यहाँ"
कहते हुए उनकी आंखों में एक चमक आ गयी थी।
लेकिन एक बार फिर सोनू की इंकार से उनके चेहरे पर निराशा का भाव आ गया।लेकिन फिर उसने सोनू से उसके बाजार आने की वजह पूछी और सोनू ने सब बता दिया।
"तुम एक पतंग खरीदने के लिए अकेले ही इतनी दूर चले आये"
"हां बाबा मेरे दोस्तों ने कहा था कि यहाँ पतंग की कोई दुकान थी लेकिन मुझे कहीं नहीं मिली"
बूढ़े बाबा के चेहरे पर एक अजीब सी चमक आ गयी।
"बहुत अच्छा लगा सुनकर कि तुम्हें पतंग उड़ाने का शौक है वर्ना आजकल के छोकरे तो बस बीडीओ गेम खेलना ही जानते हैं।आजकल कौन यहां पतंग और पतंगबाजी का शौक रखता है हमारे जमाने में तो न बीडीओ गेम हुआ करता था न ये मुआ टेलीफोन और तब के जमाने में बच्चे तो बच्चे बड़े-बूढ़ों को भी पतंगबाजी का शौक चढ़ा रहता था।आज भी वो दिन याद आते हैं तो मन प्रसन्न हो जाता है।एक समय हुआ करता था जब बड़े-बड़े राज्य के राजा-महाराजाओं में पतंगबाजी की प्रतियोगिता होती थी और एक अब का समय है जब ये बित्ते भर के छोकरे हाथ में मोबाइल लिए टुनटुनाते फिरते हैं।"
"हुम्म्!"
सोनू को उस बूढ़े बाबा की बातें अच्छी लग रही थी और वो उनकी हां में हां मिलाये जा रहा था।
"एक काम करो बबुआ ई जो बगल में रास्ता गया है इसे पकड़ लो और सीधे चलते जाओ जब आखिरी घर के पास पहुंचोगे तो वहीं सामने एक बहुत पुरानी पतंग की दुकान होगी।वहाँ एक बूढ़ा आदमी बैठता है देख लेना शायद तुम्हें वहां कोई अच्छी पतंग मिल जाये।लेकिन दुकान काफी पहले थी पता नहीं अब है या बंद करके वो कहीं चला गया।देख लो शायद मिल जाये।"
"अच्छा बाबा चलता हूँ।थैंक्यू!"
उसने उस बूढ़े बाबा को आभार प्रकट किया और जल्दी से अपनी साइकिल पर बैठ कर उनके बताए रास्ते पर चल पड़ा।जो असल में एक संकरी गली थी।
गली के दोनों ओर काफी पुराने मकान बने थे और एकाध किरने की दुकानें भी थीं।
अपनी साईकिल पर बैठा सोनू तेजी से पैडल मारे जा रहा था।और आखिरकार एक जगह जाकर वो गली खत्म हो गयी।सोनू ने साईकिल रोक दिया और उसने बायीं ओर नजर घुमायी वो एक पुरानी टूटी-फूटी दुकान थी या मकान थी कुछ भी कहना मुश्किल था पर इतना पक्का था कि वहाँ पतंग मिलती थी क्योंकि सामने की दीवार पर हिंदी के बड़े-बड़े अक्षरों में साफ-साफ लिखा था 'पतंग की दुकान'।
उसने साईकिल को स्टैंड पर खड़ा किया और फिर धीरे-धीरे उस मकान की ओर बढ़ा जिसमें लकड़ी का एक बड़ा लेकिन पुराना दरवाजा लगा था जो अभी खुला हुआ था।उसने अंदर झांक कर देखा पर अंदर कोई नहीं था।सोनू उस मकान के दरवाज़े पर रुक गया।फर्श पर अभी-अभी झाड़ू लगाया गया था लेकिन सामने की दीवार पर लगे मकड़ी के जाले और पास रखी धूल खाती कुर्सियां ये बताने के लिए काफी थीं कि यहाँ काफ़ी दिनों से कोई साफ-सफाई नहीं हुई थी।मकान की छतों में कई जगहों पर बड़ी दरारें पड़ चुकी थीं और दीवारों का रंग भी उजड़ चुका था।बायीं ओर एक बड़ी सी लकड़ी की अलमारी थी थी जिसके दो रैक पतंगों से भरे हुए थे और उन पर जमी हुई गाढ़ी धूल की पर्त ये बता रही थी कि काफी दिनों से उन पतंगों को किसी ने हाथ भी नहीं लगाया था।
अभी वो ये सब देख ही रहा था कि एक बूढ़ी मगर रौबदार आवाज उसके कानों में पडी़।
"कौन है?क्या काम हैं?"
