Thursday, January 18, 2018

Adhoore Panne@Zindgi

                  अधूरे पन्ने@जिंदगी
            (अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)

                      अध्याय-एक
                पहली नजर का प्यार

ये कहानी ना तो किसी हीरो की है,
और ना ही किसी विलेन की....
ये कहानी है प्यार में पागल एक लड़के की जो अच्छे लोगों के बीच बहुत अच्छा और बुरे लोगों के बीच बहुत बुरा था।
ध्रुव सामान्य सा दिखने वाला पर मस्तमौला किस्म का लड़का था जो एक मध्यमवर्गीय परिवार से था।उसके पिता वन विभाग के एक आॅफिसर थे जिनका हाल ही में इस नये शहर में तबादला हुआ था।उसके घर में उसके मम्मी-पापा के अलावा उसकी सिर्फ एक बड़ी बहन थी।
पिताजी की नौकरी के वजह से आये दिन उन्हें शहर बदलना पड़ता था और साथ ही ध्रुव को बार-बार स्कूल भी बदलना पड़ता था जिसकी वजह से वो हमेशा उदास और चिड़चिड़ा रहता था।उसे बार-बार पुराने दोस्तों को छोड़कर नये लोगों के साथ दोस्ती करना अच्छा नहीं लगता था फिर भी अब तो जैसे उसे इसकी आदत सी पड़ चुकी थी।
खैर मुद्दे की बात ये है कि इस शहर में अभी तीन दिन पहले ही उसके पिता का ट्रांसफर हुआ था।और उसे किसी तरह शहर के एक कान्वेंट स्कूल में बारहवीं क्लास में एडमिशन मिल गया।
स्कूल का नाम सिटी स्टैंडर्ड पब्लिक स्कूल था।
वो शायद अगस्त की पांच तारीख थी और स्कूल में पहला दिन था उसका।सामान्य कद-काठी का गोरा हलके पिचके हुए गालों वाला वह लड़का काफी खूबसूरत दिख रहा था।बालों में खुशबूदार तेल लगाकर बड़ी ही सफाई से मांग काढे़ हुए ध्रुव किसी पुराने ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म के हीरो जैसा दिख रहा था।
दुबला-पतला और सामान्य हाईट का पूरी तरह से वेल ड्रैस्ड, कुल मिलाकर वह ठीक-ठाक लग रहा था।
लोहे के बड़े दरवाजे को पार करने के बाद कंधे पर काले रंग की डिजाइनर बैग लटकाए अपने आस-पास के माहौल और लड़के-लड़कियों को देखते हुए अपनी साईकिल सही जगह पर खड़ी करने के बाद वह स्कूल के बड़े से हाल में घुस गया।उसकी ही तरह बाकी सारे लड़कों ने भी भूरे रंग की पैंट और क्रीम कलर की शर्ट पहन रखी थी जबकि लड़कियों ने भूरे रंग के कुर्ता, सफेद रंग का पैजामा और सफेद रंग का ही दुपट्टा पहन रखा था।
खैर अपना क्लास रूम खोजने में उसे ज्यादा दिक्कत नहीं हुई क्योंकि हर क्लास के दरवाज़े पर क्लास का नाम लिखा हुआ था।
उसका क्लास बरामदे के अंदर की ओर पड़ता था जिसके ठीक सामने एक हाॅल जैसा खुला हुआ कमरा था और उसके बगल एक तरफ कम्प्यूटर रूम था जबकि दूसरी ओर छठवीं की क्लास चलती थी जिसके बगल उपर जाने के लिए सीढ़ियाँ लगी हुई थीं जहाँ सातवीं और आठवीं की क्लासें लगतीं थीं और इनके अलावा फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी की लेबोरेट्रीस बनीं हुई थीं।
वहीं बगल के हाल वाले कमरे में ग्यारहवीं की क्लास चलती थी।
चारों ओर नजरें दौड़ाते हुए वो अपने क्लास में घुस गया जहाँ उसकी मुलाकात उसकी क्लास के कई नये लड़के लड़कियों से हुई।ध्रुव को देखकर ज्यादातर लोगों को कोई सदमा नहीं लगा क्योंकि उनके क्लास टीचर ने एक दिन पहले ही सभी को उस लड़के के बारे में बता दिया था।हां लेकिन कुछ लड़कियाँ जरूर उसे दिलचस्प से देख रहीं थीं और आपस में फुसफुसाहट भरे स्वर में कुछ बातें भीं कर रहीं थीं।
खैर उसे अपने इस फीके और हल्के-फुल्के स्वागत से कोई खास दिक्कत नहीं हुई क्योंकि उसे इन सबकी आदत पड़ चुकी थी।
"हाय!तो तुम ही हो वो न्यू एडमिशन!वेलकम भाई"
कहने के साथ ही दुबले-पतले शरीर वाले लड़के जय ने उसकी ओर हाथ बढ़ाकर अपना परिचय दिया।
"हुम्म्!"
ध्रुव ने जय से हाथ मिलाते हुए बेहद ठंडा सा जवाब दिया।
"मेरा नाम जय है!"
"मैं ध्रुव।"
उसने भी अपना परिचय दिया और बारीकी से जय को देखने लगा।जय भी ध्रुव की तरह दिखने में कुछ खास नहीं था पर उसे देखकर ध्रुव ने अंदाजा लगाया कि वह पढ़ाई में काफी अच्छा और होशियार होगा।उसके पतले अंडाकार चेहरे पर मैगी-नूडल्स जैसे उलझे हुए खिचड़ी बाल और भी अजीब दिखते थे।
और फिर इसी के साथ ध्रुव ने अपना स्कूल बैग पहली लाईन में बीच के एक बेंच पर रख दी और बगल वाली खिड़की भी खोल दी ताकि खुली हवा अंदर आ सके।खिड़की से सीधे ग्यारहवीं क्लास के दूसरे और तीसरी लाईन में बैठे कुछ लड़के-लड़कियाँ दिखाई देते थे पर उसने उन पर ध्यान नहीं दिया और वापस जय की ओर चल पड़ा जो अपना बैग उसी लाइन में आखिरी बेंच पर जमा रहा था।
"हाय जय भाई क्या हाल है?"
क्लासरूम के पिछले दरवाजे से घुसते हुए प्रद्युम्न ने बेहद गर्मजोशी से पूछा और उसने आपना बैग जय की ओर उछाल दिया जिसने उसे आसानी से लपक लिया और अपने बैग के बगल जमा दिया।
"ठीक है भाई!"
