Wednesday, January 24, 2018

Adhoore Panne@Zindgi

                   अधूरे पन्ने@जिंदगी
              (अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)

                         अध्याय-दो
                      इश्क़ का खुमार

"और फिर यार उसने मेरे से बोला कि मैं विनीत को समझा दूँ कि ऐसी उल्टी सीधी हरकत ना करे।"
क्लास में बेंच के बजाय मेज पर बैठकर ध्रुव जय और प्रद्युम्न को बता रहा कि किस तरह पिछले दिन छुट्टी के समय इति और उसकी फ्रैंड ने उसे रोका था और क्या-क्या कहा था।जबकि सिर्फ वही दोनों ही नहीं बल्कि खुद विनीत, आकर्षित, वीर, विराट मोहन और अरविंद के अलावा और भी कुछ लड़के उसे घेर कर बैठे थे और उसे ध्यान से सुन रहे थे।
और जब उसने बोलना बंद किया तो उसे ये देखकर काफी हैरानी हुई कि उन सबके मुँह खुले हुए थे और इस समय उसे ऐसा लगा जैसे वो कोई प्रवचन देने वाला बाबा हो और बाकी सब मोक्ष की प्राप्ति के लिए उसकी कथा सुन रहे हों।
खैर अरविंद ने सबसे पहले खामोशी तोड़ी।
"भाई उसने ऐसे ही कहा था!"
अरविंद ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा लेकिन जब ध्रुव नें भौंहें तानकर उसे घूरा तो उसने आगे जोड़ दिया।
"मेरा मतलब उसने विनीत को भईया बोल दिया था!सीधे?"
सब एक बार फिर जवाब सुनने के लिए ध्यान से ध्रुव का मुँह ताकने लगे और इससे उसे चिढ़ होने लगी।पर उसने ठंडे लहजे में जवाब दे दिया।
"हाँ!"
और उसका जवाब सुनकर बारे लड़के खुश हो गये और तो और प्रद्युम्न और विराट तो तालियां भी  बजाने लगे जबकि ध्रुव को ये नहीं समझ में आ रहा था कि जब एक लड़की ने उसे रास्ते में रोककर हड़काया था तो इसमें इतना खुश होने वाली क्या बात थी।उसका बहुत मन हुआ कि वो विराट और प्रद्युम्न की अमर पर एक-एक लात कसकर जमा दे पर उसने खुद पर काबू किया।और चिढ़े हुए अंदाज में वही पूछने लगा जो इस वक्त उसके दिमाग में चल रहा था।
"इसमें इतना हँसने वाली क्या बात है?"
और यकायक उसके गुस्से को देखते हुए सब शांत हो गए।जबकि जय ने उसके कंधे पर हाथ रखकर अपनी तरफ खींच लिया।
"देखो भाई उसने उसने विनीत को भाईया कह दिया जबकि तुमको ऐसा कुछ भी नहीं कहा तो इसका मतलब कुछ न कुछ तो है भाई उसके तरफ से भी।"
जय ने शांत और प्यार भरे लहजे में उसे समझाया और फौरन ही इस बात पर ध्रुव के दिमाग नें सरपट दौड़ना शुरू कर दिया।पहली बार उसे इस बारे में खुशी महसूस हुई थी और उसके गाल और भी ज्यादा गुलाबी हो गये।उसका मन तो कर रहा था कि वो अभी जय के गाल चूम ले लेकिन उसने सोंचा कि अचानक ऐसा करने पर उसके दोस्त और उसके बाकी क्लासमेट्स क्या सोचेंगे।सबसे बढ़कर अगर इति ने देख लिया तो वो उसके बारे में क्या सोंचेगी खैर यही सब सोंचकर उसने अपना इरादा बदल दिया और अगले कई घंटों तक उसने इस बारे में जितनी बार भी सोंचा हर बार उसे जय की ये बात और ज्यादा समझदारी भरी लगती थी।अगर इति चाहती तो उसे भी भईया बोल के कोई भी किस्सा शुरू होने के पहले ही खत्म कर सकती थी जबकि उसे पता था कि ध्रुव उसे ज्यादातर समय देखता रहता था।पर उसने उसे ऐसा करने से नहीं रोका था बस सिर्फ इतना पूछा था कि वो उसे देखता क्यों रहता था।लेकिन उसे इति नें नहीं बल्कि इति की उस बदसूरत शक्ल वाली फ्रैंड पूजा ने उसे रोका था।और इतना ही नहीं बल्कि उस दिन तो कई बार वो खुद ध्रुव को देख रही थी।तब तक जब तक कि विनीत नें बीच में आकर सारा मामला नहीं बिगाड़ दिया था।
खैर कभी-कभी बहुत कम समय में आपको कोई बहुत ज्यादा अच्छा लगने लगता है और चूंकि ध्रुव और जय दोनों काफी हद तक एक जैसे थे इसलिए जल्दी ही दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे।
और आज उसके पास उसका बेस्ट फ्रेंड जय भी बैठा था जो उसे अच्छी तरह से समझता था।दोनों पढा़ई करने के साथ-साथ आपस में बातें काफी सारी बातें भी कर रहे थे और बीच-बीच में ध्रुव इति को भी देखता रहता था लेकिन आज उसने एक बार भी ध्रुव की ओर नहीं देखा था और ये देखकर ध्रुव थोड़ा निराश हो गया।
''यार तुमको क्या लगता है वो मेरे बारे में क्या सोंचती होगी?''
