Sunday, November 12, 2017

Lottery (लाटरी)

                           लाटरी

हन्ना रतनपुरा गाँव का साधारण सा जीवन जीने वाला और मेहनत मजदूरी करके अपना घर चलाने वाला मेहनती युवक था।काले उलझे हुए बाल और हल्की मुडी़ हुई नाक के बावज़ूद भी हट्टे-कट्टे शरीर वाला हन्ना बेहद आकर्षक दिखता था।बस तम्बाकू खाने की उसकी वर्षों पुरानी आदत के कारण उसके गाल थोड़े पिचके हुए थे और दाँत काफी पीले थे।बांयी आँख के पास चाँद के आकार का गहरा शायद बचपन की किसी चोट का निशान था।
अच्छे डील-डौल और हल्के साँवली रंगत वाला हन्ना श्याम बाबू के यहाँ उनके खेतों में काम करके किसी तरह अपना और अपनी पत्नी और दो बच्चों का पेट भरता था।श्याम बाबू उसकी वफादारी और ईमानदारी के पूरी तरह से कायल थे इसी लिये तो उस दिन दिवाली की बख्शीश में पूरे पाँच सौ रुपये दे दिये थे।
वो पाँच सौ रुपये लेकर वो घर पहुँचा।उसका काफी छोटा था कच्ची ईंट की दीवार पर चढा़ चूना कई जगहों से उजड़ गया था।छत के नाम पर टीन की चादर छायी हुई थी वो भी कई जगहों से कट-फट चुकी थी।
लकड़ी का कमजोर दरवाजा खोल कर जैसे ही हन्ना घर के अंदर घुसा उसके दोनों बच्चे कुंदन और पीहू दौड़ कर उसके कमर से लिपट गये।और कुंदन उन्हें दुलार करने लगा।
आठ साल का कुंदन गाँव की पाठशाला में तीसरी कक्षा में और छ: साल की पीहू दूसरी कक्षा में पढ़ते थे।दोनों बहुत शरारती थे लेकिन हन्ना उन्हें बहुत प्यार करता था।
घर के अंदर की हालत भी कुछ खास नहीं थी पर फिर भी उसे भरसक साफ सुथरा बनाने का प्रयास किया था हन्ना की पत्नी सुशीला ने।
सुशीला हन्ना के लिये चाय बनाने चली गयी और उधर हन्ना पास ही पडी़ एक खाट पर बैठ गया।घर में बस दो ही कमरे थे।।उसके दायीं डिहरी पर एक पुराना सा रेडियो पड़ा हुआ था।सुशीला अपने नाम की तरह बहुत सुंदर सुशील और घरेलू कामकाजी महिला थी।
उचित डील-डौल भरे हुए बदन और गोरे रंगत वाली सुशीला पूरे गाँव में सबसे अधिक सुन्दर महिला थी।
कभी हन्ना से किसी भी बात के लिये जिद नहीं करती थी उसके पास जितना कुछ था वो उसी में खुश रहती थी।
"पापा-पापा नवा कपडा़ कब लेबौ सभै नवा-नवा कपडा़ खरीद लाये हैं"
चाय पीते हुए हन्ना से उसके बच्चे नये-नये कपड़े लेने के लिये जिद करने लगे तो सुशीला ने उन्हें वहाँ से भगा दिया और फिर दोनों बाहर खेलने चले गये।और सुशीला हन्ना को पंखा झलने लगी।
"सुशीला हम सोचत रहेन के कालिहैं शहर चला जाई औ लड़कन लिये कुछ कपडा़ लै आई"
चाय पीते हुए हन्ना ने सुशीला से कहा।
"ऐजी लेकिन रुपया तौ नाय है कपडा़ कहाँ से लेवा जाई"
सुशीला ने अपनी चिंता व्यक्त की।
"ओह केर फिकर ना करौ सुनौ बिहानै हम तुमका और लड़कन का लैकै शहर जाबै और मालिक ई बार पाँच सौ रुपया बख्शीश दिहे हैं और मजदूरी केर तीन सै रुपया मिलाई के कुल आठ सै रुपया है"
"अच्छा!"
शहर जाने की बात सुनकर सुशीला और उनके बच्चे सब बहुत खुश हो गये और सभी पूरी रात शहर के बारे में बातें करते रहे।
अगले दिन हन्ना उसकी पत्नी और बच्चे नये-नये कपड़े पहन कर शहर जाने के लिये तैयार हो गये।
सुबह के सात बजे हन्ना अपनी पत्नी सुशीला और दोनों बच्चों के साथ शहर जाने के लिये बस स्टेशन की ओर निकल पड़ा।
हल्की नोंकदार मूछों और सपाट दाढ़ी के साथ सफेद कुर्ता और उस पर स्लेटी रंग की पैंट हन्ना पर खूब जंच रही थी।वहीं सुशीला पर चटख लाल रंग की साड़ी और बच्चों पर फ्राक और पैंट-शर्ट भी खिल रहे थे।
शहर जाने की खुशी में चहकते दोनों बच्चे चिल्लाते हुए हन्ना का हाथ पकड़ कर खींच रहे थे।और सभी गाँव से चौपाल जाने वाली पगडंडी पर तेज कदमों से चले जा रहे थे।
हल्की खिली हुई धूप में गाय और बकरियां अपने-अपने चारे खा रहे थे।वहीं गाँव के कुछ बच्चे पगडंडी पर साईकिल के टायरों को नचाते हुए खेल रहे थे और कुछ बच्चे पास के खेतों में कुछ किसान अपने-अपने खेतों में पम्पपिंग सेट से सिंचाई कर रहे थे।
और हन्ना रास्ते में मिलने वाले अपने मित्रों को खुशी से बताता जा रहा था कि वो आज शहर जा रहा था।वहीं उसके बच्चे भी भी चिल्ला-चिल्ला कर सबको बता रहे थे।
