Wednesday, January 31, 2018

Adhoore Panne@Zindgi

                  अधूरे पन्ने@जिंदगी
             (अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)

                      अध्याय-तीन
                प्यार गलती और सजा

पंद्रह अगस्त के बाद न जाने क्यों अगले तीन दिनों तक इति स्कूल नहीं आई जबकि ध्रुव रोज स्कूल आता था लेकिन इति के स्कूल न आने की वजह से उसे सब कुछ फीका-फीका सा लगता था।
हालांकि इस बीच उसके दोस्त जय और प्रद्युम्न बाकियों के साथ मिलकर उसे खुश रखने का भरसक प्रयास करते थे बात कुछ बन नहीं रही थी और ध्रुव को लगता था कि वे सभी उसकी भावनाओं को नहीं समझते थे।
खैर इसी बीच उसे देवांश और प्रतीक के बारे में और ज्यादा जानने को मिला और उसे पता चला कि हाईस्कूल की वो लड़की देवांश की गर्लफ्रेंड थी जिससे पंद्रह अगस्त के दिन वो टकराते-टकराते बचा था।उसे यह जान कर और भी जलन होने लगी कि उस लड़की ने खुद देवांश को प्रपोज किया था।हालांकि उसके हिसाब से इसमें कोई शक नहीं था कि देवांश उस लड़की से हमेशा ज्यादा अच्छा दिखता था।
इति के ना दिखाई पड़ने से वो काफी परेशान रहता था पर फिर भी उसे ज्यादा वक्त नहीं मिल पाता था ताकि वो उसे याद कर सके या उसके बारे में ज्यादा सोंच सके क्योंकि इसी बीच उसने विजय सर के पास फिजिक्स और मैथ्स की जबकि विनय सर के पास केमिस्ट्री की कोचिंग ज्वॉइन कर ली थी और अब स्कूल की छुट्टी के बाद लगातार चार बजे से सात बजे तक उसे कोचिंग पढ़ना पड़ता था।खैर उसे इससे कोई दिक्कत नहीं थी क्योंकि जैसा कि उसने सोंचा था दोस्तों के साथ कोचिंग पढ़ने में उसे बहुत मजा आता था खास कर के जब वे दोस्त प्रद्युम्न और जय जैसे हों।प्रद्युम्न तो दोनों टीचर्स की नाक में दम किये रहता था और जब तक कि कोचिंग बंद न हो जाए वो कमेंट करते रहता था।इसी दौरान ध्रुव को पता चल गया कि प्रद्युम्न और उसके बाक़ी दोस्त विजय सर को गोली क्यों कहते थे और वो इसीलिए क्योंकि एक बार जब वे किसी को डांटने लगते थे तो वे इतनी स्पीड में बोलते थे कि सारे बच्चे उनकी पहली और आखिरी लाइन छोड़ के बाकी कुछ समझ ही नहीं पाते थे
इसके बाद अगस्त का आखिरी सप्ताह शुरू हो गया और उस दिन स्कूल में पहुंचने के बाद ध्रुव की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा जब उसे पता चला कि इति स्कूल आ गई थी।
"ध्रुव!"
बड़े गेट को पार करते ही जय ने उसे पुकारा और ध्रुव अपनी साईकिल पार्किंग में खड़ी करने के बाद जय की ओर बढ़ गया।
"भाई तेरी वाली आज आई है जल्दी चल!"
जय ने उसके कंधे पर हाथ रखकर इतने उत्साह और खुशी से कहा जैसे ध्रुव के बजाए उसकी गर्लफ्रेंड आज कई हफ्तों बाद स्कूल आई हो।बहरहाल इति के स्कूल आने की न्यूज़ पाकर ध्रुव के चेहरे पर जो मुस्कान उभरी वो वाकई देखने लायक थी।और इसीलिए देर न करते हुए वो तेज कदमों के साथ गैलरी के अंदर चला गया।गैलरी से बाहर निकलते ही ध्रुव की नजर इति पर पड़ी जो तीन-चार लड़के-लड़कियों के बीच खड़ी थी और अपने सामने खड़े अदरक जैसी शक्ल वाले एक लड़के जिसका नाम सौरभ था उसीसे बहस कर रही थी जबकि तीन-चार लड़के पास खड़े हुए हँस रहे थे।
खैर इस दृश्य को देखकर उसे ज्यादा कुछ तो समझ में नहीं आया पर सौरभ की अकड़ से भरी और मवालियों जैसी असभ्य भाषा सुनकर इतना जरूर समझ में आ गया कि इति को उससे कुछ प्राब्लम थी और इतना समझते ही लगभग फौरन उसकी मुठ्ठियाँ भिंच गईं जिनसे उसका मन सौरभ का जबडा़ तोड़ने को कर रहा था पर इससे पहले की वो सौरभ पर झपटता जय ने उसे पकड़ लिया और खींचकर अपने क्लास में ले गया।
"ध्रुव भाई मैं ये नहीं कह रहा कि तुम उससे जीत नहीं पाओगे पर कुछ करने से पहले थोड़ा सोंच लो वरना बाद में पछताना पड़ेगा।"
जय ने उसे समझाने की कोशिश की जबकि गुस्से के मारे उसकी सांसे किसी धौंकनी की तरह तेज चल रही थीं।
और हालांकि जय मन ही मन जानता था कि अगर उसने ध्रुव को न रोका होता तो जरूर सौरभ उसकी चटनी बना देता क्योंकि वो हर तरह से ध्रुव से काफी ज्यादा तगड़ा था लेकिन वो ध्रुव से अपनी दोस्ती आगे बनाये रखना चाहता था इसलिए इस बारे में उसने ध्रुव को सच्चाई नहीं बताई।
"भाई सोंचो अगर इति तुम से पूछ लेती कि उनके बीच में बोलने वाले तुम कौन हो तब?"
