Wednesday, January 10, 2018

Genius(जीनियस)

                         जीनियस

सफेद मखमली कुर्ता और पैजामा, उसके ऊपर केसरिया गमछा गले में लपेटे हुए और पैरों में थोड़ी पुरानी घिस चुकी चमड़े की चप्पल पहने हुए मास्टर जी मुँह में पान कूंचते हुए साथ ही बाँह के नीचे अखबार दबाये और चेहरे पर अपनी चिर-परिचित मनमोहक मुस्कान लिए हुए गांव की इकलौती पगडंडी पर तेजी से बढ़े चले जा रहे थे।
राह में मिलने वाला हर परिचित व्यक्ति बड़े ही आदर भाव से उन्हें प्रणाम करता जिसे देखकर उनके चेहरे की मुस्कुराहट थोड़ी और भी बढ़ जाती थी।
अभी मास्टर साहब कुछ दूर गये होंगे की सामने दरोगा जी की जीप आती हुई दिख गई पर मास्टर जी बिना दाएं-बाएं हुए आगे बढ़ते रहे और फिर उनके पास पहुंचते ही दरोगा जी ने भी जीप रोक दी और जल्दी से उतर कर मास्टर जी के पैर छूने लगे।
बस-बस बोलते हुए मास्टर जी ने दरोगा जी को अच्छा सा आशीर्वाद दे दिया जबकि उनकी मुस्कान साफ चौंडी़ हो गई और साथ ही ऐसा भी लग रहा था जैसे उनकी छाती दो इंच बाहर निकल गई हो।
खैर दरोगा जी ने मास्टर जी की और मास्टर जी ने दरोगा जी की अच्छे से खैर-खबर ली और बातों ही बातों में पता चला कि दरोगा जी को भी मास्टर जी ने ही पढ़ाया था।
"अच्छा बेटा हमें तनिक देर हो रही है एक शिष्य के घर जाना है!"
मास्टर जी ने अपनी चमकीली सुनहरी घड़ी में समय देखते हुए कहा और जानबूझकर दो-तीन बार दरोगा जी के सामने लहराया।
"अच्छा मास्टर जी!चलिए आपको छोड़ दूं!"
दरोगा जी ने आग्रह किया खैर मास्टर जी ने मना कर दिया।
"अरे!अरे! रहने दो बेटा बस यहीं थोड़ी दूर जाना है ये सामने वाली गली का चौथा मकान ही है।"
मास्टर जी ने सामने दिख रही एक छोटी सी संकरी गली की ओर इशारा करते हुए कहा।
"अच्छा तब मास्टर जी मैं चलता हूँ मुझे भी चौकी पहुंचना है।"
कहने के साथ ही दरोगा जी ने एक बार फिर मास्टर जी के पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया और मास्टर जी से आशीर्वाद लेकर जीप में बैठ गए और जीप स्टार्ट कर के आगे बढ़ गये।
इधर मास्टर जी होंठों पर खिली हुई मुस्कान लिए आगे बढ़ गये और जैसा कि उन्होंने कहा था सामने की गली के चौथे मकान के सामने पहुंच गये।
इस वक़्त मास्टर किसी एकमंजिला छोटे और भद्दे दिख रहे मकान के बाहर लकड़ी के दरवाजे के सामने खड़े थे।उन्होंने दो बार कुंडी खटखटायी और दूसरी तरफ से बड़बड़ाते हुए एक पचपन-छप्पन साल के आदमी ने दरवाजा खोला और मास्टर जी को दरवाजे पर देख पहले तो कुछ देर हैरान हुआ खड़ा रहा और फिर शिष्टाचार के साथ उसने उन्हें अन्दर बुलाया।
"प्रणाम गुरुजी!आईये अंदर आईये!"
कहने के साथ ही वो दरवाजे से एक ओर हट गया जबकि मास्टर जी मुस्कुराते हुए अंदर घुस गए और उन्होंने अपने चारों ओर नजर दौड़ाई।
यहां एक आंगन था जिसकी जमीन मिट्टी की थी और अंदर एक तरफ को दो खाट बिछे हुए थे परन्तु दोनों पर कोई बिछौना नहीं था बस हाथ से झलने वाले दो पंखे रखे हुए थे।वहीं थोड़ी दूर पर सत्रह-अट्ठारह साल का एक लड़का कुत्ते के  पिल्लों के साथ खेल रहा था।
और मास्टर जी को देखते ही झट दौड़ कर आया और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेने लगा।जबकि मास्टर जी ने उसके गंदे और मैले-कुचैले कपड़े देखते हुए नाक-भौं सिकोड़ लिया।