ध्रुव ने आखिरकार केमिस्ट्री की अपनी नोटबुक से बाहर इति की खाली बेंच से नजर हटाकर जय कि ओर देखते हुए पूछा।
''अर... मुझे क्या पता भाई ये तो वही जाने लेकिन हाँ इतना पक्का है वो पट जरूर जाएगी बस तुम ऐसे ही लगे रहना''
''लेकिन भाई वो तो मेरी तरफ़ देखती भी नहीं है और मुझे नहीं लगता वो मुझे पसंद करती है!''
अब उसने ध्रुव के सामने वही बात रख दी उसे काफी समय से परेशान कर रही थी।और ध्रुव की ये बात सुनकर जय ने आखिरकार उस रिएक्शन को छोड़कर उसकी तरफ देखा जिसे वो काफी देर से पूरा करने की कोशिश कर रहा था।
''अरे भाई इतनी जल्दी किसी नतीजे पर मत पहुंच जाओ हो सकता है वो तुम्हें पसंद करती हो पर तुम्हारे सामने सिर्फ ऐसा नाटक कर रही हो कि वो तुम्हें देखती नहीं है क्योंकि अक्सर ये लड़कियां भाव खाने लगती हैं।''
जय की बात से उसे ज्यादा खुशी तो नहीं हुई पर उसके दिल का बोझ जरा कम हो गया।इधर दोनों लोग बातों में लगे हुए थे कि तभी बेल बज गई और केमिस्ट्री टीचर विनय सर एक ऊबाऊ लेक्चर को अधूरा छोड़कर जाने लगे हालांकि उनका मन बिल्कुल भी नहीं हो रहा था जाने को पर अपनी दूसरी क्लास के लिए उन्हें जाना ही पड़ा।
और इस बात के लिए ध्रुव और जय दोनों ही उनके शुक्रगुजार थे क्योंकि अब उनमें से कोई भी लगातार ग्यारहवां पन्ना लिखने के लिए तैयार नहीं था।
विनय सर के जाते ही फौरन जय और ध्रुव दोनों अपने-अपने बेंच से उठे और भागकर पिछले दरवाजे पर खड़े हो गए क्योंकि बायोलॉजी की क्लास खत्म होने के बाद किसी भी पल सीढ़ियों से इति आने वाली थी।लगभग एक मिनट बाद ही इति के कई क्लासमेट्स एक-एक, दो-दो करके सीढ़ियों पर आते हुए दिखाई देने लगे और ध्रुव का दिल जोरों से धड़कने लगा जबकि जय पीछे मुड़कर अपने बाकी दोस्तों से बातें कर रहा था।और एक पल भर बाद ही उसे इति दिखाई पड़ी जो अपनी दोस्त शशि के साथ हँसते हुए बातें करती हुई आ रही थी और अपने चिर-परिचित अंदाज में इति अपनी लटों को बार-बार अपनी कानों के पीछे ले जा रही थी लेकिन लगता था जैसे उसकी लटों को उसे बार-बार छेड़ने में मजा आता था।ध्रुव को यह देखकर बेहद मजा आता था लेकिन लता था जैसे उसे देखना इति को बिल्कुल भी पसंद नहीं था शायद इसलिए ध्रुव पर नजर पड़ते ही इति एकदम से खामोश हो गई और उसने सिर झुका लिया मानो उसने तय कर लिया था चाहे जो भी हो पर वो उसे नहीं देखेगी।जबकि उसके विपरीत उसकी फ्रैंड शशि ने जरूर बड़े ध्यान से उसे घूरकर देखा लेकिन ध्रुव उसके बजाए इति को देख रहा था और तब तक देखता रहा जब तक कि वो अपनी क्लास में घुकर उसकी नजरों से ओझल नहीं हो गई।
"वो मुझे पसंद नहीं करती है बल्कि नफरत करती है मुझसे!"