"और क्या!"
आकर्षित और विराट ने भी जय का ही साथ दिया।
वहीं दूसरी तरफ आकर्षित की बातों ने ध्रुव को सोंचने पर मजबूर कर दिया था और धीरे-धीरे उसका गुस्सा ठंडा हो गया।
और तभी उसने खिड़की के बाहर नजर डाली जहां इति अपनी कुछ सहेलियों के साथ खड़ी थी और फिलहाल वह भी ध्रुव को देख रही थी।ठीक उसी वक्त उसका सारा गुस्सा ठंडा हो गया और अब उसे सौरभ की परवाह बिल्कुल भी नहीं थी।बल्कि अब तो वो बस इति के बारे में सोंचना चाहता था।
सिर्फ उसी के बारे में...
खैर प्रेयर के बाद ध्रुव और जय दोनों ही आज देवांश के पास बैठ गये क्योंकि प्रद्युम्न आज स्कूल नहीं आया था इसलिए दोनों उसे काफी ज्यादा मिस कर रहे थे।
"यार ये इति की फ्रैंड्स आज बार-बार इधर ही क्यों देख रही हैं?"
देवांश ने ध्रुव और जय से सवाल किया जिसके जवाब में दोनों ने कंधे उचका दिये।
"मुझे क्या पता!
उसने गुस्से में जवाब दिया क्योंकि इससे उसे काफी चिढ़ हो रही थी।
हालांकि ध्रुव इति को नहीं देख पा रहा था लेकिन फिर भी वह उसी के बारे में सोंच रहा था।
"यार ये बोरिंग क्लास और कितनी देर चलेगी?"
जय ने द्रव्यमान तुल्यता शब्द को तीसरी बार काट कर सही करते हुए पूछा।
"जल्दी निपट जाये वही अच्छा है!"
आगे बैठे अमित ने कहा जबकि उसके पास बैठे प्रतीक और विनीत पेन-फाइट खेल रहे थे और तभी प्रतीक ने इतनी जोर से पेन मारा कि उसके पेन का कैप उछल कर विजय सर के माथे पे लगा और फौरन उनके मुँह से एक भद्दी गाली निकल गई।
"किस गधे ने मारा है ये?"
उन्होंने हवा में पेन का कैप लहराते हुए पूछा लेकिन सब खामोश रहे।
"अभी खुद बता दो तो कम मार पडे़गा नहीं तो बाद में ज्यादा मार पडे़गा!"
जब किसी ने कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने कैप का पेन और उसे फेंकने वाले को खोजने की काफी कोशिश की लेकिन उन्हें दोनों में कोई भी नहीं मिला क्योंकि प्रतीक ने पेन अपने मोजे में छुपा लिया था।
इसके बाद लगातार तीन और बोरिंग क्लासेज के बाद जब लंच पीरियड आया तो उन सबके चेहरे पर मुस्कान दोबारा दिखाई पड़ने लगी लेकिन उनकी मुस्कुराहट ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी।
अपना लंच खत्म करने के बाद जय और उत्कर्ष के साथ ध्रुव बड़े मैदान की ओर चल पड़ा और बीच-बीच में बार-बार दोनों उत्कर्ष को उनके कंधों पर से हाथ हटाने के लिए कहते रहे क्योंकि उत्कर्ष उनसे एक फुट ऊंचा चश्मिश लड़का था जो दिखने में उनकी तरह ही काफी दुबला-पतला था।
ध्रुव आराम से बैठा हुआ जय और प्रद्युम्न को पेन फाइट खेलते हुए देख रहा था तभी बायोलॉजी की क्लास खत्म करके उसके बाकी दोस्त भी आ गए।
"क्या ध्रुव भाई क्या कर रहे हो?"
अमित ने आकर उससे सवाल किया और उसके कंधे पर हाथ रखकर बैठ गया।
"कुछ नहीं भाई बस ऐसे ही!"
ध्रुव ने यूं ही जवाब दिया तभी उसे आकर्षित और प्रशांत आते हुए दिखाई दिये जो काफी ज्यादा हँस रहे थे।
"इन्हें क्या हुआ?"
ध्रुव ने अमित से सवाल किया।
"मुझे क्या पता?"
बोलकर अमित ने अपने कंधे उचका दिये और दूर प्रगति के साथ बैठी दीप्ति पर से नजरें हटाकर प्रशांत की ओर देखने लगा।लेकिन तबतक वे दोनों भी उसके पास ही आ गए थे।
"आज पता है हम सबके बायोलॉजी के टीचर नहीं आये थे तो राम सर हम लोगों की क्लास लेने आये थे।"
"कौन वो काले टीचर!तो?"
ध्रुव ने हैरान होते हुए पूछा क्योंकि उसे नहीं  मझ में आया था कि इसमें हँसने की क्या बात थी।
"अरे वो आज अपने बारे में पढा़ रहे थे!"
"मतलब?"