जय ने जवाब दिया तभी प्रद्युम्न की नजर ध्रुव पर पड़ी और उसने जय की ओर देखते हुए इशारे से पूछा कि क्या ये वही नया लड़का है।
जबकि ध्रुव दूसरी ओर देखने लगा जहां कुछ लड़कियाँ बैठी हुईं थीं।उनमें से एक ने जिसका नाम तृप्ति था, उसने ध्रुव को प्यारी सी स्माइल पास की ओर शर्माते हुए वह वापस प्रद्युम्न और जय की ओर देखने लगा।
"हाय भाई मैं प्रद्युम्न मिश्र हूँ।"
प्रद्युम्न ने आगे आकर ध्रुव की ओर हाथ बढ़ाते हुए मुस्कुरा कर कहा।
"आय एम ध्रुव!"
ध्रुव ने भी आगे बढ़कर उससे हाथ मिलाया और फिर उसने ध्यान से उसकी ओर देखा और पाया कि उसने पूरे कैम्पस में अब तक जितने भी लड़कों को देखा था प्रद्युम्न उनमें सबसे ज्यादा स्टाइलिश और स्मार्ट लग रहा था।
"अभी तो तुम नये हो पर भाई धीरे-धीरे तुम्हें भी यहां अच्छा लगने लगेगा और मजा भी आने लगेगा।"
"हाँ।शायद!"
वो बु़झे मन से बोला क्योंकि उसे मालूम था कि वो ज्यादा दिन यहाँ भी नहीं रह पायेगा पर चूँकि कम से कम अगले एक साल तक तो उसे यहाँ रहना ही था इसलिए उसे यहां के माहौल को समझने की कोशिश तो करनी ही थी।पर उसे उसके पुराने दोस्तों और स्कूल की याद आ रही थी और खुद ध्रुव भी वापस पुराने शहर में ही जाना चाहता था।
इसके बाद भी कई लड़के क्लास में आये जिनमें से कुछ ने उससे मिलने में दिलचस्पी दिखाई जबकि कईयों ने उसे नजरंदाज भी कर दिया।
लगभग सभी लड़के-लड़कियों के नाम और थोड़ी बहुत डिटेल्स प्रद्युम्न ने उसे बताई पर सबके नाम याद रखना थोड़ा मुश्किल था।हालांकि उनमें से कुछ लड़के-लड़कियों के नाम उसे याद हो गए थे जो थोड़े ज्यादा हंसमुख और बातूनी किस्म के थे।
जैसे उलझे बालों वाला सांवला लड़का विराट श्रीवास्तव जिसे क्रिकेट खेलने का बहुत ज्यादा शौक था और साथ ही वह थोड़ा मजाकिया किस्म का भी था।उसके अलावा थोड़े भारी-भरकम शरीर वाला चश्मिश लड़का वीर सिंह और विनीत सिंह जो लम्बा और काफी गोरा-चिट्टा दिख रहा था।
इसके बाद एक-एक करके दुबला-पतला और दिन भर फोन में घुसा रहने वाला देवांश,सांवले रंग-रूप वाला बेवकूफ़ किस्म का प्रतीक मिश्र जिसे इंग्लिश ठीक से आती नहीं थी मगर फिर भी वह इंग्लिश में ही बात करता रहता था, चौड़े माथे वाला थोड़ा अजीब सा लड़का रजत, गोल-मटोल और फूहड़ किस्म का दिखने वाला भरत और सामान्य कद-काठी का पीले चेहरे वाला अमित भी उससे हाथ मिलाने के लिए आगे आया।उन्होंने उससे हालचाल पूछा और उसके पुराने स्कूल और वहाँ के लोगों के बारे में काफ़ी सवाल-जवाब किया खैर फिर इसके बाद वो सभी आपस में बातें करने लगे और वो ध्रुव बाकियों से हाथ मिलाते हुए पिछले गेट से अपने क्लास के बाहर निकल आया।उसके क्लास की कई लड़कियाँ भी उसे देख के मुस्कुराते हुए उसका स्वागत करतीं और बदले में वो भी मुस्करा देता।
पर उसे वहां रुकने में या उनसे बातें करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी और तभी उसने बाहर दूसरी क्लास में खड़ी एक लड़की को देखा और बस देखता ही रह गया जैसे इससे पहले उसने किसी लड़की को कभी देखा ही नहीं हो।उसी पल से लड़के की जिंदगी ही बदल गई।
वक्त मानों थम सा गया था और ऐसा लगा जैसे मानों सारी काय़नात ठहर सी गई थी।
वो अपने होशो-हवा़स खोकर बस उस लड़की को देखे जा रहा था।वो लड़की उसी स्कूल की ग्यारहवीं क्लास की स्टूडेंट थी।
गोल हल्का गुलाबी सा चेहरा, सीप जैसी पलकों के भीतर कैद मोती जैसी बड़ी-बड़ी चमकदार काली आँखें, गुलाबी से रसभरे होंठ, उभरी हुई ठुड्डी और उसके नीचे छोटी सी सुराहीदार गर्दन और उस पर काले घने लम्बे बाल जिन पर काली पतली सी हेयर-बैंड लगी थी, चुस्त भूरे सूट और सफेद चूड़ीदार मोहडी़ के पैजामे पर सफेद दुपट्टे से छिपा यौवन कुल मिलाकर किसी सांचें में ढ़ली संगमरमर की मूर्ति जैसी गोरी लड़की थी।
ध्रुव उसकी मासूमियत से भरी मुस्कुराहट पे मर मिटा था ऐसा कहना गलत न होगा की ध्रुव उसे बस देखता ही रह गया था मानों उसके यौवन के सागर में डूबने का इरादा रखता हो।खैर उसकी दीवानों जैसी अजीबो-गरीब हालत देखकर ऐसा लग रहा था जैसे उसके दिल ने उसके सीने में अभी-अभी धड़कना शुरू किया था।उसकी सोंच बदल गयी थी अब बस वो यहीं रुकना चाहता था।
वो तो बस उस खूबसूरत बला को निहारते जा रहा था और उसकी खूबसूरती में डूबा चला जा रहा था।
हालाँकि लड़की जो हँसते हुए अपने सहेलियों से बातें कर रही थी उसका ध्यान ध्रुव की ओर एक बार भी नहीं गया था और न तो उसने अब तक एक बार भी ध्रुव की ओर देखा था।पर ध्रुव उसी को देखता जा रहा था जैसे किसी राहगीर को उसकी मंजिल मिल गई हो।
जब लड़की अपनी सहेलियों से बातें कर रही थी तो बीच-बीच में उसके बालों की लटें उसके चेहरे पर आ जाती थी और जिनको वो अपने कोमल उँगलियों से अपने मखमली कानों के पीछे ले जाती थी...