सोनू ने पलट कर उस आवाज की र देखा और तब उसे महसूस हुआ कि आवाज की तरह उसका मालिक भी काफी रौबदार था और अगर सोनू ने उसे पतंग की दुकान पर न देखा होता तो वो उन्हें आर्मी का कोई अफसर समझ बैठता।
रौबदार चेहरा बड़ी और नुकीली मूंछें सामान्य से बड़ी नाक और हल्की दाढ़ी और बालों की जगह चमकदार गोल चाँद वाकई में उनके आर्मी आफिसर होने का दावा कर रहा था।सोनू ने उनकी उम्र का अंदाजा लगाने की कोशिश की और काफी जद्दोजहद के बाद उसने उनकी उम्र साठ के करीब मान लिया।
और इससे पहले की सोनू कुछ कहता चौड़ी छाती पर तनी सफेद हुई शर्ट और काटन की पैंट पहने उस बूढ़े आदमी ने आगे फिर कहना शुरू किया।
"देखो बच्चे अगर तुम फिर किसी मंदिर और मस्जिद के नाम पर चंदा मांगने आये हो तो साफ-साफ सुन लो मैं कोई चंदा नहीं देने वाला।"
उसने गुस्से में सोनू को घूरा।
"अ.... म.... मैं कोई चंदा मांगने नहीं आया।मुझे बस एक पतंग खरीदनी है।"
सोनू के मुंह से पतंग खरीदने की बात सुन कर वो उसे ऐसे देखने लगे मानों उन्होंने कुछ अनहोनी देख ली हो।और उनके इस अजीब से बर्ताव से सोनू कुछ सकपका सा गया।
और फिर अगले ही ल वो अजीब ढंग से मुस्कुराये और जवाब में सोनू ने भी मुस्कुरा दिया।खैर फिर वो बूढ़े बाबा अपनी अलमारी की ओर मुड़े जहाँ ढे़र सारी पतंगें रखी थीं।
सबसे पहले उन्होंने उन पतंगों पर लगी धूल साफ की और तुरंत ही खांसने लगे।और ये देख कर सोनू ने मुस्कुरा दिया।
"अ...अरे अब काफ़ी दिनों से यहां कोई बच्चा पतंग खरीदने तो आया नहीं था तो पडे़-पडे़ इन पर धूल जम गयी।"
"अच्छा!अभी गली के बाहर मिट्टी के खिलौने वाले बाबा भी यही कह रहे थे"
"क्या कह रहे थे?"
पतंग वाले ने उस कनखियों से देख कर पूछा।
"अ...यही कि आज कल के बच्चे सिर्फ मोबाइल फोन और विडियो गेम्स ही खेलते हैं पतंग कोई नहीं उडा़ता।"
"हुम्म्!"
पतंग वाले बाबा ने उसकी हाँ में हाँ मिलाया।
"तो तुम्हें पतंग का शौक कैसे लग गया!"
उन्होंने सोनू को काफी सारे पतंग दिखाते हुए पूछा।
"अ...मुझे तो बचपन से ही पतंग उड़ाना बहुत पसंद था लेकिन आज मैं पहली बार पतंग लेने आया हूँ।"
"अच्छा!"