मास्टर जी के चेहरे पर आये भाव को देखते हुए वहां मौजूद उस अधेड़ उम्र के आदमी ने उस लड़के को डाँट कर भगा दिया और वो किसी मंदबुद्धि लड़के की तरह वापस उन पिल्लों की ओर बढ़ गया और तब मास्टर जी ने ध्यान दिया कि वो लड़का उन पिल्लों के साथ खेल नहीं रहा था बल्कि उनमें से एक भूरे-सफेद धब्बेदार पिल्ले के पिछले टाँग में लगे घाव को साफ कर रहा था और कुछ अजीब सा लेप लगा रहा था।
वो पिल्ला इतना दुबला पतला था कि उसे देखकर कोई भी यकीन से कह सकता था कि दो-चार दिनों में वो जरूर मर जायेगा।
खैर इस वक्त मास्टर जी गुस्से या चिढ़ के बजाए हैरानी से उस लड़के को देख रहे थे।
"आईये बैठिये मास्टर जी!"
उस अधेड़ व्यक्ति ने अपने धूल भरे गमछे से खाट साफ करते हुए कहा और मास्टर जी के बैठने के बाद पानी लेने जाने के लिए मुडा़ ही था कि मास्टर जी ने उसे टोक दिया।
"अरे सरजू भाई आज सिर्फ गुड़ पानी से काम नहीं चलेगा बल्कि आज तो मैं बिना रसमलाई खाये हिलने वाला नहीं हूँ।आखिर मेरे भूतपूर्व शिष्य और आपके बड़े बेटे ने एमएससी टाॅप जो किया है।"
चहकते हुए कहने के साथ ही मास्टर जी ने तीन दिन पुराने न्यूजपेपर का वह पन्ना खोल दिया जिसमें शहर के प्रतिष्ठित कालेज के पुरस्कार वितरण समारोह की खबरें और ढे़र सारे फोटो छपे थे और अखबार खोलने के साथ ही जोर-जोर से पढ़कर सुनाने लगे।
"नगर के प्रतिष्ठित महाविद्यालय के पुरस्कार वितरण समारोह के दौरान आदरणीय शिक्षामंत्री जी से गोल्ड मेडल और सर्टिफिकेट प्राप्त करते ग्राम पंचायत महादेव निवासी एमएससी टाॅपर निरंजन दूबे।गत वर्ष परास्नातक की परीक्षा में इन्होंने चौरासी प्रतिशत अंकों के साथ गणित विषय में समस्त महाविद्यालय में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है।इसके साथ ही आदरणीय मंत्री जी ने इस छात्र को आगे की पढ़ाई में हर संभव मदद देने का वादा भी किया है।"
इसी के साथ मास्टर जी ने अखबार बंद कर दिया और हँसते हुए चेहरे के साथ सरजू की ओर मुड़े।जिसके आँखों से लगातार आँसू टप-टप करके गिर रहे थे।मास्टर जी उठकर खड़े हुए और उन्होंने सरजू को गले से लगा लिया।
"मैं न कहता था सरजू भाई अपना निरंजन जीनियस है जीनियस और देखो आज उसने साबित भी कर दिया।अरे पर हमारा जीनियस है कहाँ?"
मास्टर जी ने सरजू को छोड़ कर दोबारा खाट पर बैठते हुए पूछा।जबकि सरजू अपने गमछे में जोरों से नाक साफ कर रहा था परंतु मास्टर जी ने उसे नजरअंदाज कर दिया और तभी सामने से हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए एक किशोर उनकी ओर चला है रहा था।उसने बेहद साफ सुथरे कपड़े पहने रखे थे और साथ ही उसने आँखों पर काले-भूरे रंग के फ्रेम का चश्मा चढा़ रखा था।स्वाभाव से वह थोड़ा दम्भी प्रकृति का लग रहा था।
"प्रणाम गुरुजी!मिठाई लेकर बस आप ही के घर आ रहा था।"
कहने के साथ ही उसने झुक कर मास्टर जी के पैर छुए और फिर सीधा होकर उनके सामने रखी कुर्सी पर बैठ गया।
"और बताईये मास्टर जी स्कूल कैसा चल रहा है?"
कहने के साथ ही उसने मिठाई का डिब्बा मास्टर जी की तरफ बढ़ा दिया।और मास्टर जी ने मुस्कराते हुए एक रसमलाई उठा ली और मुँह में भर लिया।
वहीं सरजू पानी लेने के लिए अंदर चला गया।
"सब... अच्छा चल रहा है बेटा!"
रसमलाई पूरी खा लेने के बाद मास्टर जी ने लोटे से पानी पीते हुए कहा।जबकि निरंजन ने एक बार फिर डिब्बा उनकी ओर बढ़ा दिया पर मास्टर जी ने इंकार कर दिया हालांकि उनकी आँखें उसी डिब्बे पर टिकी थीं।वहीं सरजू निरंजन के पास ही खड़ा हुआ था।