ध्रुव अपने होश खो देने वाला ही था कि तभी प्रेयर के लिए बेल बजने लगी जिसे सुनकर सभी लोग बाहर बड़े हॉल की तरफ भागे।
वो लड़की और उसकी सहेलियाँ भी उठ कर जाने लगी पर ध्रुव जो अभी भी उसकी ही धुन में खोया हुआ था उसे झटका सा लगा और वो जैसे जाग गया।
एक बार फिर उसकी नजरों ने काफी देर तक उस लड़की का पीछा किया और तभी पीछे से जय ने उसके कंधे पर धौल जमाते हुए कहा- "चलो जल्दी प्रेयर शुरू होने वाला है"
तब जाकर ध्रुव को होश आया और के साथ बेतहाशा बाहर बड़े हॉल की ओर भागा।इस समय उसे सबकुछ खूबसूरत लग रहा था और उसने चलते हुए बाकी लड़कों की भीड़ में अपना हाथ जय के कंधे पर रख दिया।
बड़े हाल में पहुंच कर वो दूसरी लाइन में सबसे आगे खड़ा हो गया जबकि उसके विपरीत उसके बाकी दोस्त आखिरी लाइन में सबसे पीछे जाकर खड़े हो गए ताकि वे गप्पे लडा़ सकें और प्रेयर छोड़ के सबकुछ कर सकें।
उसके कुछ दोस्त जैसे प्रद्युम्न और विराट उसे भी पीछे आने को बोलने लगे पर वो उन्हे अनसुना करके अपनी जगह वहीं रुक गया क्योंकि सामने थोडी दूर पर जहां चार-पाँच छोटी कतारों में सारी लड़कियाँ खड़ीं थीं उन्ही के बीच तीसरी लाइन में वो लड़की भी खड़ी थी जो हँसते हुए अपने बगल खड़ी लड़की से बातें कर रही थी।
उसी के क्लास के कुछ लड़के जिनमें अरविंद जो पढ़ने में बेहद तेज था, आकर्षित जो उस स्कूल के हेडमास्टर का लड़का था और काफी मासूम सा दिखने वाला प्यारा लड़का था।
इसी के साथ प्रेयर शुरू हो गया पर ध्रुव का ध्यान प्रेयर के बजाए उसी लड़की पर था।
वह हॉल काफी बडा़ था जिससे सटकर पांँच कमरे बने हुए थे जिनमें से पहले को छोड़कर हर एक में क्लासें चलती थीं जबकि पहला कमरा हेडमास्टर का आॅफिस रूम था जो कि बेहद शानदार था।वहीं पहले और दूसरे कमरे के बीच में से एक गैलरी जाती थी जहाँ अन्दर बाकी के क्लास थे जबकि हाईस्कूल की क्लासें बाहर के चारों कमरों में ही चलती थीं।हॉल के बांयी ओर एक बहुत बडा़ मैदान था इतना बडा़ मैदान जो ध्रुव ने अबतक शायद ही किसी और स्कूल में देखा था।कुल मिलाकर उसे अपना यह नया स्कूल काफी पसंद आया था।
वहीं बाहर मैदान में देरी से आने वाले लड़के-लड़कियां अलग-अलग दो कतारों में खड़े थे जिनसे कुछ टीचर्स देरी से आने कारण पूछ रहे थे।
खैऱ प्रेयर खत्म हुई और फिर नाटे कद के बडी़ तोंद वाले हेडमास्टर उपाध्याय जी आगे आये जिनके सिर के अधिकतर बाल गायब थे और उनका सिर किसी चांद की तरह चमक रहा था हाँ पीछे की ओर सिर पर कुछ बाल जरूर बच गए थे शायद यह याद दिलाने के लिए की उनके सिर की खेती भी कभी हरी-भरी थी।उन्होंने सफेद रंग के बेदाग कुर्ते और पैजामे के ऊपर भूरे रंग की धारीदार सदरी पहन रखी थी।
उन्होंने जोरदार स्वर में गला साफ किया और हाॅल में खड़े लड़के-लड़कियों की भीड़ आश्चर्यजनक रूप से शांत हो गई।
ध्रुव की नजरें उन पर पड़ी और न जाने क्यों पर उसे आभास हुआ कि उनके सामने खड़ा व्यक्ति असीम विद्वान था।
"हमारे विद्यालय परिसर में आये सभी नये भैय्या-बहिनों का स्वागत है।"
उन्होंने उद्बोधन के साथ ही बाहर खड़े टीचर्स को कुछ इशारा भी किया और फौरन ही टीचर्स ने मैदान में अलग खड़े लड़के-लड़कियों की लाइन को हाॅल के थोड़ा करीब जाने का आदेश दिया और लगभग फौरन ही सारे विद्यार्थी आगे आ गए ताकि उनकी बातें साफ़-साफ सुन सकें।
इसके बाद हेडमास्टर जी ने दोबारा कहना शुरू किया जैसे बीच में कोई व्यवधान न पड़ा हो।
"जैसा कि मैं कह रहा था हमारे बीच उपस्थित सभी नये विद्यार्थियों का स्वागत है और सभी पुराने विद्यार्थियों का पुनः स्वागत है।उम्मीद है इस साल भी हर साल की तरह आप सब खूब मन लगा कर और मेहनत से पढे़ंगें।"
"बिल्कुल नहीं!"
"जरा सा भी नहीं!"
अचानक ध्रुव को प्रद्युम्न और जय की आवाज एक साथ सुनाई पड़ी और जिसे सुनकर अचानक ही उसकी हँसी छूट गई और हेडमास्टर बोलते-बोलते रुक गए और उसकी ओर घूरने लगे।सिर्फ हेडमास्टर जी ही नहीं बल्कि सारे लड़के-लड़कियाँ उसे घूर रहे थे और उसी वक्त पहली बार इति ने उसे देखा।
पर उसने झेंप कर सिर झुका लिया और अपने जूतों की ओर देखने लगा।
खैर इस क्षणिक व्यवधान के बाद उपाध्याय सर ने आगे दोबारा बोलना शुरू किया।
"और जैसा की मैं हर साल विद्यार्थियों को बताता हूँ कोई विद्यार्थी विद्यालय परिसर के भीतर कूड़ा-करकट, कागज और टाॅफी के रैपर इत्यादि इधर-उधर नहीं फेंकेगा और साथ ही गुटखा वगैरह खाकर हर जगह नहीं थूकेगा बल्कि ऐसा करते पकड़े जाने पर उस विद्यार्थी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।विद्यालय के ही एक विद्यार्थी ने तमाम पान-पुकार और गुटखा खाकर हर क्लास में कोनों पर थूका है और इतनी बुरी तरह से कि आज तीन साल से लगातार चार-छह बार पुताई के बावजूद भी दाग नहीं मिटे हैं।उस एक गधे ने हर क्लास हर कोने में गंध मचा रखा दिया था।"
"गुरूजी थोड़ा योगदान इसमें हमारा भी है"
एक बार फिर जय और प्रद्युम्न ने हेडमास्टर उपाध्याय जी के बातों के बीच में बोला जिसे सिर्फ आसपास बैठे विद्यार्थियों ने ही सुना था लेकिन इस बार भी ध्रुव का जोर से हँसने का मन हुआ पर उसने किसी तरह अपनी हँसी दबा ली।
खैर इतना बोलने के साथ ही हेडमास्टर जी ने सामने बैठे विद्यार्थियों को ऐसे घूरकर देखा जैसे उन सबने अपनी पाकेट में गुटखों के रैपर छुपा रखे हों।
"अच्छा तो अब सभी अपनी-अपनी क्लास में जायेंगे और सभी एक कतार में जायेंगे इंसानों की तरह।ताकि बाहर से देखने वाले को पता चल सके कि यहाँ जानवर नहीं इंसान पढ़ते हैं।"
उन्होंने व्यंग्य से कहा लेकिन कुछ लड़के-लड़कियाँ हँसने लगे पर ध्रुव को समझ में नहीं आया कि उसे हँसना चाहिए या नहीं इसीलिए वह चुप ही रहा और फिर सब अपने-अपने क्लासों में जाने लगे।पहले एक-एक करके सारी लड़कियों की कतारें जिनमें से कुछ गैलरी से होते हुए अंदर चली गईं और कुछ हाल के बगल वाले अलग-अलग अपने क्लासों में चली गईं।
और फिर आखिर में ध्रुव भी भी अपने क्लास में गया।दोनों के क्लास अगल-बगल ही थे बीच में कुछ 14-15 फीट का फासला था।लड़के का क्लास एक बड़े अंधेरे से कमरे में लगता था जिसमें से आने-जाने के लिए दो लकड़ी के दरवाजे लगे थे जोकि आसमानी रंग के पेंट से रंगे हुए थे।और कमरे में कुल तीन लाईनों में बेंचें लगी हुई थीं जैसा कि हर क्लास में था।
पहले दोनों लाइनों में लडके बैठते थे जबकि तीसरी लाईन में लड़कियां बैठती थीं।
दोनों दरवाजों के बीच में चार बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ थीं जिनमें लोहे की पतली-सी सलाखें लगी थीं जहां ध्रुव अकेला बैठा हुआ था।
वहीं दूसरे क्लास में वो लड़की सबसे किनारे की लाइन में बीच के बेंच पर बैठी थी।जहाँ से वो लड़के को साफ-साफ तब तक दिखाई देती थी जब तक कि बीच वाली लाइन में बैठे लड़के खड़े नहीं हो जाते थे। क्योंकि लड़की की क्लास में सिर्फ एक ही दरवाजा था जहाँ से दोनों एक दूसरे को देख सकते थे।क्लास का पीछे का भाग पूरा खुला हुआ था।
क्लास में पहुंचते ही अधिकतर लड़कियाँ अपनी-अपनी सहेलियों से बातें करने लगीं जबकि कुछ लड़के इधर-उधर देख रहे थे और कुछ तो अपने-अपने बैग्स से कापियां और किताबें निकालने लगे।
यही हाल इति की क्लास में भी था जब तक की उसकी मोटी क्लास टीचर अनुराधा मैडम हाथ में रजिस्टर लिए नहीं आ गईं।
ठीक उसी वक्त ध्रुव के क्लासटीचर ने भी कमरे में प्रवेश किया और इति की ओर से अपना ध्यान हटाकर उसने अपने क्लासटीचर की ओर देखा जिन्होंने सफेद शर्ट और सफेद ही पैंट पहन रखी थी जिसकी बेल्ट उनके तोंद की नीचे कहीं छुपी हुई थी।
ध्रुव को यह देखकर हैरानी हुई की उनकी तोंद किसी आधे भरे आलू के बोरे जैसे लग रही थी।
जबकि तोंद के विपरीत उनका कद काफी कम था और उनके आधे भूरे-आधे सफेद बाल काफी ज्यादा बिखरे हुए ऐसे लग रहे थे जैसे कंघियों ने खुद उन्हें सँवारने से इंकार कर दिया हो।उनका नाम विजय था पर ना जाने क्यों प्रद्युम्न और उसके दोस्त उन्हें गोली कहते थे।
खैर उनके आते ही सारी क्लास एकदम शांत हो गई और सारे लड़के-लड़कियाँ खड़े हो गए सिवाय सबसे पीछे बैठे प्रद्युम्न, जय, विराट और वीर के।जबकि विजय सर ने बिना किसी को देखे ही बैठने को बोल दिया और सभी के साथ ही ध्रुव भी बैठ गया।जबकि विजय सर खुद बीच वाले लाईन के ठीक सामने रखी कुर्सी टर बैठ गए और रजिस्टर उठाकर मेज पर हल्के से पटक दिया जहाँ कम से कम ढाई सौ ग्राम धूल उड़ गई और पहली ही सीट पर सबसे आगे बैठा लड़का शोभित खौं-खौं करते हुए खाँसने लगा।लेकिन टीचर ने उसकी ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया बल्कि उन्होंने रजिस्टर खोला और फिर सामने बैठे शोभित से पेन मांगने लगे।
"कौन सा पेन सर काला या नीला?"
शोभित ने पूछा जो किसी बड़े भूरे खरगोश की तरह लग रहा था।
"कोई भी दो! नीला ही दे दो!"
विजय सर ने रूखे स्वर में कहा।
"जेल पेन या डाॅट पेन सर?"
शोभित ने एक बार फिर चिंचियाते हुए पूछा और इस बार विजय सर झल्ला उठे और उसे न जाने क्या-क्या बड़बड़ाने लगे जिसमें ध्रुव को सिर्फ उनका पहला शब्द गधा सुनाई दिया।बाकी सब कुछ उसके ऊपर से निकल गया।
वहीं बाकी सारे लड़कों के साथ कुछ लड़कियाँ भी उनकी झल्लाहट का मजा लेने लगीं जिनमें सबसे आगे बैठने वाली शिवन्या, प्रगति और दीप्ति थीं।
तीनों में शिवन्या काफ़ी खूबसूरत और समझदार थी जबकि प्रगति अंडाकार चेहरे वाली बातूनी लड़की थी, बहरहाल दीप्ति काफी दुबली-पतली मगर खूबसूरत लड़की थी जो चश्मा लगाती थी और शायद ध्रुव के क्लास में पढ़ने वाली सबसे खूबसूरत लड़की थी।
जबकि उनके ठीक पीछे बैठी चार लड़कियाँ कोमल, लक्ष्मी, सुमन और आराध्या आपस में सिर सटाकर फुसफुसाहट भरे स्वर में कुछ बातें कर रहीं थीं।
और उन्हीं के पीछे बैठी चार लड़कियों में तीन लड़कियाँ रश्मि, अंकिता और दुबली-पतली लम्बी मगर अंडाकार चेहरे वाली आकर्षक लड़की तृप्ति खी-खी करती हुई बुरी तरह से हँस रही थीं, जबकि चौथी लड़की आकांक्षा सांवले रंग-रूप मगर बेहद तीखे नैन-नक्श वाली सीधी-सादी लड़की थी जो काफी गंभीर नजर आ रही थी।
इसके बाद एक दूसरे लड़के आदित्य से पेन लेकर टीचर रजिस्टर में कुछ लिखने लगे।आदित्य दिखने में जय का जुड़वा बड़ा भाई लगता था उन दोनों के बाल बिल्कुल एक जैसे थे और काफी हद तक चेहरा भी, बस फर्क इतना था कि आदित्य लम्बाई में जय का कम से कम डेढ़ गुना था और उसकी घनी दाढ़ी भी थी।
वहीं दूसरी ओर उसने इति की क्लास में नजर डाली जहां अब अटेंडेंस लेने आई उसकी क्लास टीचर जा चुकीं थीं और उनकी जगह पर दुबले-पतले लेकिन ताड़ जैसे लम्बे हिंदी विषय के टीचर पाठक जी आ गए थे।उन्होंने भी हेडमास्टर की तरह सफेद कुर्ता-पैजामा पहन रखा था बस उनके कपड़े हेडमास्टर के कपड़ों जितने चमकदार नहीं थे बल्कि इसके विपरीत काफी ढीले-ढाले और मैले थे।लेकिन उनके मैले कपडे़ भी उनकी चेहरे की चमक को नहीं रोक सकते थे जिससे ध्रुव नें अंदाजा लगाया कि वे भी काफी विद्वान होंगे।
उधर पाठक जी इति की क्लास को हिंदी पढा़ रहे थे और इधर विजय सर ध्रुव के क्लास में अटेंडेंस ले रहे थे पर उस लड़की के धुन में खोया ध्रुव अपना अटेंडेंस लगवाना ही भूल गया था।
और जब उसके पीछे बैठे लड़के प्रदीप ने उसे याद दिलाया कि वो अपना अटेंडेंस लगवा ले तब जाके उसे होश आया और उसने टीचर से दोबारा अटेंडेंस लगाने के लिए कहा तो उसके टीचर ने पहले तो उसे घूरकर देखा ओर फिर उसका मज़ाक बनाते हुए पूछा- "अभी तक कहां थे?सो गये थे क्या!"
खैर ताना मारने के बावजूद उन्होंने गुस्से में बड़बड़ाते हुए दोबारा रजिस्टर खोला और उसका अटेंडेंस लगा दिया और फिर रजिस्टर बंद करने के बाद अपना विषय पढ़ाने लगे क्योंकि अटेंडेंस के बाद पहली फिजिक्स की क्लास उन्हें ही लेनी थी।अभी उन्होंने कोई हेडिंग डालने के लिए बोला ही था कि एक लड़का कंधे पर बैग लटकाये धड़ाधड़ाता हुआ अंदर चला आ रहा था।सबकी नजरें उसी की ओर घूम गईं ध्रुव की भी हालांकि ध्रुव उसे नहीं जानता था।
खैर अभी वो क्लास के अंदर घुसा ही था की विजय सर चिल्ला पड़े।
"कहाँ घुसे चले आ रहे हो ससुराल है क्या बाहर निकलो और दोबारा पूछ के आओ!"
गुस्से में उन्हें घूरते हुए वो लड़का मुडा़ और बाहर दरवाजे पर जाकर खड़ा हो गया।
"अब आई!"
उसने जोर से बोला।
"आओ गधाप्रसाद!"
विजय सर ने उसे अंदर आने को कहा और उस पर से ध्यान हटाकर ब्लैकबोर्ड पर हेडिंग लिखने लगे।बाकी सभी लड़कों की तरह ध्रुव ने भी एक नई नोटबुक और पेन निकाल ली और विजय सर की बोली गई हेडिंग लिखने लगा।उसने सबसे नजरें चुराते हुए एक बार फिर से इति पर नजर डाली जो बेहद तल्लीन होकर पाठक सर की बातें सुन रही थी जोकि उन्हें महादेवी वर्मा की कामायनी के कुछ पंक्तियों का भावार्थ समझा रहे थे।
ध्रुव टकटकी लगाकर उसी की ओर देख रहा था और अब उसे बिल्कुल भी परवाह नहीं थी कि विजय सर उसकी क्लास क्लास को ऊष्मागतिकी के नियमों के बारे में क्या समझा रहे थे।वह तो बस हिन्दी पढ़ना चाहता था या सिर्फ इति को देखना चाहता था,
देखते रहना चाहता था।
उसे बिल्कुल भी फर्क नहीं पड़ता था कि ऊष्मागतिकी के नियमों का उनके भौतिक जीवान में क्या महत्त्व था।तब तक तो बिल्कुल भी नहीं जब तक कि उसके चेहरे पर चाॅक का टुकड़ा नहीं पड़ा जोकि विजय सर ने उसपर फेंका था।
"कहाँ बिजी हौ भैय्या हिंदी पढ़ने का मन हो तो बता दो भेंज दी वहीं।"
विजय सर ने व्यंग्य कसते हुए कहा और उसके  कान गुलाबी हो गए।इसके बाद फिर तीसरे पीरियड तक इति की ओर नहीं देखा क्योंकि अगला क्लास भी विजय सर ही पढ़ाते थे जो कि मैथ्स का था।
इधर ध्रुव का ध्यान अपनी क्लास के बजाए उसी लड़की पर था और वो तब तक उसे ही देखता रहा जब तक की वो बायोलॉजी की क्लास के लिए ऊपर छत पर नहीं चली गई।इसके बाद ध्रुव अपनी क्लास और पढाई़ में व्यस्त हो गया हालांकि अभी भी उसके दिल-और-दिमाग पर वही लड़की छायी हुई थी।
दो और बोरिंग क्लासों के बाद एक बार फिर ध्रुव उसी लड़की को देखने लगा और अपने आस-पास क्या हो रहा था उसे इसकी जरा भी परवाह नहीं थी।
दोपहर के बाद जब उसके बायोलॉजी पढ़ने वाले सारे लड़के-लड़कियां प्रैक्टिकल लैब से वापस क्लास में आये तो उसने देखा उनमें से अधिकतर लड़के-लड़कियों का हाथ कटा हुआ था सिवाय आकर्षित और आकांक्षा को छोड़कर।
“ये सबको क्या हुआ?”