ये बात ध्रुव ने बार-बार मन में दोहराई और मुरझाए हुए चेहरे को लेकर वापस मुड़ा और अपनी बेंच पर पहुंच गया।जहाँ एक पल पहले उसके चेहरे पर खुशी थी वहीं अब इस वक्त उसके चेहरे पर गहरी निराशा थी साथ ही उसे खुद अपने आप पर बेहद ज्यादा गुस्सा आ रहा था जिसकी वजह उसे नहीं मालूम थी।
उसने इति की ओर देखा जो शायद फैसला कर चुकी थी चाहे कुछ भी हो पर वो ध्रुव की ओर नहीं देखेगी।और इसीलिए ध्रुव ने अपना बैग वहां से उठाया और जाकर बीच वाली लाईन में आखिरी से दूसरे नम्बर की बेंच पर बैठ गया देवांश अकेला ही बैठा था जबकि उसके पीछे आखिरी बेंच पर वीर, विनीत और प्रतीक बैठे हुए थे जिनके बगल पहली लाइन के आखिरी बेंच पर जय, प्रद्युम्न और विराट बैठे थे।
उन सबने उससे कई बार पूछने की कोशिश की कि अचानक अपनी जगह से वो उठकर वहां क्यों बैठ गया पर उसने एक शब्द भी नहीं बोला और खिड़की से बाहर नजर डाली जहां अब इति की क्लास में पहली लाइन में सबसे आगे बैठे तीन लड़के और तीसरी लाइन में आखिरी बेंच पर बैठी इति की दो सहेलियों की हल्की-फुल्की झलक मिल रही थी जबकि इति उनसे तीन बेंच आगे बैठी थी।
"उसके बारे में मत सोंचो!उसके बारे में मत सोंचों!"
उसने मन ही मन यह बात कई बार दोहराई और आखिरकार अपने आगे वाली बेंच पर बैठे तीन लड़कों भरत, अमित और प्रशांत की बातें ध्यान से सुनने लगा जो अपनी बायोलॉजी की प्रैक्टिकल फाईल को लेकर आपस में बहस कर रहे थे।जबकि तीसरी लाइन में उनके बगल बैठी तीनों लड़कियाँ तृप्ति, अंकिता और आकांक्षा उनकी बहस देखकर हँस रही थीं।खैर बातों ही बातों में ध्रुव को पता चला कि प्रशांत बहुत ही बेहतरीन आर्ट बनाता था और वाकई उसकी प्रैक्टिकल फाइल में बने चित्रों को देखकर उसने इस बात से जरा भी इंकार करने की कोशिश नहीं की और चूंकि वह खुद अच्छा आर्ट बना लेता था इसलिए इस बात को समझता था कि क्यों बाकि दोनों अपने चित्र प्रशांत से ही बनवाना चाहते थे।जबकि प्रशांत के आगे की बेंच पर बैठे आकर्षित और रोहित दोनों उनके साथ बैठे रजत को परेशान कर रहे थे।
"ध्रुव!"
"हाँ!"
उसने आकर्षित और रजत पर से नजरें हटाईं और प्रद्युम्न की ओर मुड़ा जिसने उसे आवाज लगाई थी।हालांकि वो इति के बारे में किसी से भी बात नहीं करना चाहता था पर उसके लिए अपने दोस्तों को नजरअंदाज भी नहीं कर सकता था।
"यार फिजिक्स, मैथ और केमिस्ट्री की कोचिंग कहीं पढ़ते हो कि नहीं?"
अचानक से प्रद्युम्न के इस सवाल को सुनकर ध्रुव चकरा गया।
"अर... अभी तो नहीं!"
"अच्छा तो हमारे साथ क्यों नहीं पढ़ लते विजय सर और विनय सर के पास।"
विनीत ने अपनी राय उसके सामने रखी।और न चाहते हुए भी ध्रुव को उसकी बात से इत्तेफाक रखना ही पड़ा क्योंकि उसे कहीं न कहीं तो कोचिंग पढ़नी ही थी तो उसने इस बारे में गौर से सोंचा और पाया कि उसे उन्हीं के साथ ही पढ़ना चाहिए।जब उसे कहीं न कहीं किसी टीचर से पढ़ना ही था तो क्यों न दोस्तों के साथ ही पढ़ लिया जाये।और यही सोचकर उसने हाँ बोल दिया।
"हाँ!क्यों नहीं ये बहुत ही अच्छा रहेगा।"
उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया और दोस्तों के साथ थोड़ा और वक्त बिताने के विचार से वह थोड़ा ज्यादा उत्साहित नजर आने लगा क्योंकि उसे लगा घर पर अकेले इति की यादों के साथ तड़पते हुए वक्त बिताने के बजाए दोस्तों के साथ कोचिंग पढ़ने का विचार ज्यादा बेहतर रहेगा। ऐसे ही बातों मे आज का दिन भी निकल गया और शाम को छुट्टी के बाद ध्रुव ने साईकिल उठाई और बेहद तेजी से इति की बगल से निकल गया।
अगले दो दिनों में कोई भी महत्वपूर्ण घटना नहीं हुई सिवाय इसके कि ध्रुव अब रोज़ाना देवांश के पास उसी बेंच पर बैठता था जहाँ से इति उसे न दिखाई दे लेकिन न जाने क्यों कभी-कभार उसे ऐसा लग रहा था कि इति और उसकी फ्रैंड्स उसके बारे में बातें करती थीं।इसके अलावा अब इति दिन में ज्यादा बार पानी पीने के लिए नल पर भी जाती थी जिसके लिए उसे बार-बार ध्रुव की क्लास के पिछले गेट के सामने से गुजरना पड़ता था।हालांकि ऐसे वक्त में ध्रुव भरसक कोशिश करता था कि उसकी ओर न देखे पर न चाहते हुए भी अक्सर उसकी नजरें इति पर पड़ ही जातीं थीं फौरन उसके दिल में मीठा सा दर्द उठने लगता था और दिल बगावत करने पर उतर आता था।
"ध्रुव भाई!"