ध्रुव ने हँसते हुए प्रशांत और आकर्षित को देखा।
"मतलब आज वो हमें इंडियन कौए के बारे में बता रहे थे।"
प्रशांत के बोलते ही सिर्फ ध्रुव ही नहीं बल्कि अमित और आसपास बैठे बाकी सारे लड़के-लड़कियां भी खिलखिलाकर हँस पड़े।
इति की क्लास के बाहर से गुजरते वक्त उसकी नजर इति पर पड़ी जिसे एक बार फिर तीन-चार लड़कियों ने घेर रखा था जबकि इति के हाथ में कोई धागा लटक रहा था।खैर वो कनखियों से उसे देखते हुए बाहर मैदान में घूमने चला गया और फिर पूरे लंच पीरियड वो बाहर ही रहा जहाँ उसके बाकी सारे दोस्त गेंद धडा़क(एक तरह का गेंद से एक-दूसरे को मारने का खेल) खेल रहे थे।जिसमें उत्कर्ष को सबसे ज्यादा मार पड़ती थी क्योंकि वो सबसे ज्यादा लंबा था और इसीलिए दूसरे लड़के उसपर आसानी से निशाना लगा लेते थे।
इसी तरह कुछ देर तक मौजमस्ती करने के बाद ध्रुव और उसके दोस्त सब अपनी क्लास में आ गए पर आते वक्त ध्रुव को इति नहीं दिखाई पडी़ लेकिन इससे उसे ज्यादा परेशानी नहीं हुई क्योंकि उसे लगा शायद वो ऊपर छत पर गई होगी।और अभी वो अपने बैग से हिंदी की काॅपी निकाल ही रहा था कि तभी गौतम भागते हुए आया और उसने ध्रुव का कंधा पकड़ लिया और जोर-जोर से हाँफने लगा।
खैर दोबारा सामान्य अवस्था में आते ही उसके मुँह से जो शब्द निकले उन्होंने ध्रुव का दिमाग खराब कर दिया।
"भ.... भाई वो त.... तुझे राखी बाँधने वाली है मैंनें खुद सुना वो अपनी सारी सहेलियों से बोल रही थी।"
उसने जल्दी से किसी तरह अपनी बात पूरी की लेकिन ध्रुव को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।बल्कि सिर्फ उसे ही क्यों किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
"अबे तू कहना क्या चाहता है?"
प्रतीक ने उससे सवाल किया लेकिन ध्रुव का ध्यान इस ओर नहीं था बल्कि उसका ध्यान दूसरी ओर था जब थोड़ी देर पहले उसने इति के हाथों में कोई धागा देखा था।वो धागा कोई मामूली धागा नहीं बल्कि रक्षाबंधन का धागा था और इसीलिए इति की सारी सहेलियाँ उसे सुबह से घूर रहीं थीं।
"पर राखी क्यों?"
उत्कर्ष ने सवाल किया।
"अबे तू फिर भूल गया तीन दिन बाद रक्षाबंधन का त्योहार है और कल से तीन दिनों तक स्कूल बंद रहेगा।"
अमित ने उसे याद दिलाया।
"और इसीलिए अपने यहाँ आज इसका प्रोग्राम मनाया जाना है जैसे हर साल होता है।"
आकर्षित ने पूरी बात साफ कर दी जिससे ध्रुव की हालत ऐसी हो गई कि उसे काटो तो खून नहीं इस वक्त उसका चेहरा पीलिया के किसी मरीज जैसा लग रहा था।
"... उसकी सहेलियाँ उससे कह रही थीं कि अभी प्रोग्राम में वो उसे राखी बांध दे ताकि वो बंधवाने से इंकार न कर पाए और उसका पीछा छोड़ दे।"
गौतम ने अपनी बात पूरी की जिसे सुनकर सब एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे और सच तो ये था कि उनमें से एक भी नहीं चाहता था कि ऐसा कुछ हो मगर तब वे क्या कर सकते हैं जब काफी सारे टीचर्स के सामने इति ध्रुव को राखी बाँध देखी।हालांकि उन सबको मालूम था ऐसे वक्त में चाह कर भी ध्रुव मना नहीं कर सकता था लेकिन फिर भी वे उसकी हौसलाअफजाई करने लागे ताकि वो नर्वस न हो।
"अबे भाई मैं तो बोलता हूँ तू भाग जा!"
पास खड़े रोहित ने सलाह दी जिस पर गौतम और देवांश ने सहमति जताई।
"और भागेगा किस रास्ते से!"
उत्कर्ष ने सवाल किया और यही सवाल ध्रुव के मन में भी था पर उसके मुँह से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी और उसने ये सोचकर कुछ बोलने की कोशिश नहीं कि ताकि कहीं रो ना दे।
"तुम तो गये बेटा ध्रुव!"
विनीत ने उसका मजा लेते हुए कहा।
"तुमको भी बाँधने वाली है सारा बखेड़ा तुमने ही शुरू किया है।"
गौतम ने विनीत को बताया और फौरन उसकी हालत भी ध्रुव जैसी हो गई।
"अरे यार कुछ नहीं होगा ऐसे ही किसी की हिम्मत नहीं है जो राखी बांध दे।"
आकर्षित ने बहादुरी दिखाते हुए कहा जिसपर एक बार फिर सारे लोगों ने सहमति जताई।
'लेकिन क्या हो अगर उसे जबर्दस्ती इति से राखी बंधवानी पड़े तो!नहीं वो ऐसा हरगिज़ नहीं होने देगा, किसी कीमत पर भी नहीं और अगर इति ने जबरन उसे राखी बाँधने की कोशिश की तो वो फौरन चीख-चीख कर पूरी दुनिया को बता देगा कि वो इति से प्यार करता है और इसलिए राखी नहीं बंधवायेगा बस बात खत्म!'