सोनू एक-एक करके काफी सारी पतंगें उलटता-पलटता चला गया पर उसे कोई भी पतंग पसंद नहीं आ रही थी।
अभी सोनू पतंगें उलट-पुलट कर देख ही रहा था कि तभी उसकी नजर अलमारी के सबसे ऊपरी रैक में सबसे अलग और एकदम साफ-सुथरे पतंग पडी़।नीले रंग की उस पतंग को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे सिर्फ उसी पतंग को रोज साफ किया जाता था।
देखने में पतंग पुरानी लग रही थी फर सोनू को वो पतंग काफी पसंद आ गई।
"बाबा वो पतंग उठा दीजिए"
सोनू ने उसी पतंग की ओर इशारा करके कहा।पहले तो पतंग वाले ने उस पतंग को देखा और फिर सोनू को घूरने लगा।उनका ये बर्ताव सोनू को बहुत अजीब लगा।
"नहीं बच्चे वो पतंग बेचने के लिए नहीं है कोई और पतंग ले लो"
"पर मुझे वो पतंग ही अच्छी लगी प्लीज उसे दे दीजिए"
"नहीं बच्चे मैंने कहा न वो पतंग बेचने के लिए नहीं है"
"लेकिन क्यों?आप उसके ज्यादा पैसे ले लीजिए"
सोनू के इतना कहते ही वो उसे गुस्से से घूरने लगे।
" वो पतंग बेचने के लिए नहीं है चाहो तो दूसरी ले लो एक पतंग के साथ दूसरी फ्री लेकिन वो पतंग नहीं बिकेगा।"
"मुझे दूसरी पतंग नहीं चाहिए।"
कहकर सोनू वापस मुडा़ और साइकिल की तरफ बढ़ गया।साइकिल के पास पहुंच कर सोनू फिर से पीछे मुड़ा और उनकी ओर देखने लगा पर वो चुपचाप अपनी सारी पतंगें अलमारी में वापस रख रहे थे।
सोनू उदास मन से साईकिल पर बैठकर चल पड़ा।वो अब भी उसी पतंग के बारे में सोंच रहा था।कितनी सुंदर पतंग थी वो काश उसे मिल जाती।
अभी सोनू कुछ दूर चला ही था कि उसे लगा पीछे से किसी ने उसे आवाज दी थी।
सोनू ने वापस पलटकर देखा और पाया कि उसे वही पतंग वाले बाबा बुला रहे थे और इस बार वो नीली पतंग उनके हाथ में थी।
कितनी खूबसूरत पतंग.....
सोनू ने अपनी साईकिल घुमाई और वापस पतंग की दुकान में गया।
"वैसे तो मैं ये पतंग किसी भी कीमत पर नहीं बेंचने वाला था पर फिर भी मैं ये तुम्हें एक शर्त पर दे दूंगा वो भी मुफ्त में"
ये सुन कर सोनू का चेहरा एकदम से खिल उठा।और इससे पहले कि सोनू कुछ बोलता उन्होंने फिर से कहा।
"तुम्हें बस एक किस्सा सुनाना चाहता हूँ!बोलो सुनोगे?"
