Wednesday, February 28, 2018

Adhoore Panne@Zindgi

                  अधूरे पन्ने@जिंदगी
            (अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)

                      अध्याय-सात
                 जन्मदिन का तोहफा

"क्या हुआ था प्लीज मुझे पूरी बात बताओ न?"
शाम की कोचिंग में ध्रुव ने प्रगति से सवाल पूछा जो मुस्कुरा रही थी।
"नहीं बताउंगी पहले ट्रीट दो फिर बताऊँगी।"
प्रगति ने उसे छेड़ते हुए कहा जबकि ध्रुव को गुस्सा आने लगा लेकिन अगले ही पल वो मुस्कुराया और बैग से तीन-चार चाकलेट के पैकेट्स निकाल कर प्रगति के हाथों में पकड़ा दिया।
"अब तो बताओगी।"
"हाँ अब तो बताना ही पडे़गा रिश्वत जो मिल गई।सुनो, जब हमने तुम्हें बहुत उदास और रोते हुए देखा.... "
"मैं रो नहीं रहा था!"
ध्रुव ने तीखी आवाज में कहा और प्रगति ने भौंहें चढा़कर उसे देखा तो वह फौरन नरम पड़ गया और प्रगति ने आगे बोलना जारी रखा।
"तो जब हमने तुम्हें रोते हुए देखा और तुमने अपना लंच भी डस्टबिन में फेंक दिया तो हमें लगा कि अब शायद उससे बात करना ही पड़ेगा और हम उसे खोजते हुए छत पे गये वहां हमने उसे तुम्हारे बारे में भी बताया कि तुम पढाई़ और नेचर में कितने अच्छे हो और उसे कितना पसंद करते हो और फिर हमने उसे ये भी बताया कि तुम उसका जवाब सुनकर कितना दुखी थे और रो भी रहे थे... "
"तुमने ऐसा कहा?"
उसने प्रगति की तरफ भौहें चढा़कर पूछा।
"हाँ तुम लड़कियों के बारे में नहीं जानते वो बहुत बेवकूफ़ होती हैं।"
"हाँ तुम्हें देखकर इस बात का तो यकीन हो गया मुझे!"
ध्रुव ने मजाक करते हुए कहा।
"क्या मतलब मैं बेवकूफ़ हूँ?"
प्रगति ने चिढ़ और गुस्से भरे लहजे में पूछा।
"नहीं मेरा मतलब बाकी लड़कियों से था।"
ध्रुव ने अपनी गर्दन बचाने की कोशिश की।
"हाँ तो आगे सुनो हमारी बात सुनकर वो काफी प्रभावित लग रही थी और फिर वह एकदम से गम्भीर हो गई।उसने कहा कि तुम्हे उदास तो उसने भी देखा था और फिर काफी मनाने के बाद आखिरकार उसने हाँ बोल ही दिया।"
"कैसे बोली?"
ध्रुव ने बेसब्री से सवाल किया।
"अपने मुँह से और कैसे।"
"मेरा मतलब किस तरह बोला क्या कहा उसने?"
"ओह!उसने कहा जाओ कहदो अपने भाई से कि मेरा जवाब हाँ है।"
प्रगति ने मुस्कराते हुए कहा।
"ये सच है न?मेरा मतलब तुम लोग मेरे साथ मजाक तो नहीं कर रहे न?"
ध्रुव ने गम्भीर स्वर में पूछा।
"हाँ भाई अब तुम्हें हमारा यकीन कहाँ होगा अब तो तुम सिर्फ भाभी की बात सुनोगे।भाई हम सच कह रहे हें वो भी तुमसे प्यार करती है।"
बोलने के साथ प्रगति ने ध्रुव का चेहरा देखा जिसके गालों पर गुलाबीपन सा छा रहा था।
प्रगति सच कह रही थी और उसकी बातें सुनकर ध्रुव का दिल बार-बार झूम उठता था।
"मेरे ख्याल से अब तुझे उसे एक गिफ्ट देना चाहिए।"
फिजिक्स की कोचिंग से निकलते वक्त उत्कर्ष ने ध्रुव से कहा।
"यार गिफ्ट देने का तो मैं भी सोंच रहा हूँ पर मैं नहीं जानता क्या देना चाहिए उसे और कहाँ से लूँ गिफ्ट!"
ध्रुव ने अफसोस करते हुए कहा।
"ओ तेरी तो ये बात है अच्छा सुन चल तू मेरे साथ मैं कुछ दुकानें जानता हूँ जहाँ अच्छे गिफ्ट मिलते हैं।"
"हुम्म्!ठीक है।"
ध्रुव ने हाँ में सिर हिलाया।
"लेकिन तू उसे देगा क्या कुछ सोंचा है?"
उत्कर्ष ने सवाल किया।
"अर... नहीं तू ही बता क्या दूँ।"
"मेरे ख्याल से गोल्डेन रिंग ठीक रहेगा।"
उत्कर्ष ने सुझाव दिया।
"अबे पागल है क्या इसके लिए तो डाका डालना पडे़गा और वैसे भी कौन सी मेरी शादी तय हो गई है कुछ ऐसा बोल जो मैं आराम से ले सकूं।जैसे कोई ब्रेसलेट या लाकेट... हाँ यही सही रहेगा।"
उसने उत्कर्ष की ओर देखा जिसने स्वीकृति में सिर हिला दिया।
"हुम्म् ठीक है।"
उत्कर्ष ने उसकी सुर में सुर मिलाते हुए जवाब दिया।
इसके बाद दोनों एक साथ मार्केट की ओर चल पड़े और काफी भटकने के बाद आखिरकार ध्रुव को एक चाँदी जैसा स्टोन का लॉकेट पसंद आया जिसमें दिल के आकार का पेंडुलम था और उसके अंदर दो हिस्सों में दो अलग-अलग तस्वीरें लगाने की जगह भी थी।
अगली सुबह स्कूल केमिस्ट्री की कोचिंग जाते हुए उसने वह लाकेट और एक बड़ा सा चाकलेट का पैकेट दोनों इति को देने के लिए जैकेट के अंदर छुपा दिया।पर कोचिंग के बाद उसे इति से मिलने का मौका नहीं मिला और इसीलिए उसने तय किया कि यह काम वह अब स्कूल में करेगा।
"अरे तुम कहाँ थे भाई हम कबसे तुम्हारा इंतज़ार कर रहे थे!"