अभी ध्रुव का दिमाग़ इसी उधेड़बुन में उलझा हुआ था कि उनके क्लास टीचर विजय सर उन्हें बाहर बड़े हाॅल में ले जाने के लिए आ गए।
हालांकि उसने छुपकर बचने की कोशिश की पर विजय सर ने उसे पकड़कर लाइन में सबसे आगे लगा दिया।
खैर न चाहते हुए भी उसे प्रोग्राम के लिए बड़े हाॅल में जाना ही पड़ा लेकिन वो अपने दोस्तों जय, विनीत , उत्कर्ष और बाकी सबके साथ दूसरी लाईन में सबसे पीछे लगी कुर्सी पर बैठ गया जबकि विनीत उसके ठीक आगे बैठा हुआ था जिसे भी इसी बात का डर था कि शायद इति उसे भी राखी बांधने वाली थी।क्योंकि गौतम के अनुसार इति के हाथ में दो राखियाँ थीं।
"ये बेवकूफ क्या क्या रहे हैं?"
सातवें लड़के के स्पीच को सुनकर देवांश ने झल्लाते हुए पूछा।
"खून पीना चाहते हैं हमारा!"
प्रतीक ने अटपटा सा जवाब दिया।
"डबल नयन के पास और कोई और काम धंधा नाहीं है का?"
विराट ने इतिहास के टीचर कमल नयन जी के उबाऊ स्पीच के बीच में पूछा जिसका किसी ने कोई जवाब नहीं दिया ।
उधर इतिहास के टीचर अपना नीरस और लंबा स्पीच दे रहे थे।
"... और क्या किसी को पता है रक्षाबंधन का पर्व क्यों मनाया जाता है।"
लेकिन जय और आकर्षित उनके भाषण पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे।
"लड़कों की इच्छाओं का शोषण करने के लिए!"
"मुझे लगता है शायद लड़कों पर मानसिक अत्याचार करने के लिए।"
जय और आकर्षित ने अपना अलग विचार प्रकट किया हालांकि किसी टीचर ने इसे नहीं सुना और इसीलिए इतिहास के टीचर अपने झोंक में बोलते रहे।लेकिन ध्रुव को इसमें जरा भी आनंद नहीं आ रहा था।
"... और इस तरह यमराज ने अपनी बहन से रक्षासूत्र बँधवाने के बाद आजीवन उनकी रक्षा करने का वचन दिया।और इसीलिए आज हम सब रक्षाबंधन...."
एक बार फिर भरत ने उनकी बात काट दी।
"तो बोलो यमराज के दीदी की जय!"
और ध्रुव को छोड़कर बाकी सबने जोर से चिल्लाकर जयकारा लगाया जिसके कारण पीछे बैठे विजय सर और विनय सर उन्हें घूरने लगे।
इन सबके बीच जैसे जैसे वक्त बीतता जा रहा था ध्रुव की धड़कनें भी लगातार बढ़ती जा रही थीं।आखिरकार इतिहास विषय के टीचर का लम्बा-चौडा़ और नीरस स्पीच खत्म हुआ और वो समय भी आ गया जब सेवेन्थ क्लास की दो छोटी लड़कियों ने जिनमें से एक देवांश की बहन थी, दोनों ने एक-एक करके पहले हेडमास्टर उपाध्याय सर को और फिर बाकी टीचर्स के बाद सभी लड़कों को राखी बांधना शुरू किया।
इस पूरे समय के दौरान ध्रुव का दिल जोरों से धड़क रहा था लेकिन उसे बिल्कुल भी परवाह नहीं थी अगर उसके धड़कन की आवाज़ एक मील दूर भी सुनाई दे रही हो तो।
और फिर अचानक उसका सबसे बुरा डर उस पर हावी होने लगा।बड़े हाॅल में आगे बैठी इति उठकर खड़ी हो गई और उसी की ओर देखने लगी जैसे उसकी नजरें बाकी लड़कों की भीड़ में ध्रुव को ढूंढ रही हों।ध्रुव मन ही मन बस एक ही दुआ कर रहा था कि कुछ भी हो पर वो इस तरफ न आये।
"अर... हो सकता है वो पानी पीने जाने के लिए उठी हो।"
जय ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा लेकिन ध्रुव ने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि मुँह से एक अजीब आवाज निकाली जिसका मतलब जय नही समझ पाया।
"अरे नहीं वो तो इधर ही आ रही है!"
उत्कर्ष ने कहा जबकि ध्रुव ने उसे घूरकर देखा मानों कहना चाहता हो कि दिखाई उसे भी देता है पर हालात इतने अजीब थे कि उसे समझ में ही नहीं आ रहा था क्या कहे और क्या न कहे।
वहीं इति उसके जितनी करीब आ रही थी उसकी धड़कनें उतनी तेज हो रही थीं।वो बस वहाँ से उठकर भाग जाना चाहता था लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं था और अब तो ऐसा करने का कोई फायदा भी नहीं था क्योंकि इति उसके बगल में पहुंच चुकी थी और उसके हाथ में राखी का धागा साफ दिख रहा था लेकिन इसके बाद उसने आँखें मूंद लीं क्योंकि वो ये बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था।
जबकि काफी शोर-शराबे के बीच इति ने एक कलाई पर राखी बाँध दी और जब ध्रुव ने आँखें खोलीं तो पाया वह कलाई उसकी नहीं बल्कि सौरभ की थी जो उसके ठीक पीछे बैठा था।
"क्या हुआ?"
क्लास में घुसते हुए ध्रुव ने जय और बाकी लड़कों से पूछा।
"क्यों तुमने नहीं देखा?"
जय ने पलट कर उसी से सवाल किया।
"अर... दरअसल नहीं!"