गौरव नाम के एक लड़के ने उसे बुलाया जिससे उसका मन इति से हटकर अपनी क्लास में लौट आया।
"भाई मुझे केमिस्ट्री की काॅपी दे दो!"
उसने आराम से कहा और फौरन ध्रुव ने अपना नोट्स गौरव को दे दिया।जिसने मुस्कुराते हुए उसे धन्यवाद दिया और वापस अपनी बेंच पर जाकर बैठ गया।
गौरव भी उसी के साथ पढ़ता था पर वो ज्यादातर या तो स्कूल नहीं आता था या फिर वो अपनी ही धुन में मस्त रहता था और न जाने किस दुनिया में रहता था।
खैर इसके अलावा जब उस दिन मोहन आया तो विजय सर ने उसे हड़का कर पूछा कि वो उस दिन स्कूल से भाग क्यों गया था जब उन्होंने उसे पूछकर अंदर आने को कहा था और इसका उसने बड़ा ही मजेदार जवाब दिया।
“अरे गुरूजी हम्मैं लगा आपकै पढा़वै के मन नाहीं रहा यही से!”
मोहन ने अपने होठों से गुटखे की पीक पोंछते हुए जवाब दिया और उसका जवाब सुनकर सारे लड़के-लड़कियों की हँसी छूट गयी और सिर्फ उनकी ही नहीं बल्कि खुद विजय सर की भी हँसी छूट गई।
खैर उन्होंने उसे कुछ कहा नहीं बल्कि हल्के से उसकी पीठ पर धौल जमा दी जिससे वो लड़खड़ा गया।
और फिर हमेशा की तरह क्लासें चलने लगीं।
“परसों पंद्रह अगस्त है!”
केमिस्ट्री टीचर विनय सर ने हेडमास्टर के आफिस से आया नोटिस पढ़ते हुए कहा जिसे स्कूल के प्योन काली प्रसाद लेकर आये थे।
“हाँ हमको तो पता ही नहीं था!”
देवांश ने तंज कसते हुए कहा पर विनय सर उसकी बात सुने बगैर बोलते गये।
“तो कल होने वाले प्रोग्राम में जिस-जिस को पार्ट लेना हो अपना नाम लिखवा दे।“
कहने के साथ ही उन्होंने पूरे क्लास पर नजर डाली और जैसे कि उन्हें उम्मीद थी एक भी लड़का या लड़की इसके लिए उत्सुक नहीं थे।
हालांकि उन्होंने कईयों के नाम जबरदस्ती लिखने की कोशिश की लेकिन एक भी लड़के या लड़की ने अपना नाम नहीं दिया और मजबूरन उन्हें कोरा पन्ना ही भेजना पडा़।
इसके बाद लंच पीरियड में रजत ने स्कूल से भागने की कोशिश की और उसके साथ मजेदार घटना घट गई।
“भाई मैं गेट से चुपचाप निकल जाता हूँ तुम छत से बैग फेंक देना।“
रजत ने प्रतीक से कहा और प्रतीक ने हाँ कर दिया।रजत के निकलने के पाँच मिनट बाद प्रतीक ने उसका बैग लिया और सीढ़ियों की ओर बढ़ गया जबकि ध्रुव और जय की तरह उसके और भी कई दोस्त प्रतीक के पीछे-पीछे चल पड़े।
उस दिन बाहर खिली हुई धूप थी और ध्रुव प्रतीक के पीछे सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर पहुंच गया जहाँ प्रतीक बायीं ओर मुड़ गया और दो कदम बाद ही छत की मुंडेर के पास खड़ा था जिसकी दीवार उसके सीने से कुछ इंच नीचे थी।ध्रुव ने भी उसके पीछे लटक कर देखा तो उसे बाहर सड़क पर खड़ा रजत दिख गया।
“बैग दे बे!”