इधर वो सब पगडंडी से एक पुराने लकड़ी के पुल पर पहुँच गये थे जो सैकड़ों वर्ष पुराना था और अंग्रेज़ी शासन के समय ही बना था।पुल के नीचे एक छोटी सी नदी बहती थी जो उस गाँव के जीवन का आधार था।क्योंकि अधिकतर खेतों की सिंचाई इसी नदी के पानी से होती थी।
खैर पुल पार करने के बाद हन्ना और सुशीला बच्चों के साथ चौपाल में पहुँच गये थे।
गाँव का चौपाल,
जो पूरे गाँव में सबसे सुन्दर और बेहतर जगह थी।जहाँ चारों ओर बिखरी हरियाली की अद्भुत छटा हर किसी का मन मोह लेती थी।
पास ही चाय की दुकान पर कुछ बुजुर्ग और कुछ जवान लोग चाय की चुस्कियों के साथ प्रजातन्त्र और राजतंत्र जैसे भारी मुद्दों पर बहस कर रहे थे।उनमें गाँव के सरपंच और पँच भी थे।
खैर फिर वो सब आगे बढ़ गये।
कुछ ही देर में हन्ना और उसका परिवार बस स्टेशन पर थे जहाँ दो बसें जाने के लिये तैयार थीं लाल रंग से पेंट वो बस जिससे हन्ना को शहर जाना था वहीं पास ही रुकी हुई थी।
कंडक्टर और ड्राइवर सवारियों के बैठने का इंतजार कर रहे पर हन्ना के परिवार को मिलाकर उस बस से जाने वाले सिर्फ कुछ लोग ही थी।
हन्ना ने बच्चों और सुशीला को बस में बैठाकर खुद बाहर आ गया।
पास खड़े दूसरे बस में जो उनके विपरीत जाने वाली थी हन्ना का पडो़सी सुबास चढ़ने वाला था कि हन्ना को देखकर वो रुक गया।और फिर धीरे-धीरे हन्ना की ओर आने लगा।
"राम-राम चाचा!"
हन्ना के दोनों बच्चों ने चिल्ला कर सुबास को बुलाया।
"राम-राम कुनंदनवा कहां जात हौ?"
"चाचा हम सभे शहर जाइत है"
चहकती हुई पीहू ने बडे़ ही उत्साह से जवाब दिया।
"अच्छा-अच्छा!"
तभी उसकी नजर सुशीला पर पडी़।
"प्रणाम भौजी!"
उसने दाँत दिखाते हुए सुशीला से कहा लेकिन उसने बस चुपचाप सिर हिला दिया।
और फिर सुबास ने हन्ना पर अजीब सी निगाह डाली और फिर कुटिल ढंग से मुस्कुराया।
दोनों नें एक-दूसरे को अभिवादन किया।
"शहर जात हौ हन्ना?"
सुबास ने खीस निपोरते हुए कहा।
"हाँ!"
हन्ना ने अनमने ढंग से जवाब दिया क्योंकि वो सुबास को बिल्कुल भी पसंद नहीं करता था।और सुबास भी उसे कुछ खास पसंद नहीं करता था।दोनों में बचपन से ही अनबन रहती थी।
हन्ना की आर्थिक स्थिति उसके पिता के मरने के बाद बहुत बिगड़ गयी थी और इस बात पर सुबास हमेशा उसका मजाक उडा़ता था और अपने पैसों का रौब दिखाकर हमेशा उसको नीचा दिखाने की कोशिश करता रहता था।
एक बार हन्ना जिसके यहाँ काम करता था उसके खेत में सुबास कि बकरी घुस गयी और फसल खराब करने लगी।तभी हन्ना ने गुस्से में जलती हुई लकड़ी के चैले से मारकर उसे भगा दिया।और इस बात पर उसने पंचायत में हन्ना के खिलाफ शिकायत कर दी पर जब श्याम बाबू ने अपनी फसल खराब होने का हवाला दिया तो पंचों ने हन्ना को निर्दोष बताया और उल्टा सुबास पर पूरे पाँच सौ रुपये का जुर्माना कर दिया।
और हन्ना इस बात पर बहुत खुश हुआ था लेकिन तभी से सुबास उससे और भी नफरत करने लगा और बदला लेने का मौका ढूँढ रहा था।
खैर अब चक चाहते हुए भी वो हन्ना का कुछ भी बुरा नहीं कर पाया था।और आज दोनों बस स्टेशन पर आमने-सामने खड़े थे।
"तुम कहां जात हौ?"
हन्ना ने सुबास से पूछा।
"हम तौ नवा मोटर लेवै जात हेन"
उसने घमंड में सीना चौडा़ करते हुए कहा तो हन्ना उसे और भी नफरत से देखने लगा।क्योंकि उस समय तक गाँव के प्रधान और श्याम बाबू के अलावा और किसी के पास भी मोटर कार नहीं थी।
"तुमहूँ तौ शहर जात हौ!"
"हाँ लड़कन का घुमावै लै जाइत है"
हन्ना ने अजीब ढंग से जवाब दिया और सुबास का चेहरा देखकर साफ लग रहा था कि वो बिल्कुल भी खुश नहीं था।दरअसल हन्ना की खुशी उसे कभी भी बर्दाश्त नहीं होती थी।
खैर इसी बीच दोनों बसें चलने के लिये तैयार थीं और वो दोनों अपने-अपने बसों में चढ़ गये।
लगभग एक मिनट बाद ही दोनों बसें एकदूसरे के विपरीत दिशा में चल पड़ीं।
हन्ना ने अपना और सुशीला का फुल टिकट और दोनों बच्चों का आधा-आधा टिकट ले लिया।
दोनों बच्चे खिड़की के किनारे वाली सीट पर जिद करके बैठ गये थे।कभी-कभी तेज हवा के थपेड़ों से उनकी आँखें बंद हो जाती थीं।फिर भी दोनों बहुत खुश थे।
हन्ना और उसकी पत्नी सुशीला भी खिड़की से बाहर के नजारे देखकर खुश हो रहे थे।
ईंट पत्थरों के मकानों के बीच उनका गाँव काफी पीछे छूट गया था।जैसे-जैसे शहर पास आता जा रहा था हरियाली और तजगी न के बराबर नजर आ रही थी।