ध्रुव ने जवाब दिया और उसके जवाब से जय थोड़ा हैरान नजर आने लगा लेकिन सिर्फ एक पल के लिए क्योंकि अगले ही पल वो ज्यादा रोमांचित नजर आने लगा।
"अर.. भाई वो तुम्हें नहीं सौरभ को राखी बांधने वाली थी गौतम ने झूठ बोला था।अरे उसी लड़के को जिससे सुबह उसका झगड़ा हो रहा था।"
जय ने अपना स्कूल बैग कंधे पर लटकाते हुए कहा।
"और.... उसने बँधवा लिया?"
बुरी तरह रोमांचित हो रहे ध्रुव ने भी बैग उठाते हुए पूछा और जय के साथ बाहर निकल आया।
"और क्या देखो असल में हुआ ये कि वो ठीक तुम्हारे ही पीछे बैठा था और तभी इति हाथ में राखी लिए हुए आई  और उसे जबर्दस्ती बाँधने लगी।हालांकि सौरभ ने राखी न बँधवाने  के लिए काफी जद्दोजहद किया लेकिन प्रमोद सर और विनय सर के वजह से उसे बँधवाना ही पड़ा।"
आकर्षित ने एक सांस में सबकुछ कह डाला जो ध्रुव के दूसरी तरफ था।
"तुम बच गये!"
उत्कर्ष ध्रुव की पीठ ठोकते हुए बोला।
खैर ये बात उसे कहने की जरूरत नहीं थी क्योंकि इस वक्त ध्रुव के चेहरे पर सुखद और असीम आनंद का भाव था क्योंकि जो जो लड़का इति के पीछे पड़ा था इति ने उसे राखी बाँध दिया था और अब उसका रास्ता साफ था।
"भाई देखा वो भी तुम्हें पसंद करती है और इसीलिए उसने किसी और को राखी बाँध दिया।"
प्रतीक ने बड़प्पन भरे अंदाज में कहा।
"अबे लेकिन उसे देखकर तो ऐसा लग रहा था जैसे उसे पता भी नहीं है कि तू भी लाइन में है।"
रोहित ने उनके पास से गुजरते वक्त व्यंग्य से कहा जबकि बाकी सभी उसे घूरने लगे पर किसी ने उसकी बात काटने की कोशिश नहीं की क्योंकि सबको पता था कि ऐसा हो भी सकता था।
हालांकि जय ने उसे आश्वासन देने की कोशिश की लेकिन उसके दिमाग कि सुई बार-बार घूमकर रोहित की कही बात पर अटक जाती।
घर जाते वक्त पूरे रास्ते ध्रुव बस यही सोंचता रहा कि क्या हो अगर सचमुच उसे पता भी न हो कि ध्रुव नाम का कोई लड़का उसके पीछे पड़ा है।
और देखा जाए तो ऐसा होना अपने आप में कोई बड़ी बात नहीं थी।
और अगले तीन-चार दिनों तक ध्रुव हर समय बस इसी बारे में सोंचता रहता।
"क्या बात है ध्रुव कहो तो फर्स्ट ईयर में तुम्हारे लिए अलग से एक बेंच लगवा दूँ।"
फिजिक्स की कोचिंग पढा़ते वक्त विजय सर ने उसका मजा लेते हुए पूछा क्योंकि इस बीच उन्हें न जाने किसने ध्रुव और इति के बारे में बता दिया था।
"लगवा दीजिए गुरुजी तो मजा आ जाये।"
उसकी तरफ से प्रद्युम्न ने विजय सर को जवाब दिया जबकि ध्रुव के कान गुलाबी होने लगे थे।
"अच्छा!"
विजय सर ने हँसते हुए कहा।
सिर्फ उसके दोस्तों और क्लास टीचर को ही नहीं बल्कि उसके पूरे क्लास को पता लग गया था कि वो इति के लिये पागल था।उन्हें पता था कि ये सिर्फ टाइमपास के लिये नहीं था बल्कि वो उसे सचमुच बहुत प्यार करता था।
सितंबर के पहले हफ्ते में जिस दिन से स्कूल दोबारा खुला उसने इति के साथ आने-जाने अपनी पसंदीदा साईकिल को घर पर छोड़ दिया था।
वो बस एक बार इति से बात करना चाहता था पर उसकी हिम्मत ही नहीं होती थी और वो डर जाता था कि कहीं सब शुरू होने से पहले ही ना खत्म हो जाये।
"अबे तू जा के उससे बात क्यों नहीं कर लेता?"
आकर्षित और रोहित ने इसे जोर देकर कहा।
"अर.... अभी नहीं सही वक्त आने पर करूँगा।"
ध्रुव ने हमेशा की तरह इस बार भी वही जवाब दिया जबकि वे सब पिछले गेट के पास इकट्ठे होकर खड़े थे।
"ओये फुटकर!"
रोहित ने जोर से एक लड़की को पुकारा और जैसे ही वो लड़की उसकी ओर मुड़ी वैसे ही रोहित और आकर्षित दोनों दूसरी तरफ देखने लगे।जबकि वो लड़की काफ देर तक उन्हें घूरती रही और जब अपने क्लास में जाने लगी तो ऐसा लग रहा था मानों वो अभी रो पड़ेगी।ये देखकर ध्रुव को दोनों पर बेहद गुस्सा आया पर उसने इस बारे में चुप रहने में ही भलाई समझी क्योंकि उसे उनकी दोस्ती प्यारी थी।
वो लड़की भी इति की क्लास में पढ़ती थी और पिछले कई दिनों से ध्रुव के कुछ दोस्त जैसे रोहित, सूरज और रजत उस लड़की को अलग-अलग नामों से बुलाकर चिढ़ाते थे और अक्सर लंच पीरियड में वहां से गुजरने वाली लड़कियों पर उल्टा-सीधे कमेंट्स करते थे जिसे देखकर कई बार ध्रुव का मन होता था कि उन्हें पीट दे पर वो अकेला था।
"तुम लोग उन लड़कियों को परेशान क्यों करते हो?एक दिन सबके सब इसका खामियाजा भुगतोगे!"