क्लास में घुसते ही ध्रुव को तीनों लड़कियों ने घेर लिया।
"क्यों क्या हुआ?"
उसने घबराहट में पूछा।
"अरे भाई वो तुम्हारा नम्बर मांग रही थी और हममें से किसी के पास भी तुम्हारा नम्बर ही नहीं था।"
प्रगति एक सांस में बोलती चली गई।
"अर... क्या हुआ?"
"अरे भाई उसके पास मेरा का नम्बर था और उसने कल शाम को फोन किया और तुम्हारा नम्बर मांग रही थी।बार-बार कह रही थी कि प्लीज दीदी मेरी उनसे बात करवा दीजिए बहुत जरूरी है और बहुत मरी जा रही थी बात करने के लिए।"
प्रगति ने अपनी बात पूरी की और जोर-जोर से साँसे लेने लगी।
"हाँ हमारे पास भी उसका फोन आया था बोल रही थी दीदी प्लीज उनसे बात करवा दो।"
शिवन्या और दीप्ति ने एकसाथ कहा।
"तुम लोग मजाक कर रही हो न?"
उसने हैरानी से तीनों का चेहरा देखते हुए उनसे पूछा जबकि तीनों गुस्सा होने लगीं।
"नहीं हम मजाक बिल्कुल नहीं कर रहे।"
तीनों ने एक साथ कोरस में जवाब दिया।
"ओके!ओके!शांत हो जाओ नम्बर अभी देता हूँ पहले ये देखो और बताओ कैसा है!"
बोलने के साथ ही ध्रुव ने जैकेट के अंदर की एक पाकेट से एक पतला पैकेट निकाल कर प्रगति को दे दिया।
"ये क्या है?"
तीनों ने एकसाथ सवाल किया।
"अर... गिफ्ट है उसके लिए।"
ध्रुव ने शर्माते हुए जवाब दिया।
"वाऊ ध्रुव भाई ये कितना प्यारा है।"
शिवन्या दीप्ति और प्रगति ने बारी-बारी लाकेट हाथ में लेकर देखते हुए कहा।
"पर ये तो काफी मँहगा होगा न?"
प्रगति ने उसे घूरते हुए पूछा जैसे उसका एक्सरे कर रही हो।
"नहीं ज्यादा नहीं।"
ध्रुव ने आराम से जवाब दिया।
"हाँ ज्यादा मँहगा नहीं है सिर्फ चार सौ का है।"
उत्कर्ष ने बीच में आते हुए कहा।
"क्या?"
तीनों एक साथ बोल पड़ीं।
"लेकिन तुम्हें कैसे पता?"
दीप्ति ने उत्कर्ष से सवाल किया जिसका जवाब देने के बजाय उत्कर्ष उसे घूरने लगा।
"क्योंकि इसको ढूंढने के चक्कर में देर रात तक और पैदल हमने सारा शहर छान मारा।"
"मैंनें तुझसे साथ आने के लिए नहीं कहा था।"
तीखे स्वर में बोलने के साथ ध्रुव ने वह लाकेट शिवन्या से ले लिया ओर जैकेट के अंदर रखने लगा जिसके लिए उसे पहले अंदर रखे गुलाब के फूल को निकालना पड़ा और काफी सावधानी बरतने के बाद भी चारों की नजर उस पर पड़ गई।
"अरे वाह मेरे शेर कल हाँ हुआ और आज गुलाब दिया जा रहा है।"
उत्कर्ष ने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा।
"ये गुलाब भी खरीदा है?"
शिवन्या ने पूछा।
"छि!छि!ये तो बाहर लान में से तोड़ लिया था।"
ध्रुव ने कंधे उचकाते हुए जवाब दिया।
"पर वहां तो सिर्फ एक ही फूल खिलता है हर दिन और उसको तो सरस्वती माँ की पूजा-अर्चना के लिए चढ़ाया जाता है!"
दीप्ति ने भौंहे उठाकर पूछा।
"तो क्या एक दिन देवी जी की पूजा बिना फूल के नहीं हो सकती क्या!"
कहने के साथ ही ध्रुव कंधे उचका कर मुड़ा और वहाँ से चल पड़ा।
"यार कितनी लकी है न इति!"
प्रगति ने कहा।
"हम लोगों तो कभी किसी ने गुलाब नहीं दिया और इतना मँहगा और खूबसूरत गिफ्ट तो रहने ही दो।"
दीप्ति ने भी आँहें भरते हुए कहा और ध्रुव मुस्कुराते हुए वहां से चला गया।
ध्रुव ने इति को देने के लिए एक बेहद खूबसूरत गिफ्ट तो ले लिया था पर उसकी परेशानी अभी भी बढ़ रही थी।
"यार ये उसे दूँ कैसे?"