सोनू इसके लिए झट से तैयार हो गया।

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लगभग थोड़ी देर बाद सोनू एक कुर्सी पर बैठा था और उसके सामने रखी दूसरी कुर्सी पर वही बूढ़ा पतंग वाला बैठा था।उन्होंने सोनू को चाय का मग पकड़ाया।
"लो बच्चे चाय पीते हुए सुनो"
सोनू ने थोड़ा सकुचाते हुए चाय का मग ले लिया।
"अर्...सुनो बच्चे बचपन में मैं अपने दादा के साथ पहाड़ी के पीछे वाले गांव में रहता था और उनके अलावा मेरा कोई न था।वैसे तो मेरा नाम हरीश चतुर्वेदी था पर सब मुझे बुन्नू कहकर बुलाते थे।"
और फिर एक पल के लिए वो खामोश हो गये लेकिन फिर उन्होंने सोनू को अपनी आपबीती सुनाना जारी रखा और खुद धीरे-धीरे उन्हीं यादों में डूबते चले गये।उस दिन की हर घटना उनके जेहन में तरोताज़ा हो चली।सोनू भी ध्यान से सुन रहा था।
"यही कोई आजादी के चार-पांच साल बाद की बात है।उस दिन मौसम बहुत ही सुहाना था और हम पहाड़ी के ऊपर पतंगों की पेंच-लडा़ई देख रहे थे।मेरे साथ मेरे ही गांव के कुछ और भी बच्चे थे जो मेरी ही तरह पतंग खरीदने में असमर्थ थे पर वो दूसरों को पतंग उड़ाते देखकर ही खुश हो जाया करते थे।मेरे घर की भी माली हालत कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी उन दिनों और इसीलिए मैं भी अपने दादाजी से कभी कोई मांग नहीं करता था।
लेकिन मुझे भी रंग-बिरंगे पतंग बहुत अच्छे लगते थे। खैर हर रोज की तरह हम उस दिन भी और बच्चों की पतंगबाजी देख रहे थे कि तभी मेरी नजर उस नीले पतंग पर पड़ी जो खुले आकाश में किसी चील की तरह शान से लहरा रही थी।एक ही पल में वो पतंग मुझे इतनी भा गई कि मैं उसके लिए कुछ भी दे सकता था।मैं सोंचने लगा काश वो पतंग मेरी हो जाती तो मैं उसे कभी अपने से अलग न करता हमेशा उसे अपने पास रखता।मेरी प्यारी नीली पतंग...."
सोनू ने उस पतंग को ध्यान से देखा और सोंचने लगा कि कैसे कुछ देर पहले वो भी इसी पतंग के लिए बिल्कुल यही सोच रहा था।खैर उन्होंने आगे कहना जारी रखा।
"अभी मैं उस पतंग को पाने के बारे में सोच ही रहा था कि तभी अचानक वो पतंग कट गयी।मेरे आसपास खड़े बाकी सारे बच्चे पतंग लूटने उसके पीछे दौड़ पड़े।एक पल के लिए तो मैं हैरान खड़ा रहा पर अगले ही पल मैंनें भी उन्हीं बच्चों के साथ दौड़ लगा दी।हवा दक्षिण दिशा की ओर तेजी से चल रही थी और पतंग काफी ऊपर थी।पर हम सब उस पतंग के लिए बिना कुछ सोचे समझे दौड़ते जा रहे थे।
वैसे तो मैं बाकी सारे बच्चों से हमेशा पीछे रहता था पर आज न जाने क्यों मुझे खुद के अंदर एक नयी ऊर्जा का संचार होता मालूम हो रहा था।कुछ ही देर में मैं बाकी बच्चों से काफी आगे निकल आया था और वो सब कितने ही पीछे छूट गये थे।पतंग हवा में बार-बार गोते लगाते हुए दूर उड़ती चली जा रही थी।मुझ पर वही पतंग लेने का जुनून सा चढ़ गया था शायद इसीलिए मैंने उस जंगल को देखा ही नहीं और सीधे उस जंगल में ही अंदर और अंदर घुसते चला जा रहा था।बाकी सारे बच्चे शायद वापस लौट गये थे क्योंकि हमनें उस जंगल के बारे में बहुत सी अफवाहें सुन रखी थीं।