नीचे खड़े रजत ने उससे बैग फेंकने के लिए कहा जबकि प्रतीक ने उसका बैग दीवार से सटाकर नीचे छोड़ दिया, हालांकि रजत को उसका बैग नहीं मिला।
“ओये तेरे की ये तो लटक गया!”
ध्रुव ने जो सामने का दृश्य देखा तो मारे हँसी के दोहरा हो गया और सिर्फ वही क्यों वहां खड़े सारे लड़के हँसने लगे।दरअसल रजत का बैग प्रतीक के हाथों से दो फुट नीचे एक लोहे की खूँटी में फँसा हुआ था जो रजत की पहुँच से काफी दूर था।जबकि वो बेचारा बुरी तरह हैरान परेशान काफी देर तक वहाँ खड़ा रहा क्योंकि वो यह तय नहीं कर पा रहा था कि वो वहां रुके या जाये।खैर प्रतीक और उसके बाकी दोस्तों ने काफी कोशिश की बैग नहीं उतार पाये और आखिरकार जब रजत भी ढेले मारकर बैग उतारने की अपनी आखिरी कोशिश में नाकामयाब हो गया तो लौट वापस स्कूल में लौट आया।
“साले मुझे पता है तूने जानबूझकर बैग फँसा दिया था।“
हिंदी की क्लास में बैठे रजत ने प्रतीक पर आरोप लगाया।
“अबे चल कमसे कम बैग तो उतर गया।“
आकर्षित ने रजत को शांत कराते हुए कहा।
जबकि ध्रुव को बेचारे रजत की हालत पर अफसोस हो रहा था।
इसके बाद उन्होंने पूरे दिन पंद्रह अगस्त को होने वाले प्रोग्राम के बारे मे बातचीत की।जबकि अगले दिन भी एक महत्वपूर्ण घटना घटी जब किसी ने हेडमास्टर जी से शिकायत कर दिया था कि ध्रुव की क्लास के लड़के मोबाइल लाते थे।और फिर उस दिन उसके क्लास के पूरे लड़कों की तलाशी ली गई जिसमें जय के बैग में एक लंचबाॅकस औय स्कूल की कॉपी-किताबों की जगह सिर्फ ढे़र सारे नागराज और सुपर कमांडो ध्रुव के कामिक बुक्स मिले और इनके अलावा उसके बैग में नन्हे सम्राट और चंपक जैसी और भी कई कहानियों की किताबे मिलीं।वहीं प्रद्युम्न के बैग में एक कंघी और एक आईने के अलावा कुछ ब्यूटी क्रीम्स, फेशवाश और एक हेयरजेल का ट्यूब मिला।जबकि देवांश के बैग में कई सारे ग्रीटिंग कार्ड्स के अलावा एक चार्जर, ईयरफोन, पावर बैंक और भी कुछ माचिस के डिब्बे मिले।लेकिन उन्हें पूरे क्लास में एक भी मोबाइल नहीं मिला जबकि आधे से ज्यादा लड़के मोबाइल लेकर आते थे और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि देवांश, विराट और प्रतीक ने अपने-अपने फोन अपने मोजों के भीतर छुपा लिया था वहीं कई लड़कों ने अपना फोन तृप्ति और उसकी सहेलियों को छुपाने के लिए दे दिया था।
“आज तो बाल-बाल बच गये!”
देवांश ने टीचर के क्लास से निकलते ही राहत में आते हुए कहा और तभी अचानक उसके मोजों में से फोन के रिंगटोन की आवाज़ सुनाई देने लगी जिसे सुनकर चेकिंग करने वाले टीचर वापस आ गए और उन्होंने देवांश की बहुत पिटाई की और उसका फोन भी जब्त कर लिया।बहरहाल हेडमास्टर जी ने उसे चेतावनी देने के बाद फोन वापस दे दिया।
                          ⭐⭐⭐
पंद्रह अगस्त!