"हमारी छोड़ो बेटा तुम अपना बताओ!आगे क्या करने का विचार है तुम्हारा?"
"अरे सर मैं तो बस सिविल सर्विसेज की तैयारी करने वाला हूँ।सच कहूं तो बचपन से ही यही मेरा सपना भी था और इसी के लिए मैंनें इतनी मेहनत भी की है।साथ ही आजकल किस्मत भी साथ दे रही है तो क्यों न सिविल में ही हाथ पैर मारा जाये।"
निरंजन ने दम्भ भरे स्वर में कहा और जेब से गोल्ड मेडल निकाल कर मास्टर जी की ओर बढ़ा दिया।गोल्ड मेडल अपने हाथ में लेकर मास्टर जी निरंजन की तारीफों के पुल बांधने लगे।और ऐसे ही काफी देर तक चलता रहा।
जबकि इस पूरे समय के दौरान सरजू का दूसरा बेटा गोलू कुत्ते के पिल्ले की मरहम-पट्टी करता रहा और बीच-बीच में कभी-कभार उन तीनों की ओर भी देख लेता था।
"अच्छा मास्टर जी मैं अब चलता हूँ मुझे बैंक जाना था कुछ जरूरी काम है।"
कहने के साथ ही मिठाई का डिब्बा अपने पिताजी को पकड़ा कर लम्बे कदमों से डग भरता हुआ दरवाजे से बाहर निकल गया।
निरंजन के जाने के बाद उसका पिता सरजू उसकी जगह पर बैठ गया और मास्टर जी का हाल चाल पूछने लगा।उधर मास्टर जी ने एक बार फिर पूरे घर पर सरसरी निगाह दौड़ाई।आंगन काफी लम्बा-चौडा़ था और काफी गंदा दिख रहा था कुछ दूरी पर एक कोने में दो बकरियां बंधी हुई थीं जो हरा चारा खा रही थीं।
उन्होंने चारों तरफ की दीवारों पर नजर दौड़ाई कहीं कहीं चूने का पेंट लगा दिख रहा था जबकि अधिकतर जगहों पर चूने की पर्त पूरी उजड़ चुकी थी।अंदर की ओर दो कमरे थे और हालांकि बाहर से उनका दरवाजा बंद था फिर भी मास्टर जी ने अनुमान लगाया कि उनकी हालत इससे बेहतर नहीं हो सकती थी।
"और बताईये सरजू भाई क्या हो रहा है?"
सरजू के दूसरे लड़के पर से जो इस वक्त बकरियों को चारा डाल रहा था, निगाह हटाते हुए मास्टर जी ने सरजू से पूछा।
"क्या बताऊँ मास्टर जी बड़ी मुश्किल से गुजर हो रही है।एक बात की तो खुशी है कि बड़ा बेटा पढ़ लिख कर खूब नाम कमा रहा है पर उसमें बहुत पैसे लग रहे हैं।किसी तरह इधर-उधर से कर्ज लेकर उसे पढा़ रहा हूँ इसी उम्मीद में कि एक दिन अपने भी हालात आखिरकार अच्छे हो जायेंगे।मैं तो धन्य हो गया ऐसा बेटा पाकर।जबकि दूसरा बेटा ये है नालायक जो न कुछ पढ़ता है न कोई ढंग का काम करता है दिन भर बस जानवरों के साथ या तो आवारागर्दी करता रहता है या फिर जंगलों में भटकता फिरता है और आज-कल तौ मेरी सेहत भी बहुत खराब रहती है न जाने मेरे बाद क्या होगा इस लड़के का!"
सरजू ने अपने छोटे बेटे की ओर इशारा करके कहा और साथ ही उसके चेहरे पर अजीब सा दर्द का भाव आ गया।खैर मास्टर जी खुद नहीं समझ पा रहे थे कि उसे सांत्वना कैसे दें क्योंकि वे खुद भी उस लड़के के अजीब हरकतों से हैरान और सच कहा जाए तो थोड़े चिढ़े हुए भी थे।उन्हें तो वह लड़का पूरा मंदबुद्धि लग रहा था।
"अर.... सब ठीक हो जाएगा सरजू भाई!"
मास्टर जी इससे बेहतर कुछ नहीं कह सके और फिर घड़ी में समय देखकर चलने के लिए उठ खड़े हुए।
"अच्छा तो सरजू भाई चलता हूँ!राम-राम!"
कहने के साथ ही वे दरवाजे की ओर बढ़ गये और आगे बढ़कर सरजू ने दरवाज़ा खोल दिया।
मास्टर जी उसी पगडंडी पर लौट गए जिसपर से चलकर आये थे।सरजू उन्हें तब तक देखता रहा जब तक कि वे उसकी नजरों से ओझल नहीं हो गए।