ध्रुव ने प्रद्युम्न से सवाल किया।
"अबे इसमें सोंचना क्या है उसे बुला ले और दे दे।"
प्रद्युम्न ने बेहद ठंडेपन से जवाब दिया।
"अरे यार यही तो दिक्कत है उसे बुलाऊँ कैसे जब भी निकलती है झुंड में कई लड़कियों के साथ निकलती है और मुझे देखते ही सिर नीचे कर लेती है।"
ध्रुव ने गुस्से भरे लहजे में कहा।
"अरे यार नया नया प्यार है अभी तुझसे शर्मा रही है वो।"
वीर ने उन दोनों और जय के बीच में आते हुए कहा।
"यार ये लड़कियां भी न पूरी की पूरी पागल होती हैं।अब मुझसे क्या शर्माना मैं उसका जेठ थोड़े ही हूँ ब्वॉयफ्रेंड हूँ यार।"
ध्रुव ने निराश होकर कहा और सब जोर से हँस पड़े।
अगले पीरियड की बेल लगते ही सब अपनी-अपनी बेंचों की ओर दौड़ पड़े जबकि ध्रुव वहीं खड़ा रहा।
"प्रद्युम्न!"
उसने प्रद्युम्न को बुलाया और प्रद्युम्न फौरन उसकी ओर मुड़ गया।
"हाँ बोल भाई।"
पहले तो ध्रुव उसे काफी देर तक हैरानी और परेशानी के भाव से भरे हुए चेहरे के साथ देखता रहा और अचानक ही काफी संजीदा नजर आने लगा।
"यार तूने अगर मेरी हेल्प न की होती तो आज भी शायद मैं किसी मौके कि तलाश में होता ताकि उससे बात कर सकूं पर मुझे यकीन है कि तेरे बिना शायद मेरा कुछ नहीं हो पाता... "
"अब छोड़ भाई जाने दे ऐसा कुछ नहीं है।"
प्रद्युम्न ने उसे बीच में टोक दिया पर उसने अपनी बात आगे भी जारी रखी।
"तूने मुझे मेरे प्यार से मिलाया है और मैं ये वादा करता हूँ उस दिन, जिस दिन सारी दुनिया तेरे खिलाफ होगी बस एक बार ध्रुव को याद करना उस वक्त भी तेरे साथ ही खड़ा रहूँगा मैं।"
"बस कर पगले रुलायेगा क्या!लव यू भाई!"
बोलने के साथ ही प्रद्युम्न ने उसे जोर से गले लगा लिया।
"अब छोड़ यार वरना तेरी भाभी को लगेगा मैं नयी सेटिंग कर रहा हूँ।"
ध्रुव ने मजाक में कहा और दोनों हँसते हुए अपनी-अपनी बेंचों पर बैठ गए।
खैर दूसरी तरफ बेल बजने के बाद इति और उसके क्लासमेट्स बायोलॉजी की क्लास के लिए ऊपर जाने लगे जबकि ऊपर से ध्रुव के क्लासमेट्स वापस अपनी क्लास में आ रहे थे।
आखिरी सीढी़ पर गायब होने तक ध्रुव इति को देखता रहा और आखिरकार उसे भी यह महसूस हुआ कि इति आज शर्मा रही थी और अचानक उसके शरीर में गर्मी बढ़ गई जबकि बाहर का तापमान काफी कम था।
"ध्रुव भाई मैंनें उसे बोल दिया।"
खुशी से उछलते हुए उत्कर्ष ने ध्रुव को बताया जबकि उसके चेहरे पर हैरानी का भाव था।
"क्या?किसे बोल दिया?"
उसने दोबारा उत्कर्ष से सवाल किया मगर उसके पैर जवा हवा में थे वह कुछ बोल ही नहीं पा रहा था।
"इसने तृप्ति को प्रपोज कर दिया।"
आखिरकार अमित ने उनके करीब आते हुए वह बात बताई जो बोलने में उत्कर्ष की जान सूख रही थी।
"क्या?सच में, पूरी बात बता!"
उसने उत्कर्ष की ओर मुड़ते हुए कहा जो बुरी तरह हांफते हुए गहरी साँसें ले रहा था जैसे मीलों दूर से दौड़ लगा कर आया हो।
"अर... मैं क्लास करने के लिए ऊपर छत पर गया था और नील सर अभी नहीं आये थी इसलिए टहलने के लिए मैं क्लास से बाहर निकल गया और बाउंड्री वॉल के पास जाकर खड़ा हो गया था।कुछ देर बाद मैं वापस क्लास में जाने के लिए मुडा़ लेकिन मेरे पीछे तृप्ति भी खड़ी थी और ये बात मुझे पता नहीं थी... "
कुछ देर रुककर उत्कर्ष नें अपने सूखे होठों पर जीभ फिराई और दोबारा बोलना शुरू किया जबकि ध्रुव और उसके और कई दोस्त जैसे अरविंद और जय सब ध्यान से उत्कर्ष को सुन रहे थे।
"और जैसे ही मैं पीछे मुड़ा हम दोनों टकरा गये और उलझ कर गिर गये।मैं उसके ऊपर गिरा हुआ था और वो मेरे नीचे दबी हुई थी।उसके दिल की धड़कन मैं अपने अंदर महसूस कर रहा था और मुझ पर तो जैसे कोई नशा सा चढ़ रहा था।एक सुरूर जैसा, खैर इसके पहले कि हमें कोई दूसरा देख पाता हम दोनों जल्दी से उठकर खड़े हो गए और मेरे साॅरी कहने से पहले ही वो शर्माती हुई वापस क्लास में भाग गई।"
इतना बोलने के बाद उत्कर्ष शांत होकर उन सभी के चेहरे देखने लगा जो हल्की रौशनी में आज उसे अजीब लग रहे थे।
"फिर क्या हुआ?"
अरविंद ने बेचैनी में सवाल किया।
"फिर पूरी क्लास में वो मुझे देख देखकर मुस्कुराती रही और फिर जैसे ही क्लास खत्म होने के बाद सब बाहर निकलने लगे वैसे ही फौरन मैंनें उसका हाथ पकड़ लिया और मैंने उससे पूछा... "
"क्या पूछा?"