खैर मैं इस वक्त जंगल में ही दौड़ रहा था और मुझे इसका तनिक भी अंदाजा नहीं था कम से कम तब तक तो बिल्कुल नहीं जब तक कि वो पतंग झाड़ियों में न फंस गयी।
पतंग मेरे सामने थी और मैं बहुत खुश था पर मैं अपने घुटनों पर झुका हुआ हांफ रहा था।मेरी सांसें बहुत तेजी से चल रही थीं।उस समय पहली बार मेरा ध्यान आसपास के माहौल पर गया और मेरा दिल धक्क रह गया।मैं बार्डर पार करके पाकिस्तानी सीमा घुस आया था।मैं ये जगह पहचानने में कोई गलती नहीं कर सकता था ये बार्डर पार का इलाका था और पास ही लगे उस तख्ते ने भी मेरी रही-सही शंका दूर कर दी जिस पर उर्दू भाषा में कुछ लिखा हुआ था।
उस वक्त मैं डर के मारे कांप रहा था और और मेरा दिल जोरों से धकधक कर रहा था।एक ही पल में हजारों आशंकाओं ने मुझे घेर लिया।मैंने अपने बाबा से उन पाकिस्तानी फौजियों की क्रूरता और बर्बरता के बारे में काफी किस्से सुने थे और इस वक्त उन्हें याद करके मेरे पाँव जमीन से उखाड़े जा रहे थे।मैं शेर की मांद में फंसे उस खरगोश की तरह कांप रहा था जिसे पता था कि यहाँ वो शेर कभी भी वापस आ सकता था।इस समय मैं उस पतंग के बारे में पूरी तरह भूल गया था जिसके चक्कर में मैं इस मुसीबत में फंसा हुआ था।
और अगले ही पल वो हो गया जिसका मुझे डर था।पीछे से किसी की जोरदार आवाज आयी।
"कौन है बे?"
मैंने डरते-डरते पीछे देखा वो करीब छः फुट का गठीले बदन वाला तगड़ा पाकिस्तानी फौज का सिपाही था।बड़ी दाढ़ी और मूंछों के जगह पर सपाट चेहरा और उसके आंखों के नीचे बना एक पुराने जख्म का निशान उसे और भी खूंखार बना रहा था।
खैर उसने एकबार फिर उसने घुड़ककर पूछा।
"कौन है बे छोकरे और यहां क्या लेने आया है?"
मैं इस बार भी डरा और चुप रहा।और मेरी चुप्पी उसके गुस्से को और भी भड़का रही थी।वो एक बार फिर गुस्से में दहाड़ उठा।
"गूंगा है छोकरे मुंह में जबान नहीं है तेरे?"
और इसबार मैंने अपनी खैरियत समझते हुए हां में सिर हिला दिया तब जाकर कहीं वो फौजी थोड़ा नर्म पड़ने लगा।
"अच्छा तू गूंगा है इब ये बोल तू यहां कैसे आ गया और घर कहाँ है तेरा?"
मैंने थोड़ी हिम्मत जुटाते हुए नीचे एक गांव की ओर इशारा कर दिया जो पाकिस्तान में ही था।गनीमत थी की मैं इस समय बार्डर से काफी दूर था वर्ना आज मेरा क्या हश्र होता सोचकर ही मेरी रूह कांप उठी।
"अच्छा तो तू नीचे गांव का है।चल अब मेरे साथ चल चौकी तक"
उसके चौकी चलने की बात सुनकर मेरे तो बस होश फख्ता हो गये।लेकिन मरता क्या न करता मुझे उसके पीछे-पीछे चलना पड़ा।वो आगे-आगे चल रहा था और मैं पीछे-पीछे।हम पहाड़ी से उतर रहे थे और मेरी नजरें चारों ओर दौड़ रही थीं।मैं बस किसी भी तरह वहां से भागना चाहता था लेकिन मुझे मालूम था कि अगर उसे जरा सा भी शक हुआ तो वो मेरा गला काटने से भी नहीं कतरायेगा।
खैर थोड़ी ही देर में हम पाकिस्तानी आर्मी के बेस कैम्प में खडे़ थे।वहां करीब आठ से दस फौजी कैम्प के बाहर गश्त लगा रहे थे और कैम्प में मेरे साथ दो और फौजी थे जिनमें से एक वही था जो मुझे यहां तक लेकर आया था।
"रहमान बडे़ साब किधर गया"
उस फौजी ने दूसरे वाले से पूछा।
"मेजर तो गश्त पर गये हैं दस मिनट में आ जायेंगे लेकिन ये छोकरा कौन है?"