                                                   ***

सुबह से दोपहर हो चुकी थी।
तेज धूप के बीच हल्की-फुल्की हवा चल रही थी।
बस एक बार फिर रुक गयी और धीरे-धीरे सारे यात्री उतरने लगे।हन्ना भी अपनी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ सावधानी से नीचे उतरा।
आगे बच्चे और फिर उनके पीछे-पीछे हन्ना और सुशीला भी उतर गये।
सबकी नजरें तेजी से चारों ओर घूमने लगी और वो शहर की चकाचौंध चमक में खो गये।
चारों तरफ तेजी से गुजरते वाहन ऊंची-ऊंची बहुमंजिला इमारतें अपने ही धुन में चले जा रहे शहरी बाबुओं ओर मेम इन सभी बातों ने हन्ना और उसके परिवार का दिल जीत लिया था।
बच्चों की नजरें तो मिठाइयों और खिलौनों दुकानों पर ही जम गयी थीं।
सुशीला उन शहरी औरतों को देख रही थी जो छोटे-छोटे परन्तु शानदार कपड़े पहने हुए शायद अपने-अपने काम पर जा रही थीं।
खैर काफी देर तक शहरी चकाचौंध में तल्लीन रहने के बाद वो सब सड़क के दूसरे ओर किनारे चलने लगे।
"बाबा-बाबा देखो न कितने बड़े-बड़े मकान हैं यहाँ"
पीहू ने हन्ना की कमीज खींचते हुए उन ईमारतों की ओर इशारा कर के कहा।
"अरे-अरे ये तो कुछ भी नहीं यहां इससे भी बड़ी और ऊंची इमारतें हैं।"
हन्ना ने उसे गोद में उठाते हुए कहा।
"सच में बाबा"
कुंदन ने आश्चर्य प्रकट किया।
"हां"
हन्ना ने उसके बालों पर हाथ फेरते हुए जवाब दिया।और फिर वो धीरे-धीरे लोगों और दुकानों की भीड़ में गुम हो गये।
                                   