उत्कर्ष के चुप होते ही सबने एकसाथ उससे सवाल किया जबकि उत्कर्ष के गालों पर गुलाबी सी रंगत छाये जा रही थी।
"यही कि मैं उसे बहुत ज्यादा लाइक करता हूँ और क्या वो भी मुझे लाइक करती है या नहीं।और वो हाँ में सिर हिलाते हुए शर्मा कर नीचे आ गई।"
उत्कर्ष की बात पूरी होते ही ध्रुव के साथ बाकी सब भी खुशी से झूमने लगे।
"मुबारक हो दोस्त तेरा प्यार भी तुझे मिल गया और ये अच्छा हुआ कि कम से कम तुझे जवाब पाने के लिए एक महीने इंतजार तो नहीं करना पड़ा।"
ध्रुव ने उसे आँख मारते हुए कहा और दोनों जोर से हँस पड़े और ध्रुव ने इति की खाली क्लास की ओर देखा तो अचानक उसे एक आईडिया आया।
और फौरन वो प्रद्युम्न को खींचते हुए बाहर ले गया।
"प्रद्युम्न मेरे भाई तू एक काम कर यहां खडे़ होकर देख कि कोई टीचर तो नहीं आ रहा तब तक मैं ये इति के बैग में रख के आता हूँ।"
ध्रुव ने धीमी और दबी आवाज में कहा।
"ये क्या है?"
प्रद्युम्न ने उससे सवाल किया लेकिन अगले ही पल उसके हाथों में खिला हुआ गुलाब देखकर सारी बात समझ गया और मुस्कुराते हुए पहरेदारी करने लगा।
"वाह मेरे रोमियो।"
बोलते हुए उसने ध्रुव की पीठ ठोंकी और फिर ध्रुव इति के बैग में गुलाब रखने चला गया।जबकि इति के आधे क्लासमेट्स बायोलॉजी की लैब में और बाकी आधे फिजिक्स की लैब में पढ़ाई कर रहे थे।और थोड़ी देर बाद ही ध्रुव अपना काम खत्म करके वापस अपनी क्लास में आ गया और इति के आने का और उसके गुलाब देखकर रिजेक्ट करने का इंतज़ार करने लगा।मगर यह इंतजार ज्यादा लंबा नहीं चला और लंच पीरियड की बेल बजने के कुछ देर बाद ही इति वापस अपनी क्लास में आ गई और जैसे कि ध्रुव को मालूम था गुलाब देखते ही उसके नजर फौरन ध्रुव के क्लास की ओर पड़ी जहाँ ध्रुव को अपनी ओर देखते हुए पाकर उसने खूबसूरत मुस्कान दी और वापस अपनी सहेलियों से बातें करने लगी।
ध्रुव भी अपना ध्यान जय के साथ लंच करने पर लगाने लगा।
"क्या हुआ तुमने उसे मेरा नम्बर दिया?"
लंच खत्म करने और हाथ-मुंह धोने के बाद ध्रुव ने दीप्ति से पूछा।
"अर मैं उसे तुम्हारा नम्बर दे रही थी पर उसने मना कर दिया।साॅरी!"
"वो पागल है क्या?"
ध्रुव ने गुस्से में कहा।
"अर... रहने दो मैं खुद दे दूंगा ये ज्यादा सही रहेगा।"
उसने आराम से जवाब दिया और बाहर निकल गया।
"इति!"
सीढियों पर जाती हुई इति को उसने पीछे से आवाज लगाई।
"हाँ!"
उसने पीछे पलट कर देखा हाँलाकि वो ध्रुव से नजरें मिलाने से कतरा रही थी।
"कल आपको मेरा नम्बर चाहिए था और आज जब दीप्ति आपको नम्बर दे रही थी तो आपने मना क्यों कर दिया?"
कुछ समझ में न आने की वजह से ध्रुव ने यही सवाल पूछ लिया जबकि इति उसे गुस्से से घूर रही थी।
"मुझे दीप्ति ने प्रपोज किया था या तुमने!कुछ काम खुद भी करने चाहिए।"
बोलने के साथ ही गुस्से में पैर पटकती हुई इति वापस सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।
"इति जरा सुनना।"
ध्रुव ने तेजी से आगे बढ़कर एक बार फिर उसे रोका।
"हाँ अब क्या?"
उसने बेहद शांत और ठंडे लहजे में सवाल किया।
"अर!वो मैं... आपके लिए कुछ लाया था सोंचा दे दूँ।"
बोलने के साथ ही ध्रुव जैकेट की जेब में हाथ डालकर गिफ्ट और चाकलेट निकालने लगा पर इति ने फौरन उसे मना कर दिया।
"क्या कर रहे हो सब लोग हैं यहाँ बाद में!"
बोलने के साथ ही लगभग दौरान दौड़ती हुई इति ऊपर छत पर चली गई।और उसके पीछे-पीछे ध्रुव भी चला गया लेकिन वहाँ और भी कई लड़कियां खड़ी थीं जिन्हें देखकर वो वापस अपने दोस्तों के पास लौट गया।
इसके बाद वो अपने दोस्तों के साथ मस्ती करता रहा और आखिरकार छुट्टी के बाद हमेशा की तरह इति के पीछे-पीछे चलने लगा।
"इति ये लो।"
उसने मौका देखकर इति की ओर एक नोटबुक बढ़ा दिया।
"ओह थैंक्स।"
कहने के साथ इति ने ध्रुव से नोटबुक लेकर अपने बैग में रख लिया और फिर दोनों साथ-साथ चलने लगे।
"वैसे कापी के बीच में क्या रखा था?"