                             ***

करीब एक साल गुजर जाने के बावजूद उसी पगडंडी पर जाते हुए मास्टर जी आज भी उतने ही जवान लग रहे थे, परन्तु आज उनके चेहरे पर वैसी मुस्कान नहीं थी जैसी उस दिन थी जब सरजू के बड़े बेटे निरंजन को एमएससी टॉप करने के लिए गोल्ड मेडल मिला था।
अपने ही विचारों में खोये मास्टर जी को रास्ते में जब एक बार किसी ने टोका तब उन्हें ध्यान आया कि वे पगडंडी छोड़कर बीच सड़क पर चल रहे थे।
वे झेंप कर पगडंडी पर उतर गए और आगे बढ़ने लगे।कुछ ही देर बाद एक बार फिर मास्टर जी उसी छोटी सी गली के उसी मकान के सामने खड़े थे।उन्होंने आसपास ध्यान से देखा और पाया कि इसबार मकान पहले की तुलना में और भी गंदा और भद्दा लग रहा था।घर की दीवारों और बाहर के चबूतरे पर काफी घास-फूस उग आए थे और ऐसा लग रहा था उन्हें कभी किसी ने भी हटाने की कोशिश नहीं की थी।
खैर मास्टर जी आगे बढे़ और उन्होंने दरवाजे की कुंडी खटखटायी, फिर वापस अपने जगह पर चले आये और दरवाजा खुलने का इन्तजार करने लगे।
इसी के साथ जैसा कि उन्होंने सोंचा था एक मिनट के अंदर ही दरवाजा खुल गया पर दरवाजा खोलने वाला सरजू नहीं था बल्कि उसका छोटा बेटा था।
जिसे मास्टर जी मंदबुद्धि कहते थे।
मास्टर जी को दरवाजे पर आया देख उसने झट से उनके पैर छुए और एक तरफ को हट गया ताकि मास्टर जी घर में घुस सकें।
उसे आशीर्वाद देने के बाद मास्टर जी अंदर की ओर बढ़ गये और उनकी नजर सामने खाट पर लेटे सरजू पर पड़ी जिसकी हालत बहुत खराब दिख रही थी।
उसके पास ही गांव के बहुचर्चित डॉक्टर सक्सेना जी भी बैठे थे जो उसके नब्ज वगैरह जांच रहे थे।और पास ही एक मोटा सफेद-भूरे चकत्ते वाला कुत्ता भी बैठा हुआ था।एक बार के लिए तो मास्टर जी उसे घूरते रह गए लेकिन अगले ही पल उन्हें याद आया कि जब पिछली बार उन्होंने उस कुत्ते को देखा था तो उन्हें यकीन था कि कुछ ही दिनों में वह मर जायेगा।पर आज वह कुत्ता पहले से ज्यादा बड़ा और बेहद तंदुरुस्त नजर आ रहा था।अभी मास्टर जी यादों के सागर में गोते लगा रहे थे तभी उनके कानों में वह आवाज़ पड़ी-
"अरे सरजू एकाध हफ्ते में तो तुम दौड़ने लगोगे बस ऐसे ही वक्त पर दवाएं लेते रहो बहुत जल्दी ही तुम एकदम ठीक हो जाओगे।"
अभी डॉक्टर सक्सेना जी सरजू को सांत्वना दे रहे थे कि उनकी नजर भी मास्टर जी पर पड़ी और वे खड़े होकर मास्टर जी का अभिवादन करने लगे।
"नमस्ते मास्टर जी! कहिए यहां कैसे आना हुआ?"
मास्टर जी की ओर हाथ बढ़ाते हुए डाक्टर साहब ने पूछा पर जवाब देने के बजाय मास्टर जी सरजू को घूरने लगे जिसका चेहरा पीला जर्द पड़ चुका था।आँखें चेहरे में गहरी धंस गईं थीं।और वो बमुश्किल पलकें हिला पा रहा था।उसका चेहरा पूरा सूख चुका था।जबकि सरजू का छोटा बेटा अभी भी उनके पास ही खड़ा था।ना चाहते हुए भी वह बार-बार खाँस रहा था और मुँह में बलगम भर जाने पर खाट के किनारे नीचे रखे एक तसले में थूक देता।मास्टर जी ने उसे नजरंदाज कर दिया।
मास्टर जी को देखकर सरजू ने भी उठकर बैठने की कोशिश की लेकिन फौरन ही मास्टर जी और डाक्टर दोनों नें उसे मना कर दिया।फिर भी उसने अपनी मरी सी आवाज में मास्टर जी को नमस्ते किया और मास्टर जी उसके पास बैठ गये।
गोलू जो अब चाय बनाने अंदर चला गया था।
डाक्टर साहब भी वहीं बैठ गए और उन्होंने दयालुता भरी निगाह सरजू पर डाली।
"अर...क...क्या हुआ है इन्हें?"