भारत और भारत वासियों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं है ये दिन।पर अक्सर काफी लोगों के लिए यह दिन बस एक नेशनल हाॅलीडे बनकर रह जाता है और उनमें से एक ध्रुव भी था।
पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व बस उसके लिए सामान्य छुट्टी जैसे थे और हालांकि हर वर्ष चाहे वह किसी भी शहर के किसी भी स्कूल में पढ़ता रहा हो लेकिन ऐसे मौकों पर कभी वह स्कूल नहीं जाता था जबकि आज बेहद खुशी के साथ स्कूल के प्रोग्राम में हिस्सा लेने जा रहा था।
उसके अंदर के इस बदलाव की वजह इति के अलावा और कोई नहीं हो सकती थी और जाहिर है यही सही भी था।खैर आज घर से स्कूल के लिए निकलने पर खुद उसकी मम्मी और दीदी भी हैरान थीं क्योंकि दोनों ही उसके स्वाभाव से अच्छी तरह वाकिफ थीं।पर ध्रुव मुस्कुराते हुए बिना कुछ कहे स्कूल के लिए निकल गया।
स्कूल पहुंचने के बाद उसने देखा स्कूल के चौकीदार काली प्रसाद जिन्हें वो काली भईया कहता था स्कूल के बाहर मैदान में बड़ा सा स्टेज सजाने में जुटे हुए थे जिसमें स्कूल और हास्टल के अधिकतर बच्चे उनकी मदद कर रहे थे।
अंदर घुसते ही उसने काली भईया को गुड मॉर्निंग विश किया और स्टेज तक लोहे की भारी सीढ़ी ले जाने में उनकी मदद करने लगा।खैर उनकी मदद करने के बाद ध्रुव बड़े हाॅल की तरफ बढा़ जहाँ इंटरमीडिएट और हाईस्कूल की कुछ लड़कियाँ बेहद ही खूबसूरत रंगोली बना रहीं थीं।उनमें से दो को ध्रुव ने फौरन पहचान लिया।पहली तो जान्हवी थी जो उसी के क्लास में पढ़ती थी और वो प्रद्युम्न की गर्लफ्रेंड थी जबकि दूसरी लड़की यशी थी जो इति की क्लास में पढ़ती थी और उसके बारे में ध्रुव बस इतना जानता था कि वो बेहद अच्छा गाती थी।खैर उसने पास जाकर देखा और पाया कि उन लड़कियों नें रंगोली से बेहद खूबसूरत भारत का नक्शा बनाया था जिसके भीतर गाँधीजी, सरदार पटेल और भगत सिंह के चित्र भी बेहद खूबसूरती से बने हुए थे।
रंगोली से ध्यान हटाकर उसने बड़े हाॅल में चारों ओर देखा पर उसे इति कहीं भी नहीं दिखी।इसीलिए वो सीधा गैलरी से होकर अपनी क्लास की ओर चल पड़ा जहाँ उसे उसके कई दोस्त मिले पर सबसे हाथ मिलाने के बाद वो बिना रूके अंदर चला गया और सबसे पहले इति की क्लास में नजर डाली पर वो उसे वहां कहीं नहीं दिखी।हालांकि उसकी सहेली पूजा उसे जरूर दिख गई।पर वो निराश होकर अपनी क्लास की ओर चल पड़ा जहाँ जय और विराट उसका इंतजार कर रहे थे।
"तुमने उसे देखा!"
उनके पास पहुंचते ही सबसे पहले उसने यही सवाल दाग दिया।
"नहीं भाई मुझे नहीं दिखी।"
जय ने सीधा सा जवाब दे दिया।
"मुझे लगता है अभी नहीं आई वो"
विराट ने भी जय की तरह ही जवाब दिया जिसे सुनकर ध्रुव और भी हताश हो गया।और उदस होता भी क्यों न आखिर सिर्फ उसी के लिए तो आया था वो आज स्कूल।
खैर उसकी उदासी ज्यादा देर तक नहीं चली क्योंकि गौतम ने क्लास में घुसते ही चिल्ला कर उसे बता दिया कि इति बाहर बड़े हाॅल में है।ये गौतम वही लड़का था जिसे पहले दिन विजय सर ने बाहर भेंज कर दोबारा आने को कहा था।
उसकी बात सुनकर वो एकदम से उछल पड़ा और लगभग भागता हुआ बाहर गया जिसके चक्कर में हाईस्कूल की एक लड़की से टकराते-टकराते बचा।
और हॉल में पहुंचते ही उसका दिल दोगुनी तेजी से धड़कने लगा।क्योंकि बला सी खूबसूरत लग रही थी आज उसकी इति।आज लग रहा था जैसे उसने बालों में शैंपू करने के बाद ना तो बाल सुखाये थे और ना ही बाँधे थे और इसीलिए खुले बालों में वो कयामत ढा़ती हुई लग रही थी जो इस वक्त छोटी क्लास की कई लड़कियों के बीच खड़ी उसी रंगोली को देख रही थी।