चलते-चलते उससे इति ने पूछा।
"अर कुछ नहीं वो आप घर पर देख लेना मगर अकेले  में ही देखना।"
उसने चेतावनी भरी निगाहों से इति को देखा जिसके चेहरे पर हैरानी के भाव थे।
"क्यों ऐसा क्या है इसमें?"
उसने शरारती अंदाज में मुस्कुराते हुए पूछा।
"अर.. कुछ नहीं बस आपके लिए कुछ है आप घर पर ही देख लेना और हाँ उसमें एक कागज भी है तो जरा ध्यान से देखना क्योंकि उसमें मेरा मोबाइल नम्बर है।"
बोलते वक्त उसने शक भरी निगाहों से इति की ओर देखा पर उसका चेहरा बिल्कुल सामान्य था।
खैर इसके बाद दोनों एक-दूसरे से बिना कुछ बोले साथ चलते रहे।
वहीं रास्ते में कुछ दूरी पर एक छोटा लड़का जो उन्हीं के स्कूल में पढ़ता था, चॉकलेट खाते हुए बेहद आराम से अपने घर की ओर जा रहा था कि तभी एक बाइकर बेहद तेजी से पहले इति और ध्रुव के पास से और फिर आगे उसी छोटे लड़के के बगल से निकला।ध्रुव और इति को तो कुछ नहीं हुआ मगर आगे जा रहे उस बच्चे का स्कूल बैग उस बाइकर की डिक्की में रखे किसी सामान में फँस गया और बच्चा कुछ दूर तक घिसट गया।
यह सब इतनी तेजी से हुआ कि कोई कुछ समझ नहीं पाया लेकिन इससे पहले कि बच्चे को ज्यादा नुकसान होता उस बाइकर ने बाइक रोक दिया।
ध्रुव फौरन बहुत तेजी से दौड़ कर उस लड़के के पास पहुंचा जिसके आँखों से आँसू बह रहे थे और उसके नर्म गुलाबी गालों को गीला कर रहे थे वहीं उसका बैग भी थोड़ा फट गया था और उसके कपड़ों पर काफी मिट्टी और धूल वगैरह लग गई थी।
"तडा़क!"
इससे पहले कोई कुछ कहता या वह बाइकर दोबारा बाइक स्टार्ट करता ध्रुव ने उसके गालों पर जबरदस्त थप्पड़ रसीद कर दिया जबकि देखने में वह ध्रुव से ज्यादा हट्टा-कट्टा था।
ध्रुव के थप्पड़ के जवाब में उस बाइकर ने फौरन उसका काॅलर पकड़ लिया लेकिन आसपास बढ़ती भीड़ को देखकर फौरन उसने अपना हाथ हटा लिया और लोगों की गालियाँ और डाँट सुनते हुए शर्म से सिर झुकाकर चला गया मगर जाते हुए उसने पलटकर ध्रुव को घूरा जैसे नजरों ही नजरों में उसे वार्निंग दे रहा हो।
खैर उस पर से ध्यान हटाकर ध्रुव ने उस बच्चे को सम्हाला।
"छोटू तुम ठीक हो?"
उसने प्यार से उस बच्चे के कपड़ों पर से धूल-मिट्टी हटाते हुए पूछा जबकि इस पूरे समय इति हैरानी और श्रद्धा के मिलेजुले भाव के साथ ध्रुव को देखे जा रही थी लेकिन फिलहाल उस ओर ध्रुव का ध्यान नहीं था।
"हूँ।"
बच्चे ने धीरे से सिर हिलाया और तभी ध्रुव ने देखाकि उसका चाकलेट जमीन पर पड़ा हुआ था जिसकी ओर वह लड़का बड़े ही हसरतों भरे अंदाज में देख रहा था।
"ये लो!"
कहने के साथ ही ध्रुव ने अपनी जैकेट के अंदर की पाकेट से एक चाकलेट निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया।
और तब उसने पहली बार इति की ओर देखा जो उसकी ओर देखकर श्रद्धाभाव से मुस्कुरा रही थी मगर ऐसा करने वाली वो अकेली नहीं थी।वहीं कुछ दूरी पर ध्रुव की क्लासमेट अंकिता भी खड़ी थी जो उसकी ओर देखकर मुस्कुरा रही थी और यह देखते ही इति उस लड़की को गुस्से से घूरने लगी और फौरन उसने ध्रुव का हाथ थाम लिया और उसे अपनी पीछे खींचने लगी।जबकि ध्रुव उसकी इस हरकत को देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था।
इसके बाद सभी अपने-अपने घर चले गए और उधर कुछ देर बाद ध्रुव घर से कोचिंग के लिए निकल पड़ा और तभी उसने अपना फोन देखा और आठ मिस्ड काॅल्स देखकर चौंक गया।
उसे इतना तो यकीन था कि इति फोन जरूर करेगी मगर इतनी जल्दी करेगी ये उसे बिल्कुल पता नहीं था।और उसने फौरन उसी नम्बर पर रीडायल कर दिया।
"हैलो!"
दूसरी तरफ से काल रिसीव होते ही ध्रुव ने कहा।
"हैलो!"
दूसरी तरफ से एक पतली और मधुर आवाज आई जिसे वह फौरन पहचान गया।
"हाँ इति जी आपने काॅल किया था?"
"हुम्म्!किया तो था।"
"कुछ बात करनी थी कोई खास बात?"
उसने धीमे स्वर में पूछा।
"क्यों बिना खास बात के कोई बात नहीं कर सकता क्या?"
इति ने सामान्य स्वर में पूछा।
"अर... क्यों नहीं कर सकता है और आप तो बिल्कुल कर सकती हैं।कभी भी!"
"अच्छा।ऐसा क्यों?"