पहली बार मास्टर जी ने डाक्टर साहब से कोई सवाल किया था और डाक्टर सक्सेना ने फौरन ही जवाब दे दिया।
"टी. बी.!पिछले छः महीने से।"
डाक्टर सक्सेना ने सपाट सा जवाब दिया जिसे सुनकर मास्टर जी के मुँह से आह निकल गई।
"अरे घबराते क्यों हैं मास्टर जी कुछ दिनों में तो हमारे सरजू बाबू एकदम ठीक हो जायेंगे।
दोनों नें एकबार फिर सरजू की खाँसी को नजरअंदाज कर दिया।
तभी गोलू चाय बना कर ले आया।
उसने एक कप मास्टर जी को और दूसरा कप डाक्टर साहब को पकड़ा दिया।और खुद सरजू के पैरों के पास बैठ गया और उसके पैरों के तलवों पर कोई लेप मलने लगा जो बिल्कुल गाढ़ा हरा और काफी चिपचिपा था।उसे देखकर मास्टर जी हैरान थे जबकि डाक्टर साहब मुस्कुरा रहे थे।
"अर... ये क्या है?"
मास्टर जी ने लेप की ओर इशारा करके पूछा।
"अब ये क्या है मास्टर जी ये तो मुझे भी नहीं पता है, पर है बड़े काम की चीज।जानते हैं तीन महीने पहले जब मैं सरजू को देखने आया था तब इसकी हालत इससे भी बदतर थी।और यहां तक कि मैंनें भी जवाब दे दिया था कि इसके एक महीने से ज्यादा जीने की कोई गुंजाइश नहीं लग थी।पर आह! मैं कितना गलत था।"
कहने के बीच में डाक्टर सक्सेना जी के मुंह से हल्की सी कराह निकल गई।और फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए गोलू की ओर देखा और उसके बालों पर हाथ फेर दिया।
"कितना गलत था मैं इस बच्चे की सच्ची निष्ठा और सेवा का ही चमत्कार है जो आज सरजू हमारे बीच जिंदा है और ठीक होने वाला भी है।भगवान जाने इस बच्चे को ऐसी अजीब जड़ी-बूटियों का ज्ञान कहाँ से मिला पर ये बहुत ही लाभदायक हैं।"
कहते वक्त डाक्टर साहब के आँखों में मोती जैसी चमक और उस बच्चे के लिए बेपनाह करुणा का भाव था।
मास्टर जी ने हैरानी से उसे घूरा पर जाहिर है उन्हें भरोसा था डाक्टर सक्सेना की बातों पर और इसीलिए करुणा की भावनाओं का सैलाब उनके आँखों में भी उमड़ पड़ा।
मास्टर जी को हमेशा लगता था कि वह बच्चा मंदबुद्धि और कम विवेकशील था।पर आज उन्हें उसके गंदे कपड़े और हूलिया देखकर चिढ़ नहीं हुई थी।
"अच्छा अब मैं चलता हूँ।"
कहने के साथ ही चाय का कप रखकर डॉक्टर सक्सेना खड़े हो गए और सरजू को एक बार फिर सांत्वना देने के बाद दरवाजे की ओर बढ़ गये।
उनके पीछे-पीछे मास्टर जी भी उन्हें दरवाजे तक छोड़ने आ गये।जबकि इस पूरे दौरान गोलू अपने पिता के पैरों पर लेप लगाता रहा।
"एक ये बेटा है और एक इनका दूसरा बेटा है..."
डाक्टर साहब ने दांत पीसकर बोलना शुरू किया और मास्टर जी भी ध्यान से उनकी बात सुनने लगे क्योंकि इस पूरे दौरान उन्हे सरजू का बड़ा बेटा कहीं भी नहीं दिखाई दिया था।
"अर...क्या हुआ उसे?"
मास्टर जी ने जल्दी से उसकी बात काटकर पूछा।
"उसे कुछ नहीं हुआ पर मुझे लगता है मैंनें पूरी जिंदगी में उससे बड़ा नालायक लड़का नहीं देखा।"
डॉक्टर साहब ने दोबारा आह भरी।
"पर हुआ क्या?वह बच्चा तो बहुत ही होनहार था जीनियस था पूरा..."
बुरी तरह हैरान मास्टर जी ने कुछ कहने की कोशिश की लेकिन डॉक्टर जी ने थूक उड़ाते हुए भद्दी सी गाली दी।
"अर... माफ करना मास्टर जी पर आप उस गधे को जीनियस कह रहे हैं जिसे अपने पिता से ज्यादा परवाह अपनी है और मैंने उससे ज्यादा स्वार्थी इंसान आज तक नहीं देखा।"
कहने के साथ ही डाक्टर साहब ने एक पत्र मास्टर जी की ओर लहराया जिसे मास्टर जी ने ले लिया और पढ़ने लगे।वह पत्र सरजू के बड़े बेटे ने उसके लिए लिखा था।

"पिताजी,
             मुझे मालूम है कि इन दिनों आपकी तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ती जा रही है और सच मानिए इसका मुझे बहुत अफसोस है।पिताजी मैं आपको पत्र लिखकर परेशान नहीं करना चाहता था पर यहाँ इंस्टीट्यूट की टर्म फीस भरनी है जिसमें पाँच हजार कम पड़ रहें हैं और किसी भी तरह जितनी जल्दी हो सके रूपये मेरे एकाउंट में जमा कर दें।
                                             आपका निरंजन

पुनश्चः मैं अगले छः महीने तक नहीं आ सकता।और उम्मीद है आप पैसे जल्दी जमा करवा देंगे।"

उस पत्र के शब्दों को मास्टर जी काफी देर तक घूरते रहे जैसे उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ था कि उसमें सचमुच वही सब लिखा था जो उन्होंने पढा़ था या कहीं कुछ गलती हुई थी।
खैर तीसरी बार पत्र पढ़ने के बाद उनके चेहरे पर जबर्दस्त आक्रोश का भाव था।मन ही मन उन्होंने कई बार उसे गाली दी।पर उन्हें अब भी भरोसा नहीं हो रहा था कि वह जीनियस लड़का इतना लोभी और खुदगर्ज होगा।
उन्होंने नजरें उठाईं और सरजू की ओर देखा जिसने कभी कहा था कि ऐसा बेटा पाकर वह धन्य था।पर व्यक्तिगत रूप से मास्टर जी को यकीन था कि उनकी तरह सरजू के विचार भी अब बदल चुके होंगे।
इसके बाद मास्टर जी ने सरजू के दूसरे बेटे की ओर देखा जो इस समय सरजू को चम्मच से दवा पिला रहा था और जिसे कभी वो मंदबुद्धि समझते थे क्योंकि वह पढ़ाई में कभी अव्वल नहीं आया था अपने भाई की तरह पर इंसानियत, प्रेम और कर्तव्यपालन के मामले में उसने अपने बड़े भाई और मास्टर जी की सोंच दोनों को काफी पीछे छोड़ दिया था।
उस दिन मास्टर जी को इस सच्चाई का आभास हुआ कि जीनियस वह नहीं है जो हमेशा सिर्फ पढा़ई में अव्वल रहे बल्कि जीनियस वह है जो सही वक्त पर अपने अपनों के काम आ सके उनकी जरूरतों को समझे और वक्त आने पर उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करे।
अपने लिए तो जानवर भी जीते हैं,
अपनी भूख शांत करने लिए शिकार करते हैं और सिर्फ अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए जीते हैं।
इंसान तो वह है जो दूसरों के लिए जीता है....

                                    Written By
                         Manish Pandey’Rudra’

©manish/pandey/10-01-2018

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