खैर तभी पीछे से आकर्षित ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया जिससे वो अपनी कल्पनाओं से उबर कर वापस स्कूल के बड़े हाॅल में पहुंच गया।और तब उसने ध्यान दिया कि अकेला सिर्फ वही नहीं था जो इति को देख रहा था बल्कि और भी कई लड़के थे जो उसे घूर रहे थे और फौरन ही उसके अंदर गुस्से की जबर्दस्त लहर उठी।उसका दिल तो कर रहा था कि इति की ओर देखने वाले हर लड़के की आँखें फोड़ दे और सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि वो चीख-चीख कर बोलना चाहता था कि उसकी इति सिर्फ उसकी है और उसे किसी दूसरे को देखने का कोई अधिकार नहीं है लेकिन अफसोस चाहकर भी वो ऐसा कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि वो नहीं चाहता था कि इति को पाने से पहले ही खो दे।उस पर इति के प्यार का खुमार इस कदर चढ़ चुका था कि इति के अलावा उसे और कुछ दिखता ही नहीं था।अब ये उसके प्यार का खुमार था या उसका पागलपन जो भी था पर उसके लिए तो बस यही सब कुछ था।और उसके इस एकतरफा प्यार की नियति क्या होने वाली थी ये सिर्फ वक्त को तय करना था या उसकी किस्मत को।
इसके बाद उसने देखा कि इति ने उसे देखने के बावजूद जानबूझकर अनदेखा कर दिया जैसे कि वो म्यूजियम में लगा मोम का कोई पुतला और फिर वो दूसरी तरफ चली गई और इस बार उसके साथ ध्रुव की क्लासमेट लक्ष्मी भी थी।दोनों बड़े मैदान में टहलते हुए बातें कर रहीं थीं और उस वक्त उसके मन में भी लक्ष्मी से बात करने की इतनी जबर्दस्त इच्छा उत्पन्न हुई जितनी कि उसे पहले कभी भी अपने किसी क्लासमेट से बातें करने की इच्छा नहीं हुई थी लेकिन वो सिर्फ इति के बारे जानना चाहता था थोड़ा और ताकि उसे जल्दी ही इम्प्रेस करने के लिए कुछ कर सके।
और शायद लक्ष्मी को भी मालूम था कि वो इति को बहुत पसंद करथा था इसलिए वह इति से बातें करने के दौरान कई बार कनखियों से ध्रुव की ओर देख रही थी जोकि इस बात से बुरी तरह चिढ़ा हुआ था।
खैर लगभग एक घंटे में पूरा स्टेज सिर्फ तीन रंगों में सजा हुआ नजर आ रहा था और स्टेज के ऊपर एक कतार में सभी टीचर्स कुर्सियों पर बैठे हुए थे जिनके बीच में तीन ऊंची कुर्सियों में से एक पर हेडमास्टर उपाध्याय सर और दूसरी पर शहर के कोई वरिष्ठ अधिकारी बैठे हुए थे जबकि बीच वाली कुर्सी पर पोंपले चेहरे वाले एक अधेड़ लोकल नेता बैठे हुए थे जिन्हें सब वाकई नेताजी कहते थे।
उनके पीछे स्वतंत्रता संग्राम के कई अमर सैनिकों की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं जबकि स्टेज के बीचोंबीच एक माईक रखा हुआ था जिसके आसपास काफी सारी खाली जगह थी।वहीं विद्यालय के सभी विद्यार्थी स्टेज के सामने मैदान पर पंक्तिबद्ध लगी कुर्सियों पर क्लास के अनुसार बैठे हुए थे।दांयी और छोटी लड़कियों की कतार थी जबकि बायीं ओर सभी लड़के बैठे हुए थे।
इस तरह की बैठक व्यवस्था की वजह से ध्रुव ठीक से इति को देख नहीं पा रहा था और आखिरकार उसने ये कोशिश छोड़ ही दी और सामने स्टेज की ओर देखने लगा जहाँ पहले छोटी क्लास के और फिर बड़ी क्लास के ढेऱ सारे लड़के-लड़कियों ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत देशभक्ति गाने गाए और कईयों ने एकाध स्वतंत्रता सेनानियों पर अच्छा-खासा लेक्चर भी दिया।पर उनमें से सबसे अच्छा प्रोग्राम इति की क्लासमेट यशी का था जिसने कोई खूबसूरत देशभक्ति गीत गाया था।
खैर इसके बाद हेडमास्टर और बाकि सभी टीचर्स के आग्रह पर किसी तरह नेताजी एक जोशीला भाषण देने के लिए तैयार हो गए और सीना फुला कर माईक के सामने खड़े हो गए जिससे अचानक उन्हें जोरों से खासी आने लगी और कुछ देर बाद उनकी खासी बंद हुई तो एक बार फिर वे भाषण देने के लिए तैयार हो गए लेकिन इस बार उन्होंने सीना फुलाने की कोई बेकार कोशिश नहीं की जो कि उनके लिए अच्छा था।क्योंकि उन्हें देखकर ध्रुव को ऐसा लग रहा था कि कम से कम उनका आधा सप्ताह तो डाक्टरों से चेकअप कराने में निकल जाता होगा।और इसके बाद नेताजी जबर्दस्त जोश और बेहद उत्साह के साथ भाषण देने लगे और बिना रुके पंद्रह मिनट तक बोलते चले गए।
इस बीच कई बार लोगों ने उन्हें रोकने की  कोशिश की लेकिन नेताजी को लगा कि वे उन्हें और बोलने के लिए प्रेरित कर रहे थे।
"आदरणीय गुरुजनों एंव मेरे प्यारे बच्चों जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आज हम पंद्रह अगस्त को यहाँ गणतंत्र दिवस का त्योहार मनाने के लिए इकट्ठा हुए हैं... "
"गणतंत्र नहीं स्वतंत्रता दिवस!"