इति ने मजाक करते हुए पूछा जबकि ध्रुव को कुछ जवाब देते नहीं बना।
"क्या हुआ जी अभी कुछ देर पहले तो आप बड़े हीरो बन रहे थे और अब तो आपकी बोलती ही बंद हो गई।"
इति ने उसे चिढा़या।
"ऐसा कुछ नहीं है उस बच्चे को चोट पहुंची तो ये देखकर अचानक मुझे बहुत गुस्सा आ गया और गुस्से में मैं ज्यादा रिजेक्ट कर बैठा।"
ध्रुव ने अपनी आवाज में सामान्य स्वर का पुट रखते हुए कहा और कोचिंग के लिए जानबूझकर लंबा और सूनसान मैदानी रास्ता ले लिया।
"अरे नहीं मैं बस मजाक कर रही थी और आपने जो किया ठीक किया मैं बस ये सोंच रही थी कि कहीं इसके वजह से बाद में कोई प्रॉब्लम न हो जाए।"
इति ने गम्भीर और सख्त लहजे में कहा।
"अरे नहीं आप टेंशन मत लो ऐसे बंदे बहुत मिलते हैं मुझे।"
उसने शान झाड़ते हुए काॅलर झटककर कहा और इस चक्कर में एक गढ्ढे में उलझकर गिरते-गिरते बचा और फौरन चारों ओर नजरें दौडा़ कर देखने लगा।
उसे इस बात की खुशी महसूस हुई कि यह घटना होते हुए इति ने नहीं देखा।
"वो गुलाब मेरे बैग में आपने रखा था न?"
इति ने उससे सवाल किया।
"हाँ!क्या आपको पसंद नहीं आया?"
"अरे नहीं यार मुझे बहुत पसंद आया बस मैं मे सोंच रही थी कि ये आपने अपने मन से किया था या किसी और ने ऐसा करने को कहा था!"
"अर... कुछ काम तो मैं खुद भी कर सकता हूँ इतना भरोसा तो आपको होना ही चाहिए।"
ध्रुव ने कहा और फिर दोनों खामोश हो गए।
"एक बात पूछूँ बुरा तो नहीं मानोगी आप?"
कुछ मिनटों की खामोशी तोड़ते हुए ध्रुव ने पूछा।
"हाँ बिल्कुल!और आप कभी भी मुझसे कुछ भी पूछ सकते हैं मैं बुरा नहीं मानूँगी।"
इति ने सावधानी से जवाब दिया।
"कुछ खास नहीं था बस यही पूछना था कि आपने मेरा दिया हुआ गिफ्ट देखा।"
"हाँ अच्छा था।"
उसने सीधे तौर पर जवाब दिया।
"क्या!सिर्फ अच्छा था?"
ध्रुव ने निराशा भरे स्वर में पूछा।
"ओह हाँ!वो लाकेट बहुत ही प्यारा था और तो और मेरी दोनों छोटी बहनें मुझसे लाकेट उन्हें देने की जिद कर रही थीं पर मैंनें मना कर दिया हालांकि मैं इसे पहन नहीं सकती।"
"क्यों?"
ध्रुव ने हैरानी भरे स्वर में पूछा।
"अर.... मेरे पापा को पसंद नहीं और सच कहूं तो मुझे भी ये सब पहनना पसंद नहीं है।"
"ओह साॅरी यार मुझे पता नहीं था वरना इसकी जगह कोई और गिफ्ट देता।"
ध्रुव ने निराश होकर कहा।
"अरे कोई बात नहीं आपने प्यार से दिया है यही काफी है और ये तो हमारे प्यार का पहला तोहफा है इसे मैं हमेशा सम्हाल कर रखूंगी।"
इति ने प्यार से जवाब दिया जिसे सुनकर ध्रुव का दिल खुश हो गया।
"आप कहीं जा रहे हैं?"
अचानक इति ने सवाल किया।
"ओह हाँ!कोचिंग के लिए निकला हूँ विजय सर के पास जाना है।"
"ओह अच्छा।अभी कितनी दूर है कोचिंग?"
पहले तो इति का जवाब सुनकर वह बुरी तरह चौंक गया पर फिर उसने आराम से जवाब दिया।
"क्यों?अर ज्यादा दूर नहीं है बस पास में ही है।"
"ओह!इसका मतलब ज्यादा देर तक बात नहीं कर पायेंगे।"
इति ने कहा और ध्रुव ने उसकी आवाज़ में छुपी गहरी निराशा का भाव पहचान लिया।
"अरे ऐसा नहीं है आपसे बातें करने के लिए तो मैं कोचिंग भी छोड़ सकता हूँ।आपका तो जब तक मन हो आप बातें करिये।"
"आपने जो चाकलेट दिया था वो मेरी बहनों ने छीन कर खा लिया।"
"ओह कोई बात नहीं कल आपको एक और चाकलेट दे दूंगा।"
"थैंक्स मुझे चाकलेट बहुत पसंद है पता है एक बार तो जब मैं गाँव पे थी और अचानक रात के दस बजे मेरा चाकलेट खाने का बहुत मन करने लगा लेकिन बाहर जाने का दरवाजा बंद था और सब सो रहे थे।फिर भी मैं छत से उतर के चाकलेट लेने चली गयी थी और जब बडे़ पापा को पता चला तो उन्होनें मुझे बहुत डाँट लगायी"
"ओह माय गाॅड!अरे इति जी यहाँ ऐसा कुछ मत करियेगा बस जब भी चाकलेट खाने का मन हो मुझे बता दीजिएगा मैं ला दूँगा।"
"थैंक्स तब मैं छोटी थी पर अब तो बडी़ हो गयी हूँ"
इति ने कहा और दोनों खिलखिला कर हँस पड़े।
और इसी तरह बातें करते हुए वह विजय सर के घर के सामने पहुंच गया जहाँ उसके दोस्त प्रद्युम्न जय और विराट पहले से ही उसका इंतजार कर रहे थे।
"कहाँ बिजी है हीरो?"