दूसरे फौजी ने मेरी तरफ इशारा कर के पूछा।
"अमा कुछ नहीं यार ये पास के गांव का छोकरा है बेचारा गूंगा है गलती से यहाँ आ गया था।"
"अच्छा"
उसने हां में हां तो भर दी पर वो अब भी मुझे घूरे जा रहा था।और मेरी धड़कनें तेज हो रही थीं।
"ये तो सरहद पार से आया है"
उस आवाज ने तो मानों जैसे मेरे सिर पर हथौड़ा मार दिया हो।मेरा तो जैसे मानों सारा खून ही सूख गया था और मुझे काटो तो खून नहीं।
तीसरा फौजी दौड़ता हुआ आया और उसने मेरा हाथ पकड़ कर मरोड़ दिया।और तब मेरा ध्यान उस नाम पर गया जो मेरे हाथ पर गोदा हुआ था,बुन्नू।ये मैंने पिछले कजरी तीज के मेले में गुदवाया था।
"क्यों रे छोकरे बार्डर पार से यहां जासूसी करने आया है"
मुझे यहां तक लाने वाले फौजी ने चिल्ला कर कहा।
काफी देर तक उनमें ये बहस चलती रही कि मेरे साथ क्या किया जाए और आखिरकार उन्होंने ये निर्णय लिया कि मेरा फैसला उनके अफसर के आने पर किया जायेगा।
मैं एक कोने में चुप-चाप पडा़ अपने अंजाम के बारे में सोच रहा था।मेरे पास ही वो फौजी कुर्सी पर बैठा मुझे गालियाँ बकता जा रहा था जो मुझे यहाँ लेकर आया था।और इसी समय मुझे पता चला था कि उसका नाम अशफ़ाक था।उसके अलावा एक और फौजी वहीं पास बैठा नक्शे के साथ कुछ कर रहा था।जहाँ पर मैं था वो एक छोटा सा कैम्प था।
मैं बहुत डर गया था पर तभी मुझे मेरे बाबा के शब्द याद आ गये।उन्होंने मुझे कहा था जब भी किसी ऐसी मुसीबत में फंस जाओ जहाँ से निकलना मुश्किल लगे तो डरो मत और न ही हिम्मत हारो, बस भगवान का नाम लो और बुद्धि से काम लो।और मेरे बचने के अब बस दो रास्ते थे पहला ये कि वो पाकिस्तानी अफसर दयालु स्वाभाव का हो जो एक तरह से नामुमकिन था और दूसरा रास्ता ये कि किसी तरह मैं यहाँ से भाग निकलूं और शायद अब मेरे बचने का यही एक रास्ता था।
मैंने एक पत्थर का छोटा टुकड़ा उठा कर उस फौजी के ऊपर फेंका जो मेरे पास ही बैठा था।
"क्या है बे?"
मैंने उसे इशारे से बताया कि मुझे जोर की शूशू लगी थी।लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। फिर मैं वहीं अपनी पैंट खोलने लगा और ये देख कर वो फौजी मेरी ओर दौड़ पड़ा।
"रुक!रुक साले अबे यहीं गंदगी कर देगा क्या?"
"अशफ़ाक इसे बाहर लेकर जा और जल्दी निपटा के ले आ देखना भागने न पाए"
दूसरे फौजी ने कहा।
"ये बित्ते भर का छोकरा भाग के जायेगा कहां।चल साले!"