उसने पीले चेहरे वाले अमित से सवाल किया जिसके हाथों में तो दर्जन भर से भी ज्यादा घाव थे।
“अर… हम लोग हाइड्रा का डिसेक्शन कर रहे थे!”
उसने हँसते हुए जवाब दिया।
“हाइड्रा का डिसेक्शन कर रहे थे कि अपने हाथों का?”
ध्रुव ने हैरान होकर सवाल किया।
“अरे भाई क्या करें ब्लेड काफी शार्प था न!”
एक बार फिर उसने हँसते-मुस्कुराते हुए जवाब दिया और फिर इससे पहले कि ध्रुव उससे और कोई सवाल कर पाता वो अपना कटा-फटा हाथ लेकर दीप्ति को दिखाने चला गया और इसके बारे में ऐसे बात कर रहा था जैसे यह बहादुरी भरा सम्मानजनक हादसा था।
वहीँ दूसरी ओर उस दिन स्कूल की छुट्टी होने तक उसके कई दोस्तों को पता लग गया था कि उसे वो लड़की पसंद थी।
इसी बीच आकर्षित ने उसे बताया कि वीर भी उसी लड़की से प्यार करता था और उस लड़की का नाम इति था।जब उसे पता चला कि कोई और भी उस लड़की को पसंद करता था तो उसे न जाने क्यों पर बहुत बुरा लगा था।उसने फौरन वीर से इस बारे में पूछा और उसे ये जान के बेहद खुशी हुई कि वीर उस लड़की को नहीँ बल्कि उसकी सहेली शशि को पसंद करता था।आकर्षित को इस बारे में धोखा हुआ था पर हां इतना जरूर सही था कि उस लड़की का नाम इति था।
इस बीच कई बार उस लड़की की नज़र भी ध्रुव पर पड़ी पर जब भी ऐसा होता वो हड़बड़ाकर दूसरी ओर देखने लग जाता या अपनी नोटबुक पढ़ने लगता।
खैर छुट्टी हो जाने के बाद अपने नये दोस्तों से हाथ मिलाते हुए वो लड़का अपनी साईकिल पर बैठ कर इति को देखता हुआ तेजी़ से निकल गया।
और इसी तरह दो दिन गुजर गये कभी उस नये स्कूल में एडमिशन के नाम से भी चिढ़ने वाला वो लड़का अब खुशी से स्कूल आने लगा था इसी के साथ-साथ वो अपने बाकी सारे दोस्तों से भी अच्छी तरह घुल मिल गया था ओर अब तो ऐसा लगता था जैसे वह बरसों से इसी स्कूल में इन्हीं लड़कों के साथ पढ़ रहा था।
इसी तरह कुछ ही दिनों में इति और उसकी सहेलियों को भी अंदाज़ा हो गया कि वो लड़का उसे देखता रहता था और न जाने क्यों पर इति इस बात से चिढ़ जाती थी।
ध्रुव बस एक बार उस लड़की से बात करना चाहता था और हालांकि कभी-कभी तो उसे ऐसा लगता था जैसे इति ने उसकी ओर देखकर स्माइल किया हो पर अगले ही पल उसके गुस्से से भरे चेहरे को देखकर उसकी रही सही हिम्मत भी टूट जाती थी।
अगले दिन अचानक ही काफी शोर-गुल मच गया जब एक मेंढक का डिसेक्शन करते वक्त अमित बेहोश हो गया।
“अबे तू बेहोश क्यों हो गया था?”
काफी देर बाद उसके होश में आने पर प्रतीक ने उससे सवाल किया।
“अरे पागल मुझे लगा था हमें मरे हुए जानवरों का डिसेक्शन करना था पर सरजी ने मुझे जिंदा मेढ़क दे दिया था।”
अमित ने बताया जिसे सुनकर ध्रुव को सुखद आश्चर्य हुआ और यह सोचकर उसे मितली सी आने लगी कि अगर उसने बायोलॉजी ली होती तो उसे भी यह सब करना पड़ता।
“मैंनें ही उसका मेंढ़क बदल दिया था!”
अमित के वहाँ से चले जाने के बाद आकर्षित ने ध्रुव को बताया जबकि ध्रुव हँस पड़ा।
इसी तरह उस स्कूल में ध्रुव का पहला सप्ताह खत्म हो गया और अगले दिन जब संडे को स्कूल बंद था तो उसे जरा भी अच्छा नहीं लग रहा था।
खैर किसी तरह उसने एक दिन इति को देखे बिना बिताया जो उसके लिए बड़ी बात थी।
अगले दिन वो हमेशा से जल्दी स्कूल पहुंच गया और इसी के साथ उस दिन एक जबरदस्त घटना घटित हुई।
प्रेयर खत्म होने के बाद हर दिन की तरह आज भी हेडमास्टर उपाध्याय जी ने उन सबको आदर्श विद्यार्थी बनने के लिए प्रेरित किया पर उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद ध्रुव के दोस्तों कोई फर्क नहीं पड़ता था।खैर इसके बाद सब अपनी क्लास में चले गए।ध्रुव आज भी हर दिन की तरह अकेला उसी बेंच पर बैठा हुआ था जहाँ से इति की बेंच उसे साफ़-साफ दिखाई देता था।हालांकि वो अब लगातार उसकी तरफ नहीं देखता था बस कभी-कभी या अक्सर कनखियों से इति की ओर देखता था फिर भी कई बार इति और उसकी सहेलियों ने उसे अपनी ओर देखते हुए पकड़ लिया और वो झेंप कर दूसरी तरफ देखने लगता।
विजय सर अटेंडेंस लेने के बाद कुछ न्यूमेरिकल प्रॉब्लम्स साॅल्व करा रहे थे कि तभी बीच में एक बेहद दुबला-पतला लड़का जिसका नाम मोहन था कमरे में दाखिल हुआ जिसने मुँह में गुटखा दबा रखा था। उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि विजय सर का एक हल्का-फुल्का मुक्का भी उसका काम तमाम कर सकता था।
उसने क्लास में घुसते हुए अपने दोस्तों की ओर देखकर हाथ हिलाया लेकिन अपनी आदत अनुसार विजय सर ने उसे बाहर जाने को बोला ताकि वो दोबारा पूछने के बाद ही कमरे में प्रवेश करे लेकिन मोहन दरवाजे से बाहर निकला तो जरूर लेकिन दोबारा अंदर नहीं आया बल्कि उल्टे पांव वापस लौट गया।
विजय सर को जब तक समझ में आया तब तक वो लड़का स्कूल का बड़ा लोहे का गेट पार कर के बाहर निकल चुका था।जबकि यहां सारे लड़के जोरों से हँसने लगे।ध्रुव थोड़ा सा हैरान तो था पर वो भी खिल कर मुस्कुरा रहा था जबकि प्रद्युम्न और उसके बाकी सारे दोस्त हँसी के मारे दोहरे हुए जा रहे थे लेकिन जब विजय सर दोबारा वापस कमरे में आये तो उनका मूड काफी खराब हो चुका था इसलिए सबने शांत रहने में ही अपनी भलाई समझी। ध्रुव ने कई अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाई की थी टर उसे कभी कहीं भी इतना मजा़ नहीं आया था तब भी नहीं जब उसके पिछले स्कूल में उसके किसी दोस्त ने गोरखनाथ बाबा का भभूत बता के सारे स्टाफ को केंवाच(एक प्रकार का खुजली उत्पन्न करने वाला पौधा) का पाऊडर दे दिया था और पूरे दिन उन लोगों के माथे पर खुजली होती रही।हालांकि बाद में उस लड़के की अच्छी खासी कुटाई हुई थी या तब भी नहीं जब किसी लड़के ने उसके पुराने स्कूल के किसी खड़ूस टीचर की कुर्सी पर ढेर सारा गोंद लगा दिया था और उस दिन उन्हें होमवर्क देखना छोड़कर वापस घर जाना पड़ा था।
उस वक्त भी ध्रुव को वहाँ इतना अच्छा अच्छा नहीं लगता था जितना आज यहाँ उसे अच्छा लगता था।
शायद इसकी वजह इति थी….
इसके अलावा उस दिन लंच पीरियड तक कुछ खास नहीं हुआ।लेकिन इसी बीच लंच पीरियड के बाद अगला क्लास खाली था जिसमें कोई टीचर नहीं आया था।ध्रुव जो मैथ्स के प्रॉब्लम्स साॅल्व कर रहा था उसने अपनी नोटबुक से नजरें हटाकर इति की तरफ देखा और उसे देखकर काफी हैरानी हुई कि हर रोज के विपरीत आज इति उसे घूर रही थी।उसने झट से अपनी नजरें इति पर से हटाकर वापस अपनी नोटबुक पर गडा़ लीं।उसे महसूस हो रहा था जैसे उसका दिल उसके शरीर से बाहर कहीं धड़क रहा था,
मगर बेहद जोरों से और कहीं आस-पास ही...
उसने अपना पूरा ध्यान उस प्रश्न पर लगाने की कोशिश की पर उसे उसका मतलब बिल्कुल भी समझ में नहीं आ रहा था।खैर उसने हिम्मत जुटा कर दोबारा इति की ओर देखा और उसे एक बार फिर झटका लगा, वो अब भी ध्रुव को देखे जा रही थी और उसने झट से अपनी नजरें अपने क्लास की सफेद दीवार पर जमा लीं।उसका दिल अब भी जोरों से धड़क रहा था और उसके हाथ-पैर काँप रहे थे।
तभी उसका एक दोस्त विनीत उसके पास आकर बैठ गया जहाँ उस बेंच पर दो लोगों की जगह खाली थी।
आते ही उसने लड़के के कंधे पर हाथ रखा और बोला- "भाई क्या हुआ अकेले क्यों बैठे हो किसी ने कुछ बोला क्या?भाई कोई दिक्कत है तो बताओ हमें?"
"अर... कुछ नहीं!"
ध्रुव ने उसे टालने की कोशिश की और इस वक्त वो सिर्फ इतना ही चाहता था कि विनीत वहां से उठकर चला जाये पर ऐसा लग नहीं रहा था कि इतनी जल्दी विनीत का वहां से उठने का कोई इरादा था।वहीं ध्रुव उसे जबर्दस्ती हटा भी नहीं सकता था क्योंकि इससे उसे बुरा भी लग सकता था।
''क्या यार अकेले बैठे हो अच्छा नहीं लग रहा मैं भी यहीं बैठुँगा तुम्हारे साथ!"
विनीत ने उसके कंधे पर अपना वनमानुष जैसा बड़ा पंजा गडा़ते हुए कहा और ऐसा बोलते वक्त उसकी नजरें दूसरे क्लास में बैठी इति पर गडी़ं थीं।
"ठीक है, पर मुझे पढ़ना है!"
कहने के साथ ही ध्रुव ने गुस्से से उसका हाथ झटक दिया पर विनीत ने उसके इस व्यवहार पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
"ठीक है भाई तू पढ़ मैं तो वो लड़की को देख रहा हूँ बहुत तगड़ा लाइन दे रही है!"