प्रद्युम्न ने उससे पूछा।
"कहीं न भाई तेरी भाभी हैं।"
ध्रुव ने फोन का माइक दबाकर बोला पर शायद इति ने सुन लिया था।
"कौन हैं?"
उसने सवाल किया।
"अर... कोई नहीं मेरे फ्रैंड्स है।"
उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया जबकि वो तीनों वहीं से भाभीजी नमस्ते बोलने लगे।
"अच्छा आप मुझसे प्यार करती हो?"
"क्यों शिवन्या दीदी ने नहीं बताया।"
"अर... उनकी छोड़ो मैं आपसे सुनना चाहता हूँ।"
ध्रुव ने आग्रह भरे स्वर में कहा।
"एक काम कर देंगे आप मेरा?"
इति ने बात बदलने की कोशिश की पर ध्रुव समझ गया लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
"हाँ बोलिए आपके लिए मेरी जान हाजिर है।"
उसने रूखे स्वर में कहा।
"आप घर आ सकते हैं मेरे अभी तुरंत?"
इति ने सीधे तौर पर सवाल पूछा।
"अर... क्यों?अभी तो कोचिंग है।"
"प्लीज देखिये ये बहुत जरूरी है वर्ना मैं आपसे नहीं कहती।"
इति ने जबर्दस्त आग्रह भरे स्वर में कहा जिससे ध्रुव फौरन पिघल गया।
"ओके।आ रहा हूँ दस मिनट में।"
कहने के साथ ही उसने काॅल डिस्कनैक्ट कर दिया और फौरन उसने सारी बातें प्रद्युम्न को बता दीं।
"देख भाई मेरे ख्याल से तुझे जाना चाहिए पर जरा सम्हल के कहीं ऐसा ना हो तेरे साथ कोई कांड हो जाये।"
प्रद्युम्न ने चेतावनी भरे लहजे में कहा और बाकियोंने भी उसका समर्थन किया।
खैर उसने कोचिंग छोड़ दी और इति के घर चल पड़ा।
"भाई पहले ही दिन उसने तुम्हें घर बुला लिया?"
अरविंद ने उसे हैरानी से घूरते हुए उससे सवाल किया  जबकि बाकी सारे दोस्त भी उसे घेर कर बैठे थे और अपनी सांसे रोककर उसकी आपबीती सुन रहे थे।
"हाँ।जब मैं उसके घर के सामने पहुंचा और मैंनें कालबेल बजाई उसके लगभग एक मिनट बात वो भागती हुई आई और उसने दरवाजा खोला।जिंदगी में पहली बार उसे जींस और शर्ट में देखा था इससे पहले हमेशा सिर्फ स्कूल ड्रेस या सूट-सलवार में ही उसे देखा था और इसीलिये बस आँखें फाड़कर उसे देखता रहा।"
बोलने के बाद एक पल के लिए वह ठहर गया।
"क्या हुआ अंदर नहीं आना?"
उसने पूछा।
"अर कुछ नहीं!मैं कहा और फिर मैं झेंप कर उसके पीछे-पीछे हो लिया जबकि दरवाजा बंद करने के बाद वो एक गलियारे से आगे बढ़ रही थी और मैं उसके पीछे था।मेरे अंदर डर का गुबार धीरे-धीरे फैलता जा रहा था और मेरी धड़कनें तेजी से बढ़ रही थीं।पर उसके इतने करीब होने के एहसास से मेरा डर मुझसे दूर हो रहा था और मैंनें भी तय कर लिया कि अब जो होगा देखा जायेगा।"
"घर पता था मेरा?"
उसने मुझसे पूछा।
"एक साल से आपके पीछे-पीछे घूम रहा हूँ अगर घर भी न पता कर पाता तो मैं आशिक काहे का, मैंनें कहा और हम दोनों हँसते हुए गलियारे को पार करके एक छोटे से कमरे में पहुंच गये जहाँ दो तरफ दो बेड पड़े थे और बीच में जगह खाली थी।एक तरफ जहाँ एक बेड पर एक अधेड़ उम्र की औरत बैठी थी वहीं दूसरे बेड पर दो लड़कियाँ भी बैठी हुई थीं।मैंनें सबको नमस्ते किया और फिर उन्होंने मुझे वहीं बेड पर बैठने को बोला फिर उसकी मम्मी मुझसे मेरे बारे में पूछने लगीं।लेकिन ज्यादातर इति ही मुझसे बातें कर रही थी।"
"यार मेरा बाॅट्नी का फाइल बनाना था और कल ही इसे सम्मिट करना है प्लीज थोड़ी हेल्प कर दो मुझे पता है तुम्हारा आर्ट बहुत अच्छा है विराट भैया ने बताया था।"
"उसने मुझसे रिक्वेस्ट किया और मैं मुस्कुराते हुए फाइल लेकर वापस आ गया।"
इतना बताने के बाद ध्रुव हाँफने लगा और जोर-जोर से साँसे लेने लगा जबकि बाकी सब हैरानी से मुँह फाड़े उसे घूर रहे थे।
"बस इतना ही हुआ?"
हैरान दिख रही दीप्ति ने पूछा।
"क्यों?"
ध्रुव ने सवाल किया।
"भाई मुझे जैसे ही प्रद्युम्न ने बताया कि उसने तुम्हें घर बुलाया है तो मुझे लगा था खि अब तुम्हारी कुटाई होनी है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।"
जय ने हँसते हुए कहा जबकि बाकी सब भी हँसने लगे।
"हाँ और मुझे इसका जरा भी अफसोस नहीं है।"
ध्रुव ने तीखे स्वर में कहा और इति को आता देख फाइल लेकर उसकी ओर चल पड़ा।जिसके बीच में उसने एक बड़ा सा चाकलेट और गुलाब का फूल छिपा रखा था।
"ये लो!"