उसने मेरा हाथ पकड़ा और घसीटते हुए बाहर ले आया।बाहर आकर उसने चारों ओर देखा और फिर पहाड़ी की ओर चल दिया।थोड़ा आगे चलने पर मुझे पता चला ये वही रास्ता था जहाँ से वो मुझे लेकर आया था।कैंप से थोड़ा दूर आकर वो रुक गया।मैंनें गर्दन घुमा कर देखा उसके पास कोई बंदूक नहीं थी। अपनी बंदूक वो कैंप में ही छोड़ आइथा या शायद भूल गया था।
"जल्दी कर और चल वापस"
मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया लेकिन अभी भी वो मेरा दूसरा हाथ पकड़े हुए था।मैं मन ही मन ईश्वर को याद कर रहा था क्योंकि अब मेरा बचना या न बचना सिर्फ मेरे किस्मत पर निर्भर करता था।
मैंने दोनों तरफ देखा दूर-दूर तक हम दोनों के अलावा कोई और फौजी नहीं था बस फिर क्या था मैंने आव देखा न ताव झटके से घूमा और उसके हाथ पर जोर से काट खाया और वो दर्द से बिलख उठा।
मेरे पास बस यही मौका था और मैंने जमीन से दो मुठ्ठी धूल उठा कर उसके आंखों में झोंक दी।वो दर्द में बिलखता हुआ और मुझे गाली देता हुआ इधर-उधर कूदने लगा।कम से कम अगले दो मिनट के लिए तो वो बिल्कुल अंधा हो चुका था।
मैंने पूरी ताकत से वापस अपने घर की ओर दौड़ लगा दी।बिना कुछ देखे बिना कुछ सोचे मैं बस उसी रास्ते पर दौड़ता जा रहा था जहाँ से मुझे लेकर वो फौजी कैम्प गया था और ये ईश्वर की ही कृपा थी कि मेरी याददाश्त बहुत अच्छी थी एक बार मैं जो रास्ता देख लेता फिर कभी न भूलता।
मैं अंधाधुंध दौड़ रहा था और मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा, वो फौजी मेरे पीछे दौड़ता चला आ रहा था पर अभी भी काफी दूर था।वो लगातार मुझे गालियाँ देता जा रहा था और रुकने को कह रहा था पर अब मैं कहाँ रुकने वाला था।मुझे तो बस बार्डर पार पहुंचना था किसी भी तरह।
बीच-बीच में वो मुझ पर पत्थर और ढेले भी फेंकते जा रहा था पर ये उसका खराब निशाना था या मेरी अच्छी किस्मत जो उसका एक भी पत्थर मुझे नहीं लग रहा था।
मैं भागता हुआ एक बार फिर वापस वहीं पहुंच गया जहाँ से उस फौजी ने मुझे पकड़ा था।तभी मेरी नजर उस पतंग पर पड़ी जिसके पीछे मैं यहाँ तक आ गया था और इस मुसीबत में फंस गया था।मैंने हाथ बढ़ाकर वो पतंग उठा लिया।
अब मेरे हाथ में वो पतंग थी जो मुझे यहां तक खींच लायी थी।मैं बार्डर के काफी करीब पहुँच गया था लेकिन अभी भी मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था।
मैंने एक बार फिर पीछे पलट कर देखा वो फौजी अभी भी मेरे पीछे पड़ा था।
मुझे भारतीय सीमा साफ-साफ दिखाई दे रही थी कि तभी अचानक एक पत्थर मेरे सिर पे आ लगा और मैं बेसुध होकर जमीन पर गिर गया।बंद होती आंखो से मैं उस खूंखार फौजी और अपने बीच की दूरियाँ मिटती देख रहा था।मेरी मौत मेरे करीब आ रही थी और जिंदगी बेहोशी की गर्त में डूबती जा रही थी।मैं अपने सिर पर गर्म लहू की धार साफ-साफ महसूस कर रहा था।
मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाता जा रहा था।अंधेरा गहरा और गहरा हो रहा था.....
मेरी आंख खुल रही थी लेकिन अभी भी सब कुछ धुंधला सा नजर आ रहा था जो धीरे-धीरे साफ। ओ रहा था।मैं यहां कितनी देर से बेहोश था ये मुझे नहीं पता बल्कि मुझे तो ये भी नहीं याद था कि मैं इस समय था कहां।मेरे सिर में अभी तक बहुत दर्द हो रहा था और अचानक मेरा हाथ जब मेरे सिर पर गया तो पता चला कि मेरे सिर पर पट्टी बंधी थी।
और अब मुझे सब साफ़-साफ दिखाई दे रहा था।मैं अभी भी फौजियों के कैम्प में था पर इस बार मेरे आसपास पाकिस्तानी फौजियों की जगह हिन्दुस्तानी सिपाही खड़े थे।ये देख कर मेरे जान में जान आई।
वो सब आपस में फुसफुसा रहे थे।उनमें से कुछ मेरा नाम पूछ रहे थे।
लेकिन मेरे जुबान से बस एक शब्द निकला।
"प....पानी"
और फिर एक भले मानस ने मग में लाकर मुझे पानी दिया जो मैं एक सांस में पी गया।और फिर थोड़ी चैन की सांस लेने के बाद मैंने उन्हें पूरा वाकया सुना दिया।
पूरी बात बताने के बाद मैंने उनसे उस पाकिस्तानी फौजी के बारे में पूछा।
"वो फ.... फौजी कहाँ गया?"
"कहीं तुम उस फौजी की बात तो नहीं कर रहे हो जो हमें देखते ही दुम दबाकर भाग गया।असल में बेटा उस वक्त हम बार्डर के किनारे गश्त कर रहे थे जब तुम बेहोश हो गये थे।तुम्हारी चीख सुनकर मैं और मेरे साथी भागकर तुम्हारी ओर आ गये और हमें देखकर वो पाकिस्तानी सिपाही भाग खड़ा हुआ।"
उनमें से एक ने बताया जो वर्दी से मेजर लग रहे थे।मैंने सबको धन्यवाद दिया और फिर एक सिपाही ने मुझे वो नीली पतंग लाकर दी जिसके पीछे-पीछे मैं पाकिस्तानी सीमा में घुस गया था।
सब मेरी बहादुरी की तारीफ कर रहे थे और फिर मेजर साहब ने खुद जीप से मुझे घर तक छोड़ा और दादाजी को पूरी बात बता दी।और फिर जाते-जाते उन्होंने चुपके से मेरी ओर देखा और हल्के से आंख मारी और बदले में मैंने भी मुस्कुरा दिया।
खैर उनके जाने के बाद पहले तो बाबा मुझसे बहुत नाराज हुए फिर मेरी बहादुरी की तारीफ़ करने लगे और अगले दिन तक तो वो किस्सा गांव के हर बच्चे बूढ़े और जवान के होंठों पर था।हर कोई मेरी ही बात कर रहा था।तो ये है इस पतंग का किस्सा और इसी वजह से मैं इसे बेंचना नहीं चाहता था।"
इतना कहकर पतंग वाला गहरी सांसें लेने लगा।सोनू तो अभी भी हैरानी में उन्हें घूरे जा रहा था।
"तो अब आपने ये पतंग मुझे क्यों दे दी बाबा ये तो बहुत खास है न आपके लिए"
सोनू की ये बात सुनकर पतंग वाला मुस्कुरा उठा।
"कोई बात नहीं बच्चे अब इस पतंग पर तुम्हारा हक है ले जाओ इसे"
"धन्यवाद बाबा!अच्छा अब मैं चलता हूँ बाबा शाम हो चली है घर पर सब परेशान हो रहे होंगे"
"अच्छा ठीक है अब तुम जाओ"
और फिर सोनू ने अपनी साईकिल घुमाई और एक बार फिर बाबा को धन्यवाद कहकर अपने घर की ओर चल पड़ा।उसके हाथ में वही नीली पतंग थी........

                                       Written By
                           Manish Pandey'Rudra'

©manish/pandey/16-11-2017

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