उसने चिढ़कर गुस्से में रोहित से कहा और सचमुच उसके अगले दिन इति और उस लड़की ने उनके बगल के क्लास में पढ़ा रहे टीचर से उनकी शिकायत कर दी जो थोड़े ज्यादा काले थे पर नाटे कद के घुंघराले बालों और तीखे नैन-नक्श वाले टीचर थे और उस दिन लंच पीरियड के आखिर में उस टीचर ने छड़ी से सारे लड़कों की एक तरफ से पिटाई कर दी।
"अबे सालों तुम लोगों के चक्कर में एक डंडा मुझे भी पड़ गया।"
ध्रुव ने अपनी बाँह मलते हुए कहा जबकि जय और प्रद्युम्न भी अपने हाथ-पांव सहला रहे थे।
"मुझे तो दो पड़ गई।"
आकर्षित और रोहित ने अपना-अपना पीठ सहलाते हुए कहा।जबकि ध्रुव ने 'तुम लोगों के साथ यही होना चाहिए' वाले अंदाज में उन्हें घूरा।
"कमीनों मुझे क्यों पिटवाया।"
उनके आगे बैठा अमित बोला जिसके आँखों में आँसू आ गए थे।जबकि वो हमेशा ऐसे समय में बायोलॉजी की लैब में रहता था और इसीलिए उसकी बात सुनकर बाकी सारे हँसने लगे।
"कमीना कालिया तो बहुत पहले से ही हमें कूंटने का कोई बढ़िया मौका खोज रहा था।"
"हाँ साले इससे बढ़िया मौका कहाँ मिलता।"
प्रतीक और विनीत ने अपनी-अपनी पीठ सहलाते हुए कहा।
खैर उस दिन इसके अलावा और कुछ खास नहीं हुआ पर अगला दिन सिर्फ ध्रुव के ही नहीं बल्कि उसके दोस्तों के जिंदगी मे भी एक भूचाल लेकर आने वाला था।
बीते दिनों की पिटाई का उन पर कुछ खास असर नहीं पड़ा था और आज जब ध्रुव अपने दोस्तों जय, विराट और वीर के साथ अपने पुराने जगह पर यानी खिड़की के बगल वाली बेंच पर बैठा था तो कुछ ऐसा हुआ जो उनके लिए बहुत बुरा था।
हालांकि उनके हिसाब से कल की पिटाई से बुरा कुछ नहीं हो सकता था।
उस दिन तीसरा पीरियड चल रहा था और क्लास में कोई टीचर नहीं था और ऐसे हालात में क्लास में बेहद शोरगुल हो रहा था।
कई लड़के-लड़कियां आपस में बातें कर रहे थे,
तो वहीं आदित्य, अरविंद, अक्षय और शोभित जैसे दो-चार लड़के कुछ पढ़ भी रहे थे।
खैर ध्रुव अपनी बेंच पर बैठा कभी-कभार इति की ओर देख लेता था।
''भाई एक बात बताओ तुम उससे सच में प्यार करते हो?''
विराट ने पूछा।
''अबे उसके एक बार बोलने पर कुछ भी कर सकता हूँ जान भी दे सकता हूँ''
ध्रुव ने घमंड से जवाब दिया।
''और अगर उसने तुझे अपने दोस्तों को छोड़ देने को बोला तो?''
''अब उसके लिए अपने दोस्तों को छोडु़ंगा साले पागल है।भाड़ में जाये वो ऐसी लड़की नहीं चाहिए।''
ध्रुव ने जवाब दिया और हालांकि उसने मन में कल्पना की कि इति और विराट में से उसे चुनना पडे़गा तो वो इति को चुनना ज्यादा पसंद करेगा।
''यार तुम ही तो एक दोस्त हो''
बोलने के साथ विराट ने उसे गले से लगा लिया।
''यार तुझे क्या लगता है वो मुझको पसंद करेगी कभी? ''
''अरे भाई तुम स्माइल तो करो उसके जैसी हजारों तुम्हारे प्यार में पड़ जायेंगी"
अबकी बार जय ने कहा।
"भाई तुम से नहीँ पटेगी तो किसी से नहीं पटेगी"
वीर ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा और बातों का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा।
"भाई हनी सिंह का वो नया वाला गाना सुने?"
वीर ने तीनों से पूछा।
"कौन सा?"
ध्रुव ने सवाल किया।
"अर... ब्रेकअप पार्टी सांग!"
"हाँ!"
जय और विराट ने एक साथ जवाब दिया जबकि ध्रुव ने सिर हिला कर मना कर दिया।
और फिर इसके बाद तीनों जोर-जोर से गाने जबकि ध्रुव हाथ का माईक बनाकर तीनों के सामने लहराता रहा।
उधर इति और उसकी फ्रैंड्स उन्हें ही देख रही थीं और उनके चेहरे पर गुस्सा बढ़ता जा रहा था लेकिन उन्होंने इसपर ध्यान नहीं दिया।
"चल भाई लंच कर लेते हैं!"
लंच पीरियड की बेल बजते ही जय और वीर ने उठते हुए कहा।
"वीर तू मेरे लंच से खा ले!"
ध्रुव ने वीर को बुलाकर कहा और इसके चारों इकट्ठे लंच करने लगे।
"अबे इति तुम लोगों की शिकायत कर रही है!"