                                              ***

शाम होने को आयी थी और बाज़ार की चमक-दमक धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी थी।कुछ दुकानदारों ने तो अपने-अपने हाट भी उठा दिये थे।
लोगों की भीड़ भी काफी कम होती जा रही थी
अब सिर्फ दफ्तरों के चंद थके हुए कर्मचारी ही दिख रहे थे जो अपने-अपने घर जा रहे थे।
हन्ना भी अपने परिवार के साथ बस स्टैंड की ओर चल पड़ा।और चलते-चलते वो सब शहर की चीजों के बारे में ही बातें कर रहे थे।पर सुशीला ज्यादा नहीं बोल रही। थी।
बच्चे सवाल पे सवाल करते जा रहे थे और हन्ना बहुत ही प्यार और धैर्य से उनके सवालों के जवाब देता जा रहा था।
अभी वे कुछ दूर ही चले होंगे कि हन्ना की नजर पास के कई दुकानों में से एक दुकान पर पड़ी।जहाँ ऊपर लाटरी का बोर्ड लगा हुआ था और दुकान के अंदर एक मोटा सा अधेड़ उम्र का आदमी बैठा था जो हाथ के पंखे से हवा कर रहा था।
कपड़े के नाम पर उसने एक पुरानी सी लाल और सफेद रंग की चेक वाली कमीज़ और काले रंग का पैंट पहन रखा था।
उसके लगभग पूरे बाल झड़ चुके थे सिर पर सिर्फ कुछ ही बाल बचे थे जो आधे सफेद हो चुके थे।
भूरी नुकीली रौबदार मूँछें और भूरे आंखो वाला वो मोटा इंसान आदमी कम और जानवर ज्यादा दिख रहा था।
इधर हन्ना के कदम मानों अपने आप उसकी ओर खींचे चले गये।पीछे-पीछे सुशीला और बच्चे भी थे।
अपने दुकान की तरफ आते हुए इकलौते ग्राहक हन्ना को देखकर वो दुकानदार अपने आप को व्यवस्थित करने लगा।और हन्ना को महत्वपूर्ण दर्शाते हुए अपने पीले दांत दिखाकर स्वागत करने लगा।
"आईये साहब आईये!यहाँ आईये और अपनी किस्मत चमकाईये एक ही झटके में करोड़पति बनने का ये एक बेहतरीन अवसर है।"
हन्ना उसकी बातों को समझने का प्रयास करने लगा जिससे उसके भौंहों पर शिकन साफ नजर आने लगी।
"ई का है भाई?"
हन्ना ने अपनी गांव वाली भाषा में दुकानवाले से पूछा।ये जानकर कि हन्ना शहरी नहीं गांव का है उस दुकानदार की आंखों मे अजीब सी चमक आ गयी।
पर उसने खुद को सामान्य रखते और भरसक दांत फाड़ते हुए कहा-
"अरे ओ भाई ई है लाटरी... इसमें से एक टिकट खरीद लो और अगर ईनाम जीत गये तो तुम्हें पचास हजार रुपये मिलेंगे।पचास हजार रुपये"
उसने आखिरी शब्दों पर ज्यादा जोर देकर कहा।
पचास हज़ार रुपए!
इतनी बड़ी रकम का नाम सुनकर ही हन्ना के रोंगटे खड़े हो गये।
हन्ना के चेहरे पर रुपये की चमक को भांपकर उस लाटरी वाले ने आगे बोलना जारी रखा।
"अगर आप दो सौ रुपये की ये लाटरी की टिकट लेते हैं और अगर आपकी लाटरी लगी तो ईनाम के पचास हजार रुपये आपको मिल जायेंगे।जरा़ सोंचिए आपकी किस्मत बदल सकती है सिर्फ दो सौ रुपए में।"
पचास हजार रुपये।
हन्ना के दिमाग़ में उसके आखिरी शब्द गूंज रहे थे और देखते ही देखते वो एक अलग ही दुनिया में पहुंच गया।
'पचास हजार रुपये में वो क्या कुछ नहीं कर सकता,
सबसे पहले पीहू और कुंदन को शहर के किसी बड़े अंग्रेज़ी स्कूल में दाखिला दिलवायेगा।
नये जूते नयी ड्रेस और फटाफट अंग्रेज़ी बोलते उसके पीहू और कुंदन।रोज सुबह एक वैन उसके बच्चों को स्कूल ले जाने आयेगी।
उसके बाद घर की छतों और दीवारों की मरम्मत भी तो करानी है और फिर उन्हें पेंट भी करवाना पडे़गा।
फिर बचे हुए पैसों से वो एक गाय खरीद लेगा।
एक अच्छी दुधारू गाये जिसके दूध बेचकर एक दिन वो बहुत अमीर बन जायेग और फिर ऐसे ही दूध की डेयरी खोल लेगा।
दूध की डेयरी से जो आमदनी होगी उनसे हन्ना एक बड़ा सर घर बनवायेगा फिर कुछ जमीन खरीद कर उसमें खेती भी करेगा और एक दिन वो अपने गांव का सबसे अमीर आदमी बन जायेगा,सुबास से भी ज्यादा अमीर।
और उसके बडे़ से घर में सुशीला कई नौकरों और नौकरानियों पर रानी की तरह हुक्म चलायेगी।
गहनों जेवरों और अच्छे कपड़ों में सुशीला एकदम रानी जैसी ही लगेगी।पीहू और कुंदन बिल्कुल राजकुमारी और राजकुमार की तरह रहेंगे।पहनने के लिए सुंदर कपड़े और खेलने के लिए खिलौनों की ढेर।
और फिर बढ़िया सा मखमली सूट-बूट और पैंट पहने हन्ना अपने शानदार घर से बाहर निकलेगा तो उसके चारों ओर एक से बढ़कर एक गाडि़यों और ड्राइवरों  की लाइन लगी होगी,और अपनी मनपसंद कार मैं बैठकर हन्ना गांव की सैर करने जायेगा तो गाँव के लोग उसे सलाम करेंगें जिसके जवाब में हन्ना रौबदार तरीके से अपने हाथ हवा में लहरायेगा और फिर चारों तरफ उसकी जयजयकार गूंजने लगेगी।
सुबास भी उसके सामने सिर झुकाकर खड़ा होगा लेकिन वो उसकी तरफ देखेगा भी नहीं....'
अभी हन्ना अपनी ख्यालों की दुनिया में खोया ही था कि तभी लाटरी वाले की चुटकी नें उसकी तंद्रा को तोड़ दिया।
बस फिर एक ही झटके में वो फिर से वही पहले वाला हन्ना बन गया।उसने चारों ओर नजरें दौड़ाई लेकिन वहाँ न कोई कर थी न कोई नौकर-चाकर।
"तो भाई निकालूं एक टिकट?"
लाटरी वाले ने हन्ना से पूछा लेकिन जवाब देने के बजाय हन्ना ने अपने शर्ट की जेब पर हाथ फेरा।
उसके पास अब सिर्फ यही दो सौ रुपए बचे थे और अभी उसे इन्हीं रुपयों से सप्ताह भर का राशन भी जुटाना था।
एक तरफ सुनहरा भविष्य था और दूसरी तरफ उनके एक सप्ताह का राशन।
बिना कुछ बोले हन्ना वापस बस स्टैंड की ओर मुड़ गया।सुशीला और बच्चे भी उसके पीछे हो लिए।
लाटरी वाला हन्ना को पीछे से आवाज देता रहा पर हन्ना चलता गया जब तक की वो बस में नहीं चढ़ गये।
सभी एक अच्छी सी सीट पर बैठ गये।
बच्चे तो अपने-अपने खिलौनों को देखने में मग्न थे पर सुशीला हन्ना के भीतर चल रही उस कश्मकश को साफ-साफ महसूस कर पा रही थी जो निकट भविष्य और सुंदर भविष्य के बीच चल रहा था।
बस वापस अपने राह पर चल पड़ी.....
हमारे समाज की सबसे बड़ी दुविधा ये है कि आज भी हम में से कईयों का आज, आने वाले कल के लिए राशन जुटाने में गुजर जाता है.....      
                                     Written By
                         Manish Pandey'Rudra'

©manish/pandey/12-11-2017

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