विनीत ने ये बात ध्रुव से कम और खुद से ज्यादा कही थी लेकिन उसकी बात सुनकर न चाहते हुए भी ध्रुव का सिर झटके से इति की ओर मुड़ गया जो शायद विनीत के आ जाने के वजह से दूसरी तरफ देखने लगी थी पर वो इस वक्त बिल्कुल चुपचाप थी और यह बात उसके स्वाभाव के विपरीत था।
ध्रुव ने अंदाजा लगाया कि शायद विनीत के आ जाने की वजह से इति ने उसपर से नजरें फेर लीं थीं वरना थोड़ी देर पहले तक वो उसी को देख रही थी।
और यह बात समझने के बाद पल भर में ही ध्रुव के मन में गुस्से की जबर्दस्त लहर उठी जिसका उसके नोटबुक में लगे अधूरे सवाल से कोई लेना-देना नहीं था।उसने विनीत की ओर देखा जिसकी निगाहें अब भी बाहर ही टिकी थीं और इस वक्त वो किसी बड़ी और लालची लार टपकाती मूर्ख लोमड़ी जैसा लग रहा था और ये सोचकर ध्रुव की हँसी छूट गई।
खैर एक बार फिर उसने वापस अपनी नजरें अपनी नोटबुक पर जमा लीं।
वहीं पूरे घंटे विनीत की नजरें बाहर ही जमीं रही और तो और उसने एकाध बार बाहर देखकर हाथों से कुछ इशारा भी किया पर ध्रुव अपने गुस्से को अपने भीतर दबाये हुए बैठा रहा और उसने इति की तरफ ना देखने की भरसक कोशिश की थी और आखिरकार जब उससे रहा नहीं गया तो उसने एक बार फिर पहले इति पर निगाह डाली और वो यह देखकर हैरान रह गया कि इतिऔर उसकी काली-कलूटी बदसूरत सी दिखने वाली एक सहेली जिसका नाम शायद पूजा था, दोनों उसी की ओर गुस्से से घूर रहीं थीं लेकिन दरअसल वे उसे नहीं बल्कि विनीत को गुस्से से घूर रहीं थीं और इतना ही नहीं बल्कि इति हाथ से थप्पड़ मारने की मुद्रा बना कर उनकी ओर लहरा भी रही थी।उसने पहले कभी इति को इतने गुस्से में नहीं देखा था, हालांकि वो अक्सर उसे गुस्से से घूरती थी पर इस वक्त उसके चेहरे पर गुस्से के बजाए नफरत की तेज लहर झलक रही थी।
उसने पलट कर विनीत की ओर देखा जिसका चेहरा पल भर में जर्द पीला पड़ चुका था।उसे फौरन सब समझ में आ गया कि सारी गलती विनीत की ही थी उसने जरूर इति को गुस्सा दिला दिया होगा।
ध्रुव मन ही मन विनीत को गालियाँ बकते हुए पलटा और बिना एकबार भी इति की ओर देखे उसने झटके से सारी खिड़कियों को बंद कर दिया और सिटकनी चढ़ा दी वहीं विनीत अपराधी भाव से नजरें झुकाये हुए वहां से उठा और जाकर चुपचाप अपनी बेंच पर बैठ गया जबकि ध्रुव वहीं बैठा रहा पर उसने दोबारा खिड़की खोलने की कोशिश नहीं की और इस बीच दोनों में से किसी एक ने भी कुछ बोलने के लिए अपना मुँह नहीं खोला था।
बाकी पूरे समय भी खिड़की बंद ही रही और उन दोनों को उम्मीद थी कि कभी भी प्रिंसिपल आफिस से उनका बुलावा आ सकता था लेकिन अंत में उन्हें बहुत सुकून मिला जब ऐसा कुछ नहीं हुआ और आखिरकार उस दिन भी स्कूल की छुट्टी हो गई।
काफी सारे लड़के-लड़कियां एक साथ धक्का-मुक्की करते हुए बाहर निकल गये फिर सबसे आखिर में ध्रुव भी निकल गया।
ध्रुव ने भी अपनी साईकिल उठाई और बाहर आ गया जहाँ थोड़ी दूरी पर एक किनारे खड़ी इति पहले से ही अपनी एक सहेली के साथ उसके बाहर निकलने का इंतजा़र कर रही थी।
उसकी सहेली पूजा जिसकी शक्ल काफी भद्दी लग रही थी और उसे देखकर ध्रुव को ऐसा लगा जैसे बड़े थूथन वाली कोई भयंकर ऊंटनी उसके सामने खड़ी हो।
उसने ध्रुव को रोका और बोली- ''भाईया रुकिए!"
ध्रुव रुक तो गया था पर वो सहमा और डरा हुआ था और मन में अजीब-अजीब से ख्याल आने लगे।साथ ही उसके घुटने कांप रहे थे और उसका दिल किसी बेलगाम घोडे़ की तरह दौड़ रहा था।उसने पूजा के बगल खड़ी इति को नजरअंदाज करने की भरसक कोशिश की।
न जाने क्यों पर वो इति से नजरें नहीं मिलाना चाहता था।
खैर उसने हकलाते हुऐ पूछा-''जी बोलिये क... क्या काम ह... है? ''
बोलते वक्त उसने नजरें झुका रखीं थी पर तभी उसके कनों में शहद जैसी मीठी आवाज पड़ी जो उसकी सहेली की कर्कस आवाज से उतनी ही अलग और मधुर संगीतमय थी जितनी की हो सकती थी।
"आप हमेशा मेरी क्लास में क्यों झाँकते रहते हैं आप अपनी पढा़ई पे ध्यान नहीं देते।और आपके साथ जो भाईया बैठे थे क्या नाम है उनका?"
उसने पहली बार इति की आँखों में देखा था।
पहली बार ध्रुव उसे इतने करीब से देख रहा था और उसने पाया कि उसकी आवाज भी उतनी ही प्यारी थी जितनी कि वो।
''अर... वो लड़का उसका नाम विनीत है वो तो दूसरे गेट से निकल गया!"
ध्रुव ने अपनी आवाज़ से कंपकपाहट को दूर रखने की भरसक कोशिश की और अपनी टांगों की तरफ बिल्कुल भी न देखने का नाटक किया जो बुरी तरह से कांप रहे थे।उसका जवाब सुनकर पहले तो इति कुछ देर तक उसे ऐसे घूरती रही जैसे उसकी नजरें ध्रुव का एक्सरे कर रही हो और फिर बोली-"अच्छा तो उनको समझा दीजिये जो नौटंकी करना हो दूसरों से करें मुझसे दोबारा नौटंकी मत करें वरना अच्छा नहीं होगा"
इति के स्वर में तेज गुस्से का पुट था।
"वो जबरदस्ती मेरी बेंच पे आकर बैठ गया और मैं उसे हटा तो नहीं सकता ना मेरे अकेले की बेंच थोड़ी ना है..." उसने धीमे स्वर में जवाब दिया लेकिन इति को अपनी ओर घूरते देख आगे जोड़ दिया - "वैसे समझा दुंगा"
और फिर ध्रुव अपनी साईकिल पर बैठा और तेजी से निकल गया।जाते समय उसने एक बार भी पीछे मुड़कर देखने की कोशिश नहीं की और इति और उसकी बदसूरत दोस्त दोनों भी अपने-अपने घर की ओर बढ़ गये... To Be Continued In Next Chapter

                                    Written By
                         Manish Pandey’Rudra’

©manish/pandey/18-01-2018

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