बोलने के साथ ही उसने फाइल इति की ओर बढ़ा दी जबकि इति के सारे क्लासमेट्स उसे घूर रहे थे जैसे उसने फाइल के जगह कोई बाॅम्ब पकड़ रखा हो।
"सबके सामने मत खोलना।"
उसने यह बात धीरे धीरे से उसके कानों में बताई और आकाश और सौरव के सफेद पड़ चुके चेहरे पर व्यंग्य भरी निगाह डालते हुए वापस अपनी क्लास में आ गया।
खैर फाइल देखने के बाद इति ने भी उसके आर्ट की काफी तारीफ की पर वो यह मानने के लिए कतई तैयार नहीं थी की रात भर जागकर बत्तीस ड्राइंग्स बनाना और उतने ही पेजेस थ्योरी लिखना कोई कठिन काम था।बहरहाल ध्रुव ने भी ऎसी कोई कोशिश नहीं की।
"तो अक्षय भाई तैयारी कैसी चल रही है?"
ध्रुव के साथ बैठे जय ने अक्षय से सवाल किया जो हमेशा की तरह नोट्स पूरे कर रहा था।
"बस भाई स्टमप और बैट खरीद लिया है अब सिर्फ बाॅल खरीदना बाकी है।
"अरे मेरे लसिथ मलिंगा मैं क्रिकेट मैच की नहीं एक सप्ताह बाद से शुरू होने वाले हाफ ईयरली पेपर्स की तैयारी के बारे में पूछ रहा हूँ।"
जय ने हँसते हुए जवाब दिया।
"ओह!भाई बस चल रहा है किसी तरह!"
अक्षय का जवाब सुनकर वहां मौजूद जय और ध्रुव के साथ आकर्षित देवांश और अमित भी हँस पड़े जबकि बाकी सभी फिजिक्स की प्रैक्टिकल क्लास में थे।
"हाँ यार सही है और प्रिंसिपल सर बोल रहे थे हमारे बोर्ड इक्जाम की दृष्टि से यह पेपर देना हम सबके लिए काफी महत्वपूर्ण है।"
अमित ने भी उसकी बात का समर्थन किया जबकि ध्रुव खामोश बैठा रहा।उसने इति की क्लास देखा जहाँ सिर्फ मैथ्स के स्टूडेंट्स मौजूद थे जबकि इति और उसके बाकी साथी बायोलॉजी की क्लास में थे।
खैर इसके बाद ध्रुव और जय आकर्षित के साथ बैठ कर इधर-उधर की ढे़र सारी बातें करने लगा और फिर  अचानक दोनों जय से गाना गाने की जिद करने लगे।
"यार जय भाई कोई मस्त गाना सुना दे।"
आकर्षित ने उससे रिक्वेस्ट किया और काफी ना-नुकुर के बाद आखिरकार जय गाना गाने लगा और वह वाकई बहुत खूबसूरती से गा रहा था।
इधर तीनों मस्ती में झूम रहे थे और फिर जय के गाना बंद करते ही बाहर दीवार की ओट में खड़ी दो लड़कियाँ खी-खी करते हुए तेजी से निकल कर नल की ओर चली गईं।जबकि दरवाजे के करीब की बेंच पर बैठे तीनों उन्हें देखने के लिए उठकर दरवाजे पर खड़े हो गए।ध्रुव ने उन दोनों लड़कियों को फौरन पहचान लिया।
वो दोनों ही हाईस्कूल की स्टूडेंट्स थीं और उनमें से एक वही लड़की थी जिसके बारे में ध्रुव को मालूम था कि जय उसे पसंद करता था।उसका नाम अंशिका था और वो भी जय की तरह बेहद दुबली-पतली मगर सामान्य कद-काठी और खूबसूरत नैन-नक्श वाली लड़की थी।
"यार मैं तो बोलता हूँ तुम भी आज बात कर लो अच्छा मौका है यहाँ और कोई है भी नहीं।"
ध्रुव ने उसे समझाया जबकि आकर्षित वापस अपनी बेंच पर चला गया।
"अर.. पता नहीं भाई वो मुझे पसंद करती भी है या नहीं!"
जय ने सकुचाते हुए जवाब दिया।
"अरे नहीं भाई देख तो कितना जबर्दस्त लाइन दे रही है।"
ध्रुव ने उसका ध्यान इस ओर मोड़ने की कोशिश की और वाकई वो लड़की नल के पास खड़ी होकर कनखियों से बार-बार जय को देख रही थी।
"क्या हो रहा है भाई लोग?"
अचानक प्रद्युम्न सीढ़ियों पर फिसल कर आते हुए बोला लेकिन किसी के कुछ बोलने से पहले ही उसे सारी बात समझ में आ गई।
"अच्छा हुआ तू आ गया प्रद्युम्न भाई अब तू ही इसका कुछ भला कर।"
ध्रुव ने प्रद्युम्न से कहा जबकि जय वापस बेंच पर बैठ गया ओर नोटबुक निकाल कर पढ़ने लगा।
"ये ले ये दे दे उसे।"
ध्रुव ने एक कागज का टुकड़ा जय की ओर बढ़ाते हुए कहा।
"ये क्या है?"
प्रद्युम्न और जय ने हैरान दिखते हुए पूछा।
"अर... लव लेटर है।मुझे पता था तुम्हें आज नहीं तो कल इसकी जरूरत पड़ेगी इसलिए पहले से ही इसे लिख के रख लिया था।"
"वाह मेरे शेर!"
प्रद्युम्न ने मुस्कराते हुए उसकी पीठ ठोंकी जबकि जय और ध्रुव भी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे।
"पक्का दे दूँ।"