गौतम ने आकर उन चारों को बताया और फौरन ही वे खाना छोड़कर बाहर देखने लगे जहाँ इति और उसकी सहेलियाँ गायब थीं।
"अर... कहाँ?"
वीर ने चिंतित स्वर में पूछा।
"अनुराधा मैम से!"
गौतम का जवाब सुनकर ध्रुव की आँखों के सामने उनका बेहद कठोर चेहरा घूमने लगा।हालांकि वे उनकी क्लास को हिंदी विषय पढा़ती थीं लेकिन इति की क्लास टीचर भी थीं और इसीलिए ध्रुव उनके खूंखार स्वभाव से परिचित था।इसीलिए वह इस समय परिस्थिति की गंभीरता को समझ रहा था और जाहिर है बाकी सब भी।
खैर अब जो हो चुका था उसे बदला नहीं जा सकता था।क्लास का माहौल बेहद तनावपूर्ण नजर आ रहा था इसलिए ध्रुव ने सबसे पहले वो खिड़की बंद कर दी और बाकियों की तरह किताब निकाल कर पढ़ने लगा।
तभी बाहर दरवाजे से बेहद गुस्से में नजर आ रहे विजय सर घुसे जिनके पीछे अनुराधा मैम भी थीं।
''गधों!नालायकों!तुम सबको कितनी बार समझाया है कि खिड़की के पास शराफ़त से बैठा करो पर सुनोगे कहां कल से ये खिड़की खुलनी नहीं चाहिये बंद करो तुरंत।''
उन्होंने खिड़की की ओर देखा और फिर जमकर सबको फटकारने लगे।
जैसे उनके हिसाब से बात को यहीं खत्म कर देना चाहिए था जबकि मोटे भारी-भरकम शरीर वाली अनुराधा मैम ने बेहद कडे़ स्वर में कहा-
"इन्हें ऐसे नहीं छोड़ना चाहिए!जय, वीर, विनीत और प्रद्युम्न सब के सब बाहर निकलो तुरंत।"
उन्होंने ध्रुव को छोड़कर सबको बुलाया और डरते हुए सब उठकर बाहर चले गये।जबकि ध्रुव डरा-सहमा बैठा हुआ था और उसे पक्का यकीन था कि उसका नाम भी जरूर बुलाया जायेगा।
लगभग फौरन ही प्रद्युम्न वापस आ गया जिसके चेहरे पर राहत और डर का मिलाजुला भाव था और उसकी जगह विजय सर ने आकर्षित को बुलाया।
ध्रुव का दिल जोरों से धड़क रहा था।
"मैम ये लड़का है!"
उनकी क्लास में घुसते हुए इति ने कहा जिसकी उँगली ध्रुव पर उठी हुई थी और फिर अनुराधा मैम ने उसे वापस भेज दिया जबकि उन्होंने ध्रुव को बुलाया और वो सिर झुका कर उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।
"इतनी घटिया हरकत!यह सरासर विद्यालय का अपमान है।"
जैसे वाक्य बड़बड़ाती हुई अनुराधा मैम उसे अपने पीछे चलने को कहती रहीं जबकि इति के क्लासमेट्स जो गणित विषय पढ़ रहे थे बार-बार घूमकर उन्हें ही देख रहे थे।
खैर ध्रुव बिना कुछ कहे उनके पीछे गैलरी को पार करके हेडमास्टर के आफिस में गया जहाँ उसने देखा एक दिवार के सहारे उसके बाकी दोस्त खड़े थे जबकि हेडमास्टर की कुर्सी खाली थी।और अनुराधा मैम का इशारा पाकर ध्रुव चुपचाप जय के बगल खड़ा हो गया।
"इतनी शर्मनाक हरकत पहले कभी किसी विद्यार्थी ने नहीं की।और तुम?"
उन्होंने ध्रुव की ओर मुड़ते हुए कहा जो नजरें नीची किये चुपचाप खड़ा था।
"फ्लाईंग किस उड़ाने का बहुस शौक चढ़ा है तुम्हें!"
उनकी बात सुनकर न चाहते हुए भी ध्रुव की नजरें ऊपर उठ गईं जिनमें सवालिया निशान था।
'तडा़क!'
इससे पहले कि ध्रुव कुछ बोलता उन्होंने उसके गालों पर जोरदार थप्पड़ रसीद कर दिया।
और आगे बढ़ गईं ठीक जय के सामने इसीलिए ध्रुव एकबार फिर खामोशी से सिर झुका कर नीचे देखने लगा।
"और तुम?तुम्हें बहुत अच्छा विद्यार्थी समझती थी मैं!"
कहने के बाद उसे कुछ बोलने का मौका दिये बिना ही उन्होंने जय के गालों पर भी एक थप्पड़ रसीद कर दिया।और फौरन ही जय की आँखों से आँसू गिरने लगे क्योंकि उसने कोई गलती नहीं की थी।
इति को तो ध्रुव देखता था जबकि उस दूसरी लड़की को जिसने भी उनकी शिकायत की थी उसे भी जय ने कभी नहीं चिढ़ाया था।
जय के बाद अनुराधा मैम आकर्षित के पास पहुंची।
और पहले तो बिना कुछ बोले ही उसके गालों पर जबर्दस्त चांटा रसीद कर दिया।
"और तुम तो प्रिंसिपल के लड़के हो तुम्हें तो डबल पडना चाहिए।"
कहने के साथ ही उन्होंने दूसरा चाँटा भी उसके गाल पर चिपका दिया और फौरन उसके गोरे गाल बुरी तरह से लाल नजर आने लगे और वो रोने लगा।
"तुम!"