आगे बैठे प्रतीक ने चिल्ला कर कहा जबकि बाकी सभी लोग हँसने लगे।पर नेताजी ने जैसे उसकी बात को सुना ही नहीं और अपनी लय में बोलते रहे।
"आज ही के दिन हमारे देश को अंग्रेज छोड़कर लौट गये थे और इस दिन के लिये न जाने कितने वीर योद्धा शहीद हो गए।यहां तक कि गाँधी जी को अंग्रेज़ों ने फाँसी पर भी लटका दिया पर फिर भी लाला नेहरू ने हार नहीं मानी और अपनी अहिंसा की शक्ति के दम पर अंग्रेजों को देश से बाहर खदेड़ दिया...."
बिना रूके नेताजी झोंक में बोलते चले गए।
"अरे लेकिन गांधी जी को फांसी कब हुई और लाला नेहरू नहीं पंडित नेहरू थे।और उन्होंने अहिंसा की शक्ति नहीं दिखाई गांधी जी ने दिखाई थी।"
आगे बैठे कुछ लड़कों ने कड़े स्वर में उनका विरोध किया पर नेताजी ने उन्हें ये कहकर बैठा दिया कि उनको इतिहास विषय पर और मेहनत की जरूरत थी।
"मेरे बच्चों शास्त्री जी ने कहा था तुम मुझे खून दो और मैं तुम्हें खादी दूँगा।लेकिन आज मैं तुम सबसे कहता हूँ कि तुम मुझे वोट दो और मैं तुम्हें सुनहरा भविष्य दूँगा।"
"सुनहरे का तो पता नहीं लेकिन हमारा भविष्य काला जरूर हो जायेगा आपको वोट देने के बाद।"
देवांश ने तेज आवाज में कहा और फिर नेताजी ने उसे मंदबुद्धि करार दे दिया।उनके हिसाब से स्कूल के बच्चों को कम से कम इतिहास अच्छे से पढना चाहिए।वहीं कुछ दूर एक कोने में कुर्सी पर बैठे इतिहास विषय के टीचर मणि सर उनको ऐसे घूर रहे थे जैसे पहला मौका मिलते ही उनका गला दबा देने के फिराक में हों।
खैर जोश का तो पता नहीं पर उनका भाषण सुनने के बाद हँसते-हँसते ध्रुव के पेट में दर्द जरूर होने लगा।उसके हिसाब से उसने इससे मजेदार भाषण आज तक नहीं सुना था।साथ ही उसके कई दोस्त भी उसकी इस बात से इत्तेफाक रखते थे।
खैर आखिरकार किसी तरह जब पाठक जी ने जबरदस्ती उनसे माईक छीन कर उन्हें याद दिलाया कि आज स्वतंत्रता दिवस है ना कि गणतंत्र दिवस तो फिर इसी बात पर नेताजी नाराज हो गए और चुपचाप जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गए। वे यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि गणतंत्र दिवस छब्बीस जनवरी को मनाया जाता है और स्वतंत्रता दिवस पंद्रह अगस्त को जो कि आज है।उनके हिसाब से इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि आखिरकार झंडा तो दोनों दिन ही फहराया जाता था।खैर आखिरकार किसी तरह जब पाठक जी ने जबरदस्ती उनसे माईक छीन कर उन्हें याद दिलाया कि आज स्वतंत्रता दिवस है ना कि गणतंत्र दिवस तो फिर इसी बात पर नेताजी नाराज हो गए और चुपचाप जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गए।वे यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि गणतंत्र दिवस छब्बीस जनवरी को मनाया जाता है और स्वतंत्रता दिवस पंद्रह अगस्त को जो कि आज है।उनके हिसाब से इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि आखिरकार झंडा तो दोनों दिन ही फहराया जाता था।इसी तरह प्रोग्राम खत्म हो गया और सभी को लड्डू बाँटने के बाद छुट्टी दे दी गई पर इससे पहले कि ध्रुव इति को एक बार फिर देख पाता वो तेजी से निकल कर अपने घर की ओर चल पड़ी और उसे उस दिन दोबारा न देख पाने का ध्रुव को बेहद अफसोस हुआ.... To Be Continue In Next Chapter
                                      Written By
                          Manish Pandey’Rudra’

©manish/pandey/24-01-2018

4 comments: