Wednesday, February 21, 2018

Adhoore Panne@Zindgi

                  अधूरे पन्ने@जिंदगी
            (अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)

                        अध्याय-छः
                    प्यार का इकरार

ध्रुव के दिमाग़ में बस प्रद्युम्न के आखिरी शब्द गूंज रहे थे,
"तुझे हमारी दोस्ती की कसम!"
और बस वो इति के पीछे दौड़ पड़ा और लगभग दो या तीन कदम चलने के बाद वो इति के बराबर चल रहा था हालांकि उसकी सांसे अभी भी किसी गर्म धौंकनी की तरह चल रही थीं और दिल जबर्दस्त स्पीड से धड़क रहा था पर उसके हाथ में वो लैटर था जिसे वो बस इति को देना चाहता था।
"यहाँ मेरा वेट कर रहे थे!"
इससे पहले कि वो कुछ बोलता या कुछ बोलने की कोशिश करता खुद इति ने उससे यह सवाल कर दिया।जबकि उसके अचानक ऐसे पूछने से हैरान होकर ध्रुव उसका मुँह ताकने लगा।उसे देखकर हैरानी हुई कि पहले दिन की तरह आज उसकी बातों में गुस्से या कड़वाहट की हल्की सी भी झलक नहीं थी बल्कि इसके विपरीत पलके नीचे किये इति हल्के से मुस्कुरा रही थी।
"अर... हाँ!"
ध्रुव ने इतनी तेजी से सिर हिलाकर जवाब दिया मानों जवाब देने में एक सेकेंड लेट होने पर इति उससे बात करना बंद कर देती।खुद अपने ही जवाब पर हैरान होते ध्रुव ने इति का चेहरा देखा बहरहाल इति अब भी मुस्कुरा रही थी।
उसकी इसी मुस्कुराहट ने ध्रुव के अंदर किसी सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर दिया और जो ध्रुव उससे बातें करने से भी कतराता था आज खुलकर इति से बातें कर रहा था जबकि उसे जरा भी परवाह नहीं थी कि रोड पर चल रहे अधिकतर लोग उसे ही घूर रहे थे।
"आज स्कूल नहीं जायेंगी?आज तो इंस्पेक्शन है न?"
उसने इति से सवाल किया।
"अर... हाँ लेकिन मैं नहीं जाऊंगी दरसल मेरे नोट्स पूरे नहीं हैं।"
इति ने इतने धीमे से जवाब दिया कि सिर्फ ध्रुव सुन सके।
"और तुम भी नहीं जाओगे?"
उसने ध्रुव से सवाल किया जो अपने घुटने देख रहा था।
"नहीं... मेरा मतलब है जाऊंगा।"
उसने जवाब दिया।
"तुमने मैच में अच्छा खेला था मैं सोच रही थी काश तुम जीत जाओ।"
इति ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहा जबकि उसके गालों पर भी हल्का गुलाबीपन छा रहा था।
"अच्छा!"
ध्रुव ने लापरवाही से कहा।
"मेरा मतलब थैंक्स पर आपको तो अपने क्लास की टीम के जीतने की उम्मीद करनी चाहिए थी न?"
उसने कनखियों से इति पर नजर डालते हुए पूछा लेकिन इति ने कोई जवाब नहीं दिया बस खामोश चलती रही और ध्रव भी उसी के साथ-साथ चल रहा था।
"अच्छा तो मेरा इंतज़ार क्यों कर रहे थे?कुछ कहना चाहते थे?"
इति ने दोबारा मुस्कुराते हुए सवाल किया लेकिन ध्रुव अचानक ही अपने जूते में लगे मिट्टी के निशान में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा जबकि उसके कान गुलाबी हो रहे थे।
"अर... कुछ नहीं!"
उसकी मुठ्ठियाँ लेटर पर और तेजी से कस गईं।
खैर तब तक इति अपने घर की गली के सामने पहुंच चुकी थी और मुड़ने से पहले उसने ध्रुव पर एक नजर डाली जो जबर्दस्त कशमकश में उलझा हुआ था।
"ये आखिरी मौका है दे दे!"
उसने मन ही मन खहा और इससे पहले कि इति उस गली में जाती ध्रुव ने उसे आवाज लगाई।
"इति?"
इति फौरन उसकी तरफ मुड़ गई और ध्रुव का दिल और जोरों से धड़कने लगा।
"क्या?"
इति ने हैरानी से पूछा।
"ये लो!"
ध्रुव ने इति की ओर अपना दायां हाथ बढ़ा दिया जिसमें एक मुडा़ हुआ कागज था।
"ये क्या है?"
इति ने चेहरे पर हैरानी का भाव लाते हुए सवाल कि हालांकि शायद वह जवाब जानती थी।
"खुद ही पढ़ लेना।"
ध्रुव ने जवाब दिया और उसे पूरा विश्वास था कि अब तो इति उसपर नाराज होगी ही होगी बहरहाल उसे हैरानी हुई जब चुपचाप इति ने कागज़ ले लिया लेकिन फिर इससे पहले कि इति कुछ बोलती ध्रुव पलटकर तेजी से चल पड़ा और पिछले पाँच मिनट में घटी हर घटना उसके दिमाग में किसी फिल्म की तरह चल रही थी।उसने इति को वो लेटर बैग में रखते हुए भी नहीं देखा और न ही उस गली में जाते बल्कि वो तो खुशी से हवा में उड़ रहा था और प्रद्युम्न को सबकुछ बताने के लिए तेजी से उसकी ओर बढ़ रहा था, उसे जरा सी भी परवाह नहीं थी कि आसपास चलते लोग उसे घूर रहे थे।
और जब तीसरी बार पूरी घटना बताने के बाद ध्रुव प्रद्युम्न और जय का चेहरा देख रहा था तो उसे उन सबके चेहरों पर हैरानी का भाव देखकर बहुत सुकून मिल रहा था।
"क्या बात है भाई पार्टी कब दे रहा है?"
उत्कर्ष ने उसकी पीठ ठोंककर पूछा।
"हाँ भाई पार्टी तो बनती है!"
वीर ने भी उत्कर्ष की सुर में सुर मिलाकर कहा।
"अरे भाई हाँ तो हो जाने दो पार्टी भी होगी।"
ध्रुव ने शर्माते हुए कहा और फिर उनके हाथों के नीचे से फिसल कर दूसरी तरफ निकल गया और जाते वक्त उसने तृप्ति और उसकी सहेलियों पर उड़ती हुई निगाह डाली जो सब के सब उसे घूर रही थीं।
"इन लोगों को क्या हो गया है?"
ध्रुव ने अपने साथ चलते हुए उत्कर्ष से सवाल किया।
"अर... उन्हें पता चल गया है कि तुमने इति को प्रपोज कर दिया।"
उत्कर्ष ने सम्हल कर जवाब दिया और ध्रुव का ध्यान इस ओर गया कि बोलते वक्त उसके कान गुलाबी हो रहे थे।
"लेकिन उनको कैसे पता?"
ध्रुव ने हैरान होकर सवाल किया और जब उसने उत्कर्ष की ओर देखा तो उसे यह देखकर और भी हैरानी हुई कि उत्कर्ष उससे नजरें चुरा रहा था।
"अर... मैंनें बताया!दरअसल वो मुझसे पूछ रही थी कि तुम आज इतने खुश क्यों हो।"
बड़े मैदान में घूमते हुए उत्कर्ष ने जवाब दिया।जबकि ध्रुव ने बस उसे घूरकर देखा लेकिन फिर दूसरी ओर देखने लगा जहाँ स्कूल के टीचर और प्योन कालीप्रसाद काफी भागदौड़ कर रहे थे।
"एक बात पूछूँ?"
अचानक ही ध्रुव ने उत्कर्ष की ओर मुड़ते हुए सवाल किया।
"हाँ!पूछो!"
"तुम उसे पसंद करते हो न?तृप्ति को?"
उसने उत्कर्ष को गौर से देखते हुए सवाल किया लेकिन वो एक बार फिर ध्रुव से नजरें नहीं मिला रहा था बल्कि उत्कर्ष अचानक ही दूर खड़े टीचर्स की भाग-दौड़ में दिलचस्पी लेने लगा।
"आज अपना स्कूल कुछ अलग-अलग लग रहा है न!"
उत्कर्ष ने बात बदलने की कोशिश की लेकिन ध्रुव उसके गालों पर उभरी गुलाबी रंगत से उसके जवाब का बखूबी अंदाजा लगा सकता था।
"हाँ क्योंकि आज इंस्पेक्शन के लिए कुछ इंसपेक्टर आने वाले हैं मेरा मतलब है स्कूल के गवर्नर जो मैनेजमेंट के सदस्य हैं।"
उसने उत्कर्ष के चेहरे पर आये हैरानी के भाव को देखते हुए आगे जोड़ दिया।
"ओह!"
तब तक अमित भी उनके पास आ चुका था।
"मैं बस सोंच रहा था वो कैसे होंगे?"
अमित ने सोंचते हुए अजीब सा सवाल किया।
"हुम्म्!सोंचने दो!"
ध्रुव ने सोंचने की मजेदार मुद्रा बनाते हुए कहा।
"शायद इंसानों जैसे!"
उसके इस मजेदार जवाब को सुनकर दोनों हँसने लगे।
बहरहाल वह अचानक ही इति के बारे में सोंचने लगा कि क्या इति इस वक्त उसका लेटर पढ़ रही थी या वह इस वक्त तक लेटर पढ़ चुकी होगी।और अगर पढ़ चुकी होगी तो क्या इस वक्त उसके बारे में सोंच रही होगी और यह सब सोंचता हुआ वह वापस अपनी क्लास में लौट आया।
उसे यह देखकर काफी हैरानी हुई कि सब उसे ही घूर रहे थे और अरविंद, अमित, भरत, आकर्षित, देवांश, विनीत और बाकियों ने उसे जमकर बधाई दी और पार्टी की मांग करने लगे।
खैर अभी वह इस बारे में शिवन्या और बाकी दोनों लड़कियों से बातें कर ही रहा था कि तभी विजय सर हाँफते हुए क्लास में दाखिल हुए।
"सभी लोग इंस्पेक्शन करने आने वाले मेहमानों के स्वागत के लिए जल्दी से बड़े मैदान में पहुंचा।"
उन्होंने जल्दी से अपनी बात पूरी की।
"अब क्या हमें उनके ऊपर फूल भी बरसाने पड़ेंगे?"
देवांश और विनीत ने एकसाथ पूछा और ध्रुव के साथ-साथ बाकी सब भी ठहाके लगाने लगे।जबकि विजय सर उन दोनों को खा जाने वाली निगाहों से घूरते रहे पर शायद उन्हें कोई अच्छा और तीखा जवाब नहीं सूझा इसलिए वे पैर पटकते हुए वापस चले गए।
वहीं ध्रुव यह कल्पना करके और भी बुरी तरह हँस पड़ा कि थोड़ी देर बाद बड़े मैदान में इकट्ठा होकर सारा स्कूल किसी अजनबी मेहमान पर फूल बरसा रहा होगा जब वह मेहमान रौब झाड़ते हुए हाथी से उतरेगा।
बहरहाल थोड़ी देर बाद वे सब बड़े मैदान में इकट्ठे हो चुके थे जबकि विजय सर सबसे आगे खड़े अमित को सीधा खड़ा करने की बेकार कोशिश कर रहे थे।
वहीं लाइन के बीचों-बीच जय के आगे खड़ा ध्रुव बार-बार दरवाजे की ओर देख रहा था।
"उधर देखो!"
जय ने उसे इशारा किया और ध्रुव का ध्यान फौरन दूसरी ओर चला गया जहाँ उसने बाकियों से सबसे अलग और आगे खड़े कुछ लोगों को देखा जिनमें देवांश, प्रद्युम्न, अरविंद, विनीत, मोहन, भरत और इति की क्लास में पढ़ने वाला दिलीप भी मौजूद थे।जिन्होंने ड्रेस के ऊपर से अजीब रंग की खाकी रंग की शर्ट और उसी रंग की टोपी भी लगा रखी थी जिसमें से लाल रंग के फूलर निकले हुए थे।
उनके अजीब पोशाक देखकर जितनी हँसी ध्रुव को आ रही थी उतनी शायद किसी और को नहीं आ रही थी सिवाय नाइन्थ क्लास के कुछ लड़के-लड़कियों के।इसके अलावा उनके पास मौजूद चीजों को देखकर ध्रुव हँसी के मारे दोहरा हो रहा था और इसका कारण था उनके पास मौजूद म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स।
अरविंद और विनीत ने बडा़ सा ड्रम कंधे से तिरछा और अपने सामने की ओर लटका रखा था जिस पर पीटने के लिए दो बड़े डंडे भी थे जिनसे फिलहाल दोनों तलवारबाजी कर रहे थे।वहीं प्रद्युम्न और देवांश के हाथों में ट्रम्पेट(एक प्रकार का वाद्य यंत्र) था जो उन्होंने गले से लटका रखा था और मुँह से फूंक मारकर देख रहे थे जबकि काले टीचर राम सर उन्हें मना कर रहे थे और दिलीप के साथ भरत को भी ड्रम बजाना सिखा रहे थे हालांकि उनके ड्रम्स अरविंद और विनीत के ड्रमों की तुलना में आधे थे।
और सबसे बेहतरीन इंस्ट्रूमेंट मोहन के पास था जो किसी छोटे बच्चों के खिलौना गदा कि तरह लग रहा था जिन्हें हिलाने पर जोरदार छनछन की आवाज़ आती थी और जब राम सर दूसरी तरफ देख रहे होते तो मोहन उनसे देवांश के सिर पर मार देता और चुपचाप वापस अपनी जगह खड़ा हो जाता।
जबकि देवांश गालियाँ बकते हुए अपना सिर सहला रहा था।उन पांचों को इस तरह ऐसे देखकर ध्रुव को बरबस शादियों में बैंड-बाजा बजाने वालों की याद आ रही थी और यही हालत वहां खड़े अधिकतर लड़के-लड़कियों की थी लेकिन ध्रुव को अपनी हँसी रोकने के लिए अपनी उँगलियों को दाँतो के बीच दबाना पड़ रहा था।
खैर वे सब एक तरफ बाकियों से अलग एक तरफ लाइन बना कर खड़े थे और उनसे कुछ दूरी पर कुछ लड़कियाँ खड़ी थीं जिनमें यशी, यज्ञिता और वह लड़की भी थी जिसे रोहित फुटकर कहकर चिढा़ता था और जिसने जय, वीर और आकर्षित की शिकायत अनुराधा मैम से की थी।
इसके बाद जब लगभग सभी स्टूडेंट्स लाइनों में खड़े होकर एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे तभी प्लेन काॅटन का भूरा खादी वाला कुर्ता पहने और चश्मा कानों पर चढ़ाये हुए हेडमास्टर उपाध्याय जी आफिस से निकल कर बड़े मैदान में आये और आराम से खडे़ होकर मुस्कुराते हुए स्टूडेंट्स की ओर देखने लगे।
"बच्चों आज का दिन हम सभी के लिए बेहद खास है क्योंकि आज तीन दिवसीय वार्षिक निरीक्षण हेतु स्कूल के तीन गवर्नर आने वाले हैं।"
उन्होंने घड़ी की ओर देखा औलर इसके बाद बाहर बड़े लोहे के गेट की ओर देखने लगे जबकि ध्रुव के साथ बाकियों की नजरें भी उत्सुकतावश उसी दिशा में घूम गईं।
ठीक उसी पल एक बोलेरो नाटकीय ढंग से स्कूल के गेट से अंदर आती हुई दिखाई दी और दूर साईकिल स्टेंड के बाहर ही रुक गई जिसकी ओर नील सर और विजय सर के साथ खुद हेडमास्टर उपाध्याय जी भी चल पड़े।जबकि काली प्रसाद वहां पहले से मौजूद थे और उन्होंने फौरन आगे बढ़ कर बोलेरो का पिछला दरवाजा खोल दिया और उन्होंने किसी फाइव स्टार होटल के दरबान की तरह उनके सामने आगे की ओर नीचे तक झुक कर सलाम किया।
इसी के साथ पीछले दरवाजे से तीन लोग उतरे जिनमें से एक महिला थी जो काफी सभ्य और कुलीन दिख रही थीं और उन्होंने हल्की नीली कलर की चमकीले सितारों जडी़ साड़ी पर गुलाबी कार्डीगन पहन रखी थी।
"यार ये मोटू तो पूरा बेवकूफ़ लग रहा है!"
जय ने ध्रुव के कंधे पर से झांकते हुए उन मेहमानों में से एक मोटे व्यक्ति कि ओर इशारा करते हुए कहा जब उनकी ओर आते हुए वह व्यक्ति गिरते-गिरते बचा।
"मुझे भी!"
ध्रुव ने जवाब दिया बहरहाल उसने देखा कि मोटे इंस्पेक्टर के साथ आये तीसरा और आखिरी इंस्पेक्टर काफी समझदार लग रहे थे जबकि मोटे वाले के चेहरे पर गर्व का भाव था और हेडमास्टर उपाध्याय सर से हाथ मिलाते हुए उनकी रौबदार मूँछें खुशी से फड़क रही थीं और खिली हुई धूप में उनका बालों रहित सिर भी हेडमास्टर उपाध्याय सर के टकले की तरह चमक रहा था।
खैर इसके बाद स्कूल के टीचर और हेडमास्टर के साथ बाकी आगंतुक भी स्टूडेंट्स की ओर बढ़ने लगे और फौरन ही राम सर ने प्रद्युम्न और उसकी टीम को बजाने का इशारा किया और सभी एक साथ बजाने लगे बहरहाल अरविंद और दिलीप के अलावा किसी का भी सुर-ताल नहीं मिल रहा था।
"ये प्रद्युम्न क्या कर रहा है!"
ध्रुव ने जय को प्रद्युम्न की ओर इशारा करते हुए कहा जहाँ प्रद्युम्न के ट्रम्पेट से सिर्फ थूक निकल रही थी और जैसे ही हँसते हुए मोटे इंस्पेक्टर पास आये प्रद्युम्न का थूक सीधा उनके चेहरे पर पड़ा और ध्रुव के साथ बाकी सब भी खिलखिला कर हँस पड़े।
जबकि प्रद्युम्न माफी मांगने लगा।
"कोई बात नहीं ऐसा अक्सर हो जाता है ये कोई बड़ी बात नहीं है।"
मोटे इंस्पेक्टर ने चेहरे पर आये गुस्से और घिन के भाव को नजरअंदाज करते हुए कहा और रुमाल निकाल कर अपना चेहरा साफ करने लगे।
"प्रद्युम्न तो आज पिटेगा।"
ध्रुव के पीछे खडे़ आकर्षित ने हँसते हुए कहा।
"हाँ मुझे भी यही लगता है।"
अभी वे लोग इस सदमे से उबरे भी नहीं थे की मोहन का गदा जैसा इंस्ट्रूमेंट उसके हाथ से छुटकर बेहद तेजी से उनके पास खड़ी उस लड़की के सर पे लगा जिसे रोहित फुटकर कहकर चिढ़ाता था।
और वो बुरी तरह रोने-चीखने लगी जबकि ध्रुव और उसके क्लास के बाकी लड़कों की जोरदार हँसी छूट पड़ी और वहाँ मौजूद सारे टीचर और आये हुए आगंतुक उन्हें गुस्से से घूरने लगे।
खैर इसके बाद राम सर ने जबर्दस्ती उनका बजाना बंद करवा दिया और सामने देखने लगे जहाँ यशी और बाकी लड़कियाँ अनुराधा मैम के साथ जुगलबंदी में स्वागत गीत गा रही थीं।
"फूल फेंकने वाली अप्सराएँ नहीं दिख रही हैं!"
रजत ने चारों ओर नजरें दौड़ाते हुए सवाल किया।
"क्या?"
ध्रुव ने चौंक कर पूछा और बाकियों के साथ उसे घूरने लगा
"हाँ अप्सराएँ!विराट ने कहा था कि विजय सर ने फूल बरसाने के लिए अप्सराओं को बुलाया है।"
रजत ने मासूमियत से सिर हिलाते हुए बताया और ध्रुव के साथ-साथ बाकी सबकी भी हँसी छूट गई।
खैर स्वागत गीत खत्म होने के बाद हेडमास्टर उपाध्याय जी आगे आये और जोर से गला साफ करने के बाद बोले।
"तो बच्चों आज हम आपका परिचय करवाना चाहते हैं माननीया गवर्नर मैडम सुनीता अग्रवाल जी से जो भोपाल के हमारे एक बड़े विद्यालय की प्राचार्या यानी प्रिंसिपल हैं।"
हेडमास्टर उपाध्याय सर ने आई हुई कुलीन महिला का सभी स्टूडेंट्स का परिचय कराते हुए कहा जबकि वह महिला बस हल्का सा मुस्कुरा कर दोबारा शांत और गम्भीर हो गईं किसी रोबॉट की तरह जबकि ध्रुव के साथ बाकी सारे बच्चों ने जोरदार तालियां बजाईं।
"इसके बाद मैं आपका परिचय करवाता हूँ सर सुदेश चक्रवर्ती से जो इंदौर में हमारी शाखा के एक अन्य विद्यालय के हेडमास्टर और अंग्रेज़ी विषय के बड़े ही जानकार शिक्षक हैं।"
उन्होंने मोटे व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा और सारे बच्चों ने एक बार फिर तालियाँ बजाईं जबकि उन्होंने जोरदार मुस्कान के साथ गर्दन हिलाई और किसी सेलिब्रिटी की तरह हाथ लहराने लगे।
"और अब मैं आपका परिचय करवाता हूँ हमारे आखिरी इंस्पेक्टर शांतनु मौर्य जी से जो केमिस्ट्री के लेक्चरर हैं।"
हेडमास्टर उपाध्याय जी ने मुस्कराते हुए उनका परिचय दिया और शालीनता का परिचय देते हुए उस दुबले-पतले टीचर ने जिन्होंने भी कुर्ता और पैंट पहन रखा था हाथ जोड़कर खड़े हो गए और चेहरे पर मुस्कान लेकर हर स्टूडेंट्स की तरफ देखते हुए अभिवादन में अपना सिर झुकाया और फौरन सीधे खड़े हो गए।
इसके बाद एक-एक करके सारे स्टूडेंट्स वापस अपनी-अपनी क्लासों की और चल पड़े और ध्रुव आज काफी खुश था जबसे उसे पता चला था कि उनको वापस उनके पुराने क्लास में शिफ्ट कर दिया था।
"और एकदम ऐसे ही हुआ था!"
प्रगति ने ध्रुव को हैरानी से देखते हुए सवाल किया जबकि विजय सर अटेंडेंस ले रहे थे।
"हाँ!"
"मतलब उसने लेटर ले लिया ऐसे सीधे?"
शिवन्या भी उसकी कहानी सुनकर हैरान थी।
"तुम्हे क्या लगता है क्या करेगी हाँ बोलेगी या...?"
ध्रुव ने दोनों की ओर चूईंगमों के ढे़र सारे पैकेट बढ़ाते हुए पूछा।
"और भाई अगर जैसा तुमने बताया है सब कुछ वैसा ही हुआ है तो पक्का हाँ है कोई टेंशन लेने की जरूरत नहीं है"
प्रगति ने उसका हौसला बढ़ाने के लिए कहा।
"हुम्म्!हुआ तो एकदम यही था।"
ध्रुव ने सोंचते हुए जवाब दिया।
"तब तो काम बन गया भाई, समझो मामला पूरा सेट है।"
दीप्ति ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर ध्रुव अटेंडेंस बोलने के बाद बैग से काॅपी-किताबें निकालने लगा और फिर हमेशा की तरह पेन निकाल कर लिखने के लिए तैयार हो गया पर हमेशा की तरह विजय सर ने आज लिखाने के बजाय सिर्फ पढ़ाने और समझाने का फैसला किया।
इसके बाद विजय सर उन्हें निकाॅल प्रिज्म और डिस्पर्सन आफ लाइट के बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें बताने लगे जिन पर सिर्फ कुछ ही लड़के-लड़कियों का ध्यान था जैसे अरविंद, आदित्य और शोभित  जबकि बाकियों की तरह ध्रुव भी अपने दोस्तों के साथ गप्पें लडा़ रहा था।
"... और सर आइजक न्यूटन के अनुसार सूर्य की सातों किरणों में बैंगनी रंग का डिस्पर्सन सबसे ज्यादा होता है जबकि... "
अचानक बाहर से आये दुबले-पतले इंस्पेक्टर पिछले दरवाजे से कमरे में आ गए जिससे विजय सर का ध्यान भंग हो गया और इसी बीच सारे स्टूडेंट्स ने भी उन्हें आता हुआ देख लिया और फौरन सब अपने आप को व्यवस्थित करने में लग गये।
"जबकि लाल रंग का डिस्पर्सन सबसे कम।"
खैर विजय सर ने आगे पढा़ना जारी रखा और इस बीच दुबले-पतले इंस्पेक्टर हर तरफ़ घूमते रहे कई बार उन्होंने कुछ लड़कों की कापियां भी देखीं।
"वैक्यूम में लाइट की स्पीड क्या है?"
अचानक उन्होंने रजत से सवाल कर लिया और वो बेचारा किसी पिंजरे में फँसे मेमने की तरह बेहद मासूमियत से चारों ओर देखने लगा।
"पता है आपको या नहीं?"
इंस्पेक्टर ने सीधा-सीधा सवाल किया।
"जी!"
रजत ने भी सिर हिलाते हुए हाँ में जवाब दिया।
"तो बताओ!"
उन्होंने सावधानीपूर्वक विजय सर की ओर चुपके से देखते हुए कहा जो हाथों से कुछ इशारा कर रहे थे पर इंस्पेक्टर को अपनी ओर देखते पाकर अपने बालों पर हाथ फेरने लगे।
"अर.. एक सौ साठ किमी/घंटा!"
रजत ने बेहद सावधानी से जवाब दिया और उसका जवाब सुनकर आधे लोग हँस पड़े जबकि ध्रुव और उसके बाकी दोस्त हैरान थे और सबसे ज्यादा हैरान विजय सर और इंस्पेक्टर थे।
"ये तुम्हें किसने बताया?"
उन्होंने आराम से रजत से दोबारा सवाल किया।
"पढा़ था मैंनें।"
"कहाँ!"
पूछते वक्त एक बार फिर उनके चेहरे पर हैरानी का भाव आ गया।
"अर... न्युज पेपर में लिखा था आपची एक सौ साठ किमी/घंटा लाइट स्पीड।"
रजत ने बेहद मासूमियत से जवाब दिया और उसका जवाब सुनकर इंस्पेक्टर के साथ-साथ पूरी क्लास हँस पड़ी खैर इसके बाद इंस्पेक्टर ने विजय सर से थोड़ी बातचीत की और फिर वापस चले गए और उनके जाती ही विजय सर ने सारे लड़कों को डांटना शुरू कर दिया।
"गधे बेवकूफ कहीं के वो लाइट का स्पीड पूछ रहे हैं और तुम अपाची का स्पीड बता रहे थे।"
बहरहाल इसके बाद अगले पीरियड में कोई भी नहीं आया लेकिन जब तीसरे पीरियड में ध्रुव जय और प्रद्युम्न के साथ केमिस्ट्री की लैब में अपनी बाकी क्लास के साथ प्रैक्टिकल कर रहा था तब एक मजेदार घटना घटी।
"यार इसको इसमें मिला दें तो क्या होगा।"
मोहन ने एक पीले रंग का एक केमिकल दूसरे लाल रंग के केमिकल के करीब लाते हुए अरविंद से पूछा।
"पता नहीं।पर शायद इन्हें नहीं मिलाना... "
लेकिन इससे पहले कि अरविंद अपनी पूरी बात कह पाता मोहन ने दोनों केमिकल एक में मिला दिया और इसका परिणाम यह हुआ कि उसके हाथ में पकड़े हुए बीकर में विस्फोट हो गया और उसमें से ढे़र सारा पीला चिपचिपा पदार्थ उछल कर मोहन और उसके पीछे खड़े मोटे इंस्पेक्टर के मुँह पर चिपक गया जो बिना बताए चुपके से उसके पीछे जाकर खड़े हो गए थे और फौरन उनके मुँह से एक गंदी गाली निकल गई जिसके लिए उन्होंने बाद में माफी भी मांगी।
और अचानक हुए इस हादसे से सभी का ध्यान उनकी ओर चला गया और पूरी क्लास हँसने लगी सिर्फ दूर बैठे विनय सर को छोड़कर जिन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो आगबबूला हो रहे हों।
"अरेरेरे... माफ कर दीजिए गुरूजी ये सारे के सारे गधे हैं।"
कहने के साथ ही विनय सर दौड़ कर आये और अपनी पैंट की जेब से रुमाल निकाल कर उस मोटे इंस्पेक्टर का चेहरा साफ करने लगे जबकि वे थोड़े शर्मिंदा नजर आ रहे थे।
"कोई बात नहीं जाने दीजिए लड़के हैं थोड़ी शरारत तो करेंगे ही।"
कहने के साथ ही बिना इंस्पेक्शन किये वो तेजी से कमरे से बाहर निकल गए और फौरन ही उनके पीछे-पीछे विनय सर भी भागे चले गए।
और शरारती अंदाज में मुस्कुराते हुए गौतम ने पीले-भूरे लेप जैसे लिक्विड का फ्लास्क था।
खैर दस मिनट बाद जब दोबारा विनय सर लैब में दाखिल हुए तो उनका चेहरा गुस्से से उबल रहा था।
"किसने... किस गधे ने डाला था उनकी पैंट पर पिकरेट्स!"
उन्होंने हांफते हुए सवाल किया।
खैर उनके सावाल का किसी ने जवाब तो नहीं दिया पर सब हँस पड़े।
इसके बाद विनय सर ने उन सबको जमकर फटकार लगाई और मोहन को एक कोने में हाथ ऊपर करके खड़े रहने की सजा दी।बहरहाल इसके अलावा उस दिन कुछ खास नहीं हुआ सिवाय इसके कि बाकी सब्जेक्ट की पीरियड में उनका इंस्पेक्शन ठीक-ठाक रहा और अरविंद शोभित और आदित्य के साथ-साथ जय और ध्रुव ने भी सभी सवालों के जवाब बखूबी दिये।और इसके बाद छुट्टी में अपने दोस्तों से बाय करके घर जाते वक्त ध्रुव बार-बार इति और उसके दिये हुए लेटर के बारे में सोंच रहा था।
खैर शाम को फिजिक्स की कोचिंग में ध्रूव और आकर्षित जमकर मस्ती कर रहे थे।
"तुम दोनों गधे शांत रहोगे।"
आखिरकार उनकी हरकतों से तंग आकर विजय सर ने दोनों पर चिल्लाते हुए फटकार लगाई।
"हम तो शांत हैं सर चिल्ला तो आप रहे हैं।"
"आकर्षित ने फौरन जवाब दिया और कोचिंग क्लास में बैठे सारे लोग हँसने लगे जिनमें एक रिशू नाम की लड़की भी थी जिसकी हाइट काफ़ी छोटी थी और ये बात सब जानते थे कि आकर्षित उसे पटाने की कोशिश कर रहा था।
"चुप रहो नलायक!"
विजय सर ने उसे फटकारा।
"आज तुम लोगों ने स्कूल में जो इतनी घटिया हरकतें कीं हैं पूरा स्टाफ को उन तीनों इंस्पेक्टरों के सामने शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है नाक कटवा कर रख दिया मेरा तुम लोगों ने।"
विजय सर ने सबको फटकारते हुए कहा।
"लेकिन गुरूजी आपके नाक से खून तो बह नहीं रहा है!"
मोहन ने मासूमियत से सवाल किया और ध्रुव के साथ बाकी सब भी एक बार फिर खिलखिला कर हँस पड़े।
खैर कोचिंग खत्म हो जाने के बाद सब उठकर बाहर चले गए जबकि अपनी आदत के अनुसार ध्रुव रजत और आकर्षित तीनों आराम से बैठे बातें करते रहे।तीनों अक्सर उल्टा-सीधे कारनामे करते रहते थे जैसे क्लास के बीच में अचानक फोन कान से लगाकर हैलो-हैलो बोलते हुए बाहर निकल जाना और फिर कोचिंग का समय पूरा होने के बाद ही लौटना या एक दूसरे के फोन पर काल करके मजेदार रिंगटोन बजाना जिससे पूरी क्लास डिस्टर्ब हो जाती थी।
"आकर्षित!"
आकांक्षा ने आकर्षित को बुलाया।
"हाँ!क्या?"
आकर्षित के साथ-साथ ध्रुव की गर्दन भी आकांक्षा की ओर मुड़ गई जो आकर्षित को बेहद गुस्से में घूर रही थी जबकि उसने ध्रुव को देखकर हल्की सी स्माईल दी।
"तुम रिशू का पीछा क्यों करते हो?"
उसने सीधे-सीधे आकर्षित से सवाल किया जो उसका सवाल सुनकर बुरी तरह चौंक गया था जबकि ध्रुव अचानक बाहर की हलचल में दिलचस्पी लेने लगा।हर दिन वे दोनों रजत और उनके एक और दोस्त अभिषेक के साथ पहले तो रिशू के पीछे-पीछे उसके घर तक जाते थे और फिर चारों इति के घर के सामने से भी जाते थे जबकि उसका घर एक सुनसान गली में पड़ता था।
"ये तुमसे किसने कहा?"
आकर्षित ने पलट कर आकांक्षा से सवाल किया और उसकी आवाज सुनकर ध्रुव वापस क्लास में पहुंच गया जो अपनी यादों के सागर में गोते लगा रहा था।
"क्या फर्क पड़ता है लेकिन इतना समझ लो अगर दोबारा तुमने उसका पीछा किया या उसे परेशान करने की कोशिश की तो मैं तुम्हारी शिकायत तुम्हारे पापा और दीदी से कर दूंगी।"
आकांक्षा ने चेतावनी देने के अंदाज में हाथ लहराते हुए कहा और धड़धडा़ते हुए वो क्लास से बाहर निकल गई।जबकि आकर्षित ने थूक गटकने के बाद ध्रुव का चेहरा देखा और आकर्षित की तरह उसके चेहरे का भी रंग उड़ चुका था।
"ये अपने आपको समझती क्या है?"
आकर्षित ने हैरानी से देख रहे ध्रुव से सवाल किया।
"तुम्हारी मकान मालकिन!"
ध्रुव ने सच्चाई बताई।
"ओह हाँ!"
आकर्षित ने गर्दन हिलाकर अफसोस जताते हुए कहा जबकि क्लास में सिर्फ वही दोनों मौजूद थे।
"एक आईडिया है।"
ध्रुव ने मुस्कुराते हुए चुटकी बजाई और फिर कुछ देर बाद दोनों बाहर खड़े विजय सर के पास पहुंच गए।
"सरजी उस बुटकी रिशू या विशू जो भी नाम है उसका उसको समझा लीजिए एक तो रोज मेरे आगे-आगे चलती है और फिर आकांक्षा से बोलकर मेरे घरवालों से मेरी ही शिकायत करती हैं कि मैं उनका पीछा करता हूँ।"
आकर्षित ने गुर्राकर कहा और हैरान होकर विजय सर उसकी बात सुन रहे थे क्योंकि उनकी बोलती ही बंद हो गई थी।
"कहना क्या चाहते हो?"
उन्होंने हैरान-परेशान दिखते हुए दोनों से सवाल किया।
"यही कि बुटकी को समझा दीजिए कि आकर्षित के आगे-आगे चलना और इसकी झूठी शिकायत करना बंद कर दे क्योंकि ये अपने ही रास्ते से जायेगा और अगर ज्यादा दिक्कत है तो फिर अपने घर का रास्ता बदल ले।"
ध्रुव ने भी चेतावनी भरे स्वर में कहा और फिर दोनों हँसते हुए वहां से चल पड़े।
अगली सुबह ध्रुव को बहुत प्यारी लग रही थी जिसकी वजह यही थी कि आज उसे इति का जवाब मिलने वाला था।
"वो हाँ ही करेगी क्योंकि उसे मालूम था कि मैं उसे लव लेटर दे रहा हूँ और फिर भी उसने वह लेटर ले लिया जिसका मतलब वो भी मुझे पसंद करती है वरना लेटर लेती क्यों!"
ध्रुव ने आईने के सामने खड़े होकर बाल संवारते हुए खुद से कहा।
"शायद शिकायत करने के लिए सबूत के तौर पर!"
आईने ने जवाब दिया और उसके दिल में भी जरा सा खुटका उठ गया।
आज पता नहीं क्यों उसे लग रहा था जैसे घड़ी के काँटों को किसी ने जानबूझकर धीमा कर दिया हो खैर किसी तरह उसने एक घंटे का समय बिताया और कोचिंग से छूटते ही फौरन इति से मिलने चल पड़ा।
उसके आस-पास उसके कुछ दोस्त जैसे आकर्षित विराट और रोहित भी थे।
"तूने सच में उसे प्रपोज कर दिया?"
रोहित ने उतनी ही हैरानी से एक बार फिर ध्रुव से यही सवाल किया जो वह पहले ही छः बार पूछ चुका था।
"अब अगर तूने एक बार और यही सवाल किया तो मैं तेरा मुँह तोड़ दूँगा।"
ध्रुव ने गुस्से में उसे जवाब दिया जोकि बुरी तरह कांप रहा था।
"अबे इतना टेंशन क्यों ले रहा है प्रपोज थोड़ी करने जा रहा है तुझे तो सिर्फ जवाब चाहिए!"
विराट ने उसके कंधे पर हाथ रखकर समझाने की कोशिश की।
"अबे इसी बात की तो टेंशन है!"
खैर इससे पहले कि कोई कुछ और बोलता सबकी नजर दूर सामने से आती हुई इति पर पड़ी जिसने भूरे और सफेद रंग की चमकदार सलवार-कमीज पहन रखी थी जिसका मतलब था कि आज वो स्कूल आने वाली थी।खैर उसे देखते ही ध्रुव के दिल की धड़कनें किसी बेलगाम घोड़े की तेजी से दौड़ने लगीं और हमेशा खी तरह एक बार फिर उसके हाथ-पैर फूलने लगे।उसने एक बार ध्रुव की ओर देखा और फिर वापस अटनी नजरें जमीन पर गडा़ दीं।अभी वह इसी पशोपेश में था कि कैसे उससे सवाल पूछे कि इति उसके सामने से निकल गई और दूसरे रास्ते पर मुडी गई।
"अबे क्या किया तूने इतना अच्छा मौका था पूछा क्यों नहीं?"
आकर्षित ने उसकी पीठ पर धौल जमाते हुए पूछा।
"अर... कैसे पूछता उसने तो मेरी तरफ एक बार भी नहीं देखा।"
ध्रुव ने रूँधे हुए गले से जवाब दिया।
"लेकिन भाई वो तुमको इतना मस्त स्माइल दे रही थी तुम्हें तुरंत पूछ लेना चाहिए था।"
विराट ने उसके कंधे पर हाथ रखकर सांत्वना देने के लिए कहा।
"कोई बात नहीं तू स्कूल में पूछ लेना।"
आकर्षित ने समझाया और और इसके बाद सब अपने-अपने घर की राह चल पड़े।
"और फिर हमने सोचा इससे पहले कि वो हमारी कम्पलेंट करे हमने जाकर उसकी कम्पलेंट कर दी।"
अगले दिन दोनों हँसते हुए अपने बाकी दोस्तों को यह बात बता रहे थे।
"दोनों पागल हो!"
दीप्ति और शिवन्या ने हँसते हुए कहा।
"अच्छा तुम लोगों ने उसे देखा बैग तो क्लास में रखा है फिर वो है कहाँ।"
ध्रुव ने दोनों से सवाल किया जो खिड़की के किनारे बैठी थीं जहाँ पहले लड़के बैठते थे दरसल क्लास वापस चेंज करने करने के बाद सीटिंग प्लान थोड़ा बदल दिया गया था जिससे खिड़की के किनारे लड़कियां बैठें न कि लड़के।
"नहीं भाई मैंनें नहीं देखा।"
प्रगति ने दो टूक जवाब दिया।
"अबे तुम यहाँ काहे बैठे हो उधर भाभी छत पर अकेले खड़ीं हैं जाओ जल्दी।"
प्रतीक ने क्लास में घुसते ही ध्रुव से कहा।
"तुम्हें कैसे पता?"
ध्रुव ने उसी से सवाल किया।
"अर.. वो मैं भी अभी गुंजन के साथ ऊपर ही था।"
और फिर इसके बाद वो बिना किसी की बात सुने सीढ़ियों की ओर दौड़ पड़ा।
छत पर पहुँचने के बाद उसने चारों ओर नजरें दौडा़ई और पाया काफी सारे छोटी क्लास के लड़के-लड़कियां खेल रहे थे जबकि उन सबसे दूर और अलग इति छत की बाउंड्री के करीब खड़ी थी।
ध्रुव के आने की आहट पाकर अचानक इति की नजरें ध्रुव की ओर मुड़ गईं और ध्रुव की नजरें भी फौरन उसकी नजरों से टकराईं।
आमतौर पर इति उससे नजरें मिलाने से कतराती थी और उससे दूर रहने की कोशिश करती थी मगर आज वो ध्रुव से नजरें नहीं चुरा रही थी और न ही ध्रुव उससे ब्लकि आज ऐसा लग रहा था जैसे दोनों एक दूसरे की आँखों में देखकर एक दूसरे का दिल पढ़ने की कोशिश कर रहे थे।
ध्रुव इति की धड़कनें अपनी सासों की गर्मी में महसूस कर रहा था और शायद इति भी उसके दिल की धड़कन महसूस कर पा रही थी पर दोनों बिना आवाज किये एक-दूसरे को देख रहे थे जैसे आँखों ही आँखों में बातचीत कर रहे हों।
"हाय इति!यहाँ क्या कर रही हो?"
अचानक इति की कुछ फ्रैंड्स वहाँ आ गईं और दोनों हड़बड़ा गये।
"अर मैं... "
ध्रुव ने कुछ बोलने की आखिरी कोशिश की लेकिन इसके बजाए शर्माते हुए वह वापस सीढ़ियों की ओर मुड़ गया और नीचे जाते हुए आखिरी बार जब उसने इति का चेहरा देखने की कोशिश की तो यह देखकर उसे काफी हैरानी हुई कि आमतौर पर हमेशा हँसती-मुस्कुराती रहने वाली इति इस वक्त बेहद मायूस लग रही थी।
"क्या हुआ जवाब लिए?"
उसके क्लास में घुसते ही उसके दोस्तों ने सवाल किया लेकिन उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर सबको उसके जवाब का अंदाजा लग गया।
"क्या हुआ भाई?"
जय ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा जबकि वो बाकी दोस्तों से बचकर निकलने की कोशिश कर रहा था।
"अर... यार मैंनें उसे परेशान कर दिया।"
ध्रुव ने अटपटा सा जवाब दिया।
"क्या?"
"वो बहुत परेशान लग रही थी शायद मेरे लेटर की वजह से या शायद वो मुझे पसंद नहीं करती।"
ध्रुव ने मायूसी भरे स्वर में गर्दन हिलाकर कहा।
"छोड़ो भाई हो सकता है वो अभी सोंच रही हो तुम्हारे लैटर के बारे में।"
जय ने उसे समझाया।
"मुझे पूरा यकीन है वो तुम्हारा प्यार जरूर एक्सेप्ट कर लेगी।"
"हुम्म्!"
जय की बात पर ध्रुव ने जरा भी सहमति जताने कि कोशिश नहीं कि बल्कि और भी उदास और मायूस नजर आने लगा।
खैर इसके बाद प्रेयर के लिए बेल बज गई और सारे स्टूडेंट्स बड़े हाॅल की ओर बढ़ गये।बहरहाल प्रेयर के दौरान ध्रुव बार बार इति को देखने की कोशिश करता रहा और उसके चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश भी कि लेकिन इसमें उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिली।इति का भावहीन और दुखी चेहरा देखकर उसे सिर्फ निराशा हासिल हुई।
बहरहाल प्रेयर के दौरान उसका ध्यान बार-बार जय की ओर जा रहा था जो बगल वाले क्लास में बैठी एक दुबली-पतली मगर आकर्षक दिखने वाली लड़की को देख रहा था और ध्रुव को ये देखकर काफी हैरानी और खुशी हुई कि वह लड़की भी बार-बार पलट कर जय को देख रही थी।लेकिन इस बारे में उसने जय से कुछ नहीं पूछा क्योंकि वह चाहता था कि जय खुद यह बात उसे बताये।
इसके बाद प्रेयर खत्म होते ही हमेशा की तरह सारे स्टूडेंट्स अपनी-अपनी क्लासों में चले गए।
"मैम!"
इति की आवाज सुनकर अनुराधा मैम उसकी ओर मुड़ गईं जो अटेंडेंस लेकर वापस जा रही थीं।
और अचानक ही इति की आवाज सुनकर न चाहते हुए भी ध्रुव बाहर देखने लगा।
इति तेजी से उनकी ओर बढ़ रही थी और उसके हाथ में एक कागज़ का मुडा़ हुआ टुकड़ा था और अब तो उसके होश फख्ता़ हो गए एक बार फिर इति उसकी शिकायत करने जा रही थी और इस बार उसे स्कूल से पक्का निकाल दिया जाने वाला था।उसका दिल जोरदार तेजी से धड़क रहा था।
इति ने वो कागज का टुकड़ा टीचर को दे दिया जिसे वो बडे़ ध्यान से पढा रही थीं।
खैर अचानक ही ध्रुव अपनी यादों खी धुन में खो गया और अजीबो-गरीब बातें सोंचने लगा जैसे कि एक तरफ वो सर झुका कर खडा़ है और उसके आस-पास चारों तरफ टीचर इकट्ठे हो रखे थे।वहीं संध्या और वो टीचर खडी़ थीं जिनके हाथ में उसका लव लैटर था और वो उसे तेज-तेज पढ़कर सुना रहीं थीं।पास ही उसके मम्मी-पापा खड़े थे और वो गुस्से से उसे घूर रहे थे साथ ही साथ वो सब उसके वजह से शर्मिंदा थे।वो अपने दोस्तों और घरवालों से नजरें तक नहीं मिला रहा था।दूसरी ओर स्कूल के बाकी सारे लड़के और लड़कियाँ उस पर हँस रहे थे।उसे स्कूल से निकाल दिया....
आचानक देवांश ने उसे कल्पनाओं के गहरे अन्धेरे गर्त से बाहर खींचा जिसके लिये वो उसका बेहद शुक्रगुज़ार था।
"क्या हुआ भाई कहां खो गये?"
"अक्... कुछ नहीं"
उसके गले से आवाज भी बहूत मुश्किल से आ रही थी और डरते-डरते उसने दोबारा बाहर देखा जहाँ इति अपनी क्लास में बैठी हिंदी पढ़ रही दी जबकि अनुराधा मैम अटेंडेंस शीट लेकर वापस जा चुकी थीं।
लेकिन चूंकि लंच पीरियाड तक ऐसी कोई घटना नहीं हुई इसीलिए आखिरकार ध्रुव को प्रद्युम्न की इस बात से सहमत होना ही पड़ा कि वह कोई और कागज था और लंच पीरियड खत्म होते-होते उसे मालूम चल चुका था कि वह उसका दिया हुआ लेटर न हो करके सामान्य एप्लीकेशन था क्योंकि लंच पीरियड शुरू होते ही इति बैग उठाकर बाहर निकल गई।
बहरहाल इस बात से उसे ज्यादा दिक्कत नहीं हुई क्योंकि लंच पीरियड खत्म होते ही अगली क्लास लग गई जबकि इंस्पेक्टर अपने ढंग से स्कूल का मूल्यांकन कर रहे थैए और उसी दिन शाम तक सब वापस चले गए।
"अरे बेवकूफ़ों क्या किया तुम लोगों ने?"
शाम की फिजिक्स कोचिंग में घुसते ही ध्रुव आकर्षित और उत्कर्ष पर सवाल उठा दिया विजय सर ने जबकि तीनों बुरी तरह हैरान थे।
"क्या हुआ सर?"
उत्कर्ष ने बेहद मासूमियत के साथ विजय सर से सवाल किया।
"अरे गधों कल शाम को तुम लोगों ने किसे पीट दिया?"
उन्होंने ध्रुव और आकर्षित से सवाल किया और सारे लड़के-लड़कियां उन्हें ही देखने लगे।
"हमने सर?"
आकर्षित ने चेहरे पर हैरानी और मासूमियत का जबरदस्त भाव लाते हुए पूछा और उसने ध्रुव को देखा जो हल्का-फुल्का मुस्कुरा रहा था।
"अरे वो!वो तो सर एक लड़का इस बुटकी.... अर... साॅरी रिशू को छेड़ रहा था तो हमने जमकर कूट दिया साले को।"
आकर्षित ने मुस्कराते हुए जवाब दिया।
"छेड़ रहा था?"
विजय सर ने हैरानी से उन तीनों को देखा।
"हाँ सर वो हुआ ये कि हम लोग घर जा रहे थे और अचानक एक लड़के ने इनके सामने लाकर बाइक रोक दी और इनसे पूछा कहाँ जा रही हो तो इन्होंने पूछा तुमसे मतलब?और बस हमने साले को कूट दिया जमकर।
"अरे मूर्खों वो इसका भाई था।"
"क्या?"
तीनों एक साथ हैरान होकर कोरस में बोल पड़े।
इसके बाद उन तीनों कि न तो एक-दूसरे को देखा और न ही रिशू की ओर देखा बस चुपचाप सिर झुका कर खड़े रहे।जबकि विजय सर करीब पाँच मिनट तक उन्हें डाँटते-फटकारते रहे।
"हमारे गाँव में एक लड़का रहता था।और उसका नाम था मूर्खानंद... "
"सब शांत रहो सरजी अपने बचपन की कहानी सुनाने वाले हैं।"
विजय सर अपनी आदत के अनुसार उनका मजाक बनाने के लिए एक कहानी सुनाने लगे लेकिन ध्रुव ने बीच में बोलकर उनका ही मजा ले लिया और बाकी सारे लड़के-लड़कियां हँसने लगे।और जब आखिरकार विजय सर से कुछ कहते नहीं बन पड़ा तो गुस्से में उसे घूरते हुए क्लास से बाहर निकल गए और जब वापस आये तो चुपचाप पढ़ाने लगे।
इसके बाद अगले कुछ दिनों तक वो किसी भी तरह इति से अपने लेटर का जवाब लेना चाहता था मगर हर बार किसी न किसी वजह से वो उससे बात नहीं कर पाता था।
दिसम्बर महीने का पहला हफ्ता निकल चुका था और इस बीच ठंड काफी ज्यादा बढ़ गई थी।टीचर क्लासों के बजाय बाहर बड़े मैदान में पढ़ाना ज्यादा पसंद करते थे जबकि इस दौरान विजय सर एक नया नियम बना दिया कि सप्ताह के पहले तीन दिन आधे लड़के-लड़कियां और अगले तीन दिन बाकी आधे लड़के-लड़कियां अलग-अलग प्रैक्टिकल करते थे और जिनके प्रैक्टिकल का टर्म नहीं होता वो बाहर बड़े मैदान में बैठ कर धूप का आनंद लेते थे और इसी तरह उस दिन ध्रुव घूमते-घूमते बाहर बड़े मैदान में आ गया।
"भाई वो देख!"
जय ने एक ओर इशारा करते हुए कहा।
"क्या?"
बोलने के साथ ही ध्रुव की गर्दन उसी दिशा में मुड़ गई और इति को वहाँ बैठे देख उसका दिल खिल उठा।
"ओये ध्रुव जय दोनों यहाँ आओ।"
इति से थोड़ी दूर बैठे विराट ने उन्हें अपने पास बुलाया और उनकी ओर चलते हुए ध्रुव ने देखा कि वहाँ पहले से ही अमित वीर और मोहन भी बैठे थे जबकि उनसे कुछ ही दूर अपनी बेस्ट फ्रेंड शशि के साथ इति भी बैठी हुई थी।
बहरहाल मुस्कुराते हुए ध्रुव उनकी ओर चल पड़ा और  जाकर विराट और वीर के बीच में बैठ गया।
"प्रद्युम्न कहाँ है?"
ध्रुव ने विराट से पूछा।
"वो प्रैक्टिकल करने गया है!"
विराट ने उसे आँख मारते हुए बताया।
"तेरी आँख में क्या हुआ?"
जय ने उसे छोड़ते हुए पूछा।
"अर कुछ नहीं कचरा फँस गया था।"
कहने के साथ ही उसने पहले ध्रुव की ओर देखा जिसकी नजरें इति पर थीं और फिर इति की ओर देखा जोकि अपनी बाॅट्नी की फाइल लेकर बैठी थी।
"क्या मैं तुम्हारा फाईल देख सकता हूँ?"
विराट ने अचानक ही इति से सवाल किया और इसके साथ ही ध्रुव लगभग उछल पड़ा और विराट को ऐसे घूरने लगा जैसे उसने इति को प्रपोज कर दिया हो।
"अर... हाँ क्यों नहीं?"
कहने के साथ ही इति ने अपनी फाइल उसकी ओर बढ़ा दी और सारे लड़के फाइल देखने लगे।
"एक्चुअली मेरा आर्ट ज्यादा अच्छा नहीं है!"
इति ने शर्माते हुए कहा।
"ओह लेकिन ये बहुत अच्छा है।"
वीर ने फौरन जवाब दिया।
"हाँ वैसे अपने ध्रुव भाई का आर्ट भी काफी बेहतरीन बनता है।"
विराट ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा जबकि ध्रुव उसे गुस्से में घूरने लगा।
"ध्रुव भाई कोई जलवा दिखाओ!"
अमित ने उसकी पीठ ठोंकते हुए कहा।
"क्या जलवा पागल हो सब क्या?"
खैर आखिरकार अपने दोस्तों के काफी ज्यादा कहने पर उसने इति से एक कोरा कागज और पेंसिल माँग लिया और काफी देर तक न जाने क्या-क्या बनाता रहा और आखिरकार जब उसने पेंसिल वापस इति को लौटा दी ओर वीर उसके हाथ से पेपर छीनकर खुद देखने लगा और बाकी सबको भी दिखाता रहा जिसमें इति का स्केच हूबहू बना हुआ था।
इति ने उसकी ओर देखा और फौरन उसके गाल गुलाबी हो गए।
खैर इसके बाद वे काफी देर तक वहाँ बैठे बातें करते रहे और ध्रुव कभी-कभी चुपके से इति की ओर भी देखता था जो किसी सोंच में डूबी लग रही थी।बेल बजने के बाद वे सब अपने-अपने क्लासों में लौट गए।
"आज तो मैं उससे जवाब लेकर रहूँगा।"
ध्रुव ने निश्चय करते हुए कहा और छुट्टी की बेल बजते ही बैग उठाकर फौरन बाहर निकल गया लेकिन उसे इति कहीं नहीं दिखी।
"कहाँ गई?"
उसने खुद से सवाल किया।
"इति को खोज रहे हो वो पहले ही चली गई।"
उसके पीछे से आते हुए दिलीप ने उसे बताया जो इति का क्लासमेट था।
दिलीप की बात सुनकर ध्रुव काफी उदास हो गया और इस निश्चय के साथ घर चल पड़ा कि अगले दिन कैमिस्ट्री की कोचिंग से लौटते समय अपना जवाब जरूर ले लेगा।हालांकि उसे इस बात का बेहद डर था कि कहीं वो उसे पाने से पहले ही न खो दे।
इसके बाद अगले दिन उसने इति का काफी देर तक इंतजार किया मगर इति उसे नहीं मिली और ध्रुव की उदासी बढ़ती ही गई।
"क्या हुआ भाई?"
प्रद्युम्न ने मैथ्स की खाली क्लास में उससे सवाल किया मगर ध्रुव चुपचाप बैठा रहा बस चुपचाप खिड़की के बाहर अपनी क्लास में बैठी इति की खाली बेंच को देखता रहा जो अभी ऊपर केमिस्ट्री की लैब में थी।
"इसे क्या हुआ?"
उसे जवाब न देते देख प्रद्युम्न ने जय और आकर्षित से पूछा।
"कुछ नहीं हुआ बस जवाब नहीं मिला इसीलिए परेशान है।"
जय और आकर्षित ने उसे बताया।
"अरे यार बस इतनी सी बात के लिए परेशान हो रहे हो अभी तेरा भाई जिंदा है।देख अब मैं क्या करता हूँ।"
"जन्हवी!"
प्रद्युम्न ध्रुव के पास से निकल कर अपनी गर्लफ्रेंड जान्हवी के पास गया और फिर दोनों थोड़ी देर तक कुछ बातें करते रहे जिसके बीच-बीच में वो ध्रुव की ओर देख लेती।
"चल भाई तेरा काम हो गया अब जैसे ही इति अपनी प्रैक्टिकल क्लास खत्म करके नीचे आयेगी तेरी भाभी उससे उसका जवाब पूछ लेगी।अब तो खुश है?"
"हाँ!"
और वाकई यह कहते हुए वह बहुत खुश था और उस पल का बेसब्री से इंतजार कर रहा था।खैर करीब दस मिनट बाद इति के सारे क्लासमेट प्रैक्टिकल क्लास खत्म करके सीढ़ियों से नीचे आने लगे और जन्हवी बाहर निकल गई जबकि प्रद्युम्न जय विनीत और उसके कई दोस्त दरवाजे के पास खड़े थे जबकि ध्रुव अपनी जगह बैठा रहा।
"क्या हुआ?"
उसने अपने दोस्तों से सवाल किया जबकि इति वापस अपनी क्लास में पहुंच चुकी थी।
"क्या हुआ कोई बतायेगा मुझे?"
उसने जान्हवी और अपने बाकी दोस्तों से चिढ़ते हुए पूछा।
"अर... भाई साॅरी!"
जान्हवी ने कुछ कहने की कोशिश की मगर प्रद्युम्न ने इशारे से उसे चुप करवा दिया।जबकि ध्रुव गुस्से में कभी जान्हवी को तो कभी प्रद्युम्न को देख रहा था।
"भाई उसने मना कर दिया!"
जय ने एक झटके में वह बात कह दी जो कहने से प्रद्युम्न और जान्हवी डर रहे थे।हालांकि जय ने सोंचा था जल्दी बोल देने से ध्रुव को इस बात का सदमा नहीं लगेगा पर वो उसके चेहरे पर कोई भाव न देखकर हैरान रह गया।उसने ध्रुव के कंधे पर हाथ रखा और ध्रुव शून्य जैसी आँखों से इति को देख रहा था जिसने मानो फैसला कर लिया था कि आज उसकी ओर नहीं देखेगी।
"क्या हुआ पूरी बात बताओ?"
ध्रूव ने उससे सवाल किया।
"अर ज्यादा कुछ नहीं बस जान्हवी ने उससे तुम्हारे लव लेटर के बारे में पूछा और उससे जवाब मांगा तो उसने बताया... "
इतना बोलने के बाद प्रद्युम्न ने जान्हवी की ओर देखा और फिर दोबारा बोलने लगा।
"उसने कहा है कि वो तुमसे प्यार नहीं कर सकती क्योंकि उसके पापा ने उसकी शादी अपने किसी दोस्त के लड़के से फिक्स कर रखी है।"
प्रद्युम्न ने भी एक झटके में पूरी बात कह दी और अचानक ध्रुव को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके सीने पर भारी पत्थर रख दिया हो जिसे वह हटा नहीं पा रहा था।
खैर इसके बाद सब लोग अपनी-अपनी बेंचों पर लौट गए जबकि ध्रुव देवांश के बगल बैठा रहा।हमेशा हँसी और खुशी से भरा रहने वाला क्लास का माहौल आज बेहद गम्भीर लग रहा था।तृप्ति और उसकी कुछ सहेलियों के अलावा कोई ज्यादा बात नहीं कर रहा था।
"ध्रुव को क्या हुआ?"
शिवन्या ने वीर से पूछा।
"हाँ आज इतना उदास क्यों लग रहा है?"
प्रगति ने भी सवाल किया।
और इसके बाद वीर ने उन्हें पूरी बात बता दी जिसे सुनकर वो भी उदास हो गईं।उन्होंने ध्रुव को देखा जो अपनी नोटबुक में नजरें गडा़ये बस चुपचाप बैठा था।
"वो रो रहा है?"
प्रगति और शिवन्या ने धीरे से कहा।
"तुम क्यों रो रहे हो भाई उसकी किस्मत खराब है।"
रजत ने उसके पास बैठकर उसे समझाने की कोशिश की।
"भाई देख अगर उसके पापा ने पहले ही उसका रिस्ता कहीं ओर तय नहीं कर रखा होता तो वो जरूर  हाँ कर देती।"
जय ने भी उसे सांत्वना देने की कोशिश की लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ।ध्रुव जैसे जड़ हो चूका था ना कुछ बोल रहा था न हमेशा की तरह जय को देखकर मुस्कुरा रहा था और उसकी आधी क्लास इस बात से परेशान थी।बहरहाल लंच का बेल बजते ही वो सभी लंच करने में लग गये पर ध्रुव ने अपना लंच वीर को पकड़ा दिया जिसने काफी जिद की कि वो भी उसके साथ ही लंच करे मगर ध्रुव टस से मस नहीं हुआ।
"भाई तुम्हारा हिस्सा छोड़ दिया है तुम खा लेना।"
वीर ने उसके सामने लंचबाॅक्स रखते हुए कहा और वापस चला गया जबकि ध्रुव चुपचाप उठा और उसने अपना लंच क्लास में रखे डस्टबिन में डाल दिया जबकि ऐसा करते हुए उसके कुछ फ्रैंड्स उसे देख रहे थे जिनमें शिवन्या और प्रगति भी थीं।
खैर कुछ देर बाद दोनों बाहर निकल गईं और आखिरकार लंच पीरियड खत्म होने के बाद ध्रुव नल के पास जाकर हाथ मुँह धोने लगा और लौटते वक्त उसने देखा कि छत पर इति के साथ शिवन्या और प्रगति भी मौजूद थीं और तीनों उसी को देख रही थीं पर वो मुँह फेरकर वापस अपनी क्लास में लौट आया और इस बीच बाकी लड़के-लड़कियाँ भी लौट आये।
"उसने हाँ कर दिया भाई!"
प्रगति ने क्लास में घुसते ही चिल्लाकर कहा और पूरी क्लास उसे ही देखने लगी जिससे वो थोड़ा झेंप गई।
"भाई उसने हाँ बोल दिया।"
शिवन्या ने उसके पास आकर उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा और फौरन ही जय और उसके बाकी दोस्त खुशी से चीखने-चिल्लाने लगे।शोर मचाने लगे और सब भाग-भाग कर उसे बधाई देने के लिए उसके पास आ रहे थे और ध्रुव की आँखों से आँसू गिर पड़े लेकिन ये आँसू उसकी खुशी बयाँ कर रहे थे।
"लेकिन उसने कहा था कि उसके पापा ने उसका रिस्ता.... "
जय ने पूछने की कोशिश की पर दोनों लड़कियों ने उसकी बात बीच में काट दी।
"झूठ बोला था!"
दोनों ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुराईं।
पूरी क्लास के ऊपर से उसने इति को देखा जो खुलकर मुस्कुरा रही थी पर उसे अपनी ओर देखते पाकर शर्मा गई और अपनी नोटबुक में अपना चेहरा छिपाने लगी।
"उसने सचमुच हाँ कर दी।"
ध्रुव ने यह बात खुद से कही जैसे खुद को यकीन दिला रहा हो।
इति ने भी अपने प्यार का इकराऱ कर दिया था और अब हर कोई खुश नजर आ रहा था सिवाय तृप्ति और उसकी फ्रैंड्स के.... To Be Continued In Next Chapter

                                    Written By
                         Manish Pandey’Rudra’

©manish/pandey/21-28-2018

4 comments:

  1. Wahh Bhai Tumne toh Kahani Mein Twist la diya tha 😂😂 Sach mein Bada Maza aa rha hi story padhkr 👌👌👌 Keep it up 👍 I m waiting for the next part of this Story☺️☺️👍👍

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