उन्होंने वीर को देखते ही नाक सिंकोड़ लिया।
"तुम तो बोलो ही मत ये तुम्हारा दूसरा मैटर है!"
बोलने के साथ उसे भी कुछ कहने का मौका दिये बगैर उन्होंने उसके गालों पर भी एक करारा थप्पड़ जड़ दिया।
''मैम मैंनें तो कुछ किया ही नहीं''
और इससे पहले कि वे विनीत के गालों पर भी थप्पड़ जड़ देतीं उससे पहले विनीत बोलने में कामयाब तो हो गया पर अफसोस तब तक देर हो चुकी थी।
इसके बाद उन्होंने सबको क्लास में भेंज दिया जहाँ विजय सर पहले से ही मौजूद थे और उन पर तंज कस रहे थे।
खैर इसके बाद अनुराधा मैम उनकी क्लास में दोबारा आईं क्योंकि अगली क्लास उन्हीं की थी जो आधी बीत चकी थी।इसलिए बाकी समय में उन्होंने सारे लड़कों को जमकर खरी-खोटी सुनाया।
"अरे उनके क्लास में तो सिर्फ़ अटेंडेंस लेती हूँ जबकि रोज तुम लोगों को आधा घंटा पढा़ती हूँ फिर मैंने सपने में नहीं सोचा था कि तुम सब ऐसा कुछ करोगे!"
बाकियों की तरह ध्रुव भी चुपचाप बैठा रखा जबकि उसका अंतर्मन चीख-चीख कर ये पूछना चाहता था कि आखिर उसने ऐसा किया क्या था जिसकी उसे सजा मिली।
वो तो इति के सिवाय कभी किसी दूसरी लड़की की ओर आँख उठाकर देखता भी नहीं था और खुद इति के कोई बदतमीजी करके के बारे में सोच भी नहीं सकता था, उसने तो बस प्यार किया था जिसकी उसे सजा मिली थी।
इसके बाद अगली क्लास शुरू होने से पहले ध्रुव और उसकी पूरी क्लास को बड़े हाॅल में गैलरी के बगल वाले क्लास में शिफ्ट कर दिया जहाँ पहले हाईस्कूल की क्लास चलती थी।
"ये कमरा तो माचिस के डिब्बे से भी छोटा है!"
"और इसका बोर्ड भी काफी छोटा है!"
"आधी बेंचें तो टूटी हुईं हैं!"
"और यहां का तो पंखा भी खराब है!"
हर कोई शिकायती स्वर में बुदबुदा रहा था और उस दिन छुट्टी तक सब उसके आस-पास आपस में सिर सटाकर बुदबुदाते हुए उसी के बारे में बात कर रहे थे।
छुट्टी तक हर टीचर और आधे स्कूल को पता चल चुका था कि उस दिन क्या हुआ था।
वहीं उस दिन के बाद से इस पूरी घटना के लिए सब के सब सिर्फ ध्रुव को ही जिम्मेदार मान रहे थे हालांकि कोई उसके सामने नहीं कहता था पर वो जानता था कि सब उसके पीठ पीछे उसी के बारे में चर्चा करते थे।
लेकिन ध्रुव चुपचाप खामोश रहकर सब सहता रहा, उस बेचारे की गलती क्या थी यही की वो एक लड़की को पसंद करता था और उसे सिर्फ देखता था।
खैर आधे से ज्यादा सितम्बर ऐसे ही तनावपूर्ण माहौल में गुज़र गया लेकिन फिर धीरे-धीरे माहौल दोबारा हल्का-फुल्का और खुशमिजाज होने लगा।इसीलिए पुरानी घटनाओं को दरकिनार कर ध्रुव एक बार फिर किसी सामान्य स्टूडेंट की तरह रहने लगा।हालांकि अब वो इति को देखने की कोशिश नहीं करता लेकिन वो उसे भूला भी नहीं था और इसीलिए छुट्टी के बाद चुपचाप उसके साथ-साथ चलते जाता था जब तक की इति एक बंद गली में नहीं मुड़ जाती थी और ध्रुव को पूरा यकीन था कि गली में पहला या दूसरा मकान उसका ही था।
इसी तरह जिंदगी की गाड़ी धीरे-धीरे फिर एक बार पटरी पर आ गई थी।
उस दिन उनके बायोलॉजी के टीचर नील सर खाली क्लास में बैठे थे।जो गोरे चिट्टे और अच्छे कद काठी के बेहतरीन और सूडौल शरीर के मालिक थे।उनके भरे भरे गालों घनी दाढ़ी और मूँछें बहुत जंचती थीं।
और अचानक ही बातों-बातों में अचानक उन्होंने ध्रुव का नाम लिया।
"तुम्हारे क्लास में ध्रुव कौन है?"
''यस सर?''
उसने खड़े होकर पूछा।
''ओह!तुम हो''
और फिर वो थोड़ा मुस्कुरा के बोले- ''कुछ नहीं बैठ जाओ''
ध्रुव को पक्का यकीन था कि विजय सर या किसी और से उन्हें पूरा मैटर पता चल चुका होगा।
"यार तुम तो शम्मी कपूर लग रहे हो!"
उन्होंने ध्रुव के हेयरस्टाइल को देखकर कमेंट किया और उस दिन के बाद उसके दोस्तों ने भी उसे शम्मी कपूर कह कर चिढ़ाना शुरू कर दिया... To Be Continued In Next Chapter
                                      Written By
                          Manish Pandey’Rudra’

©manish/pandey/31-01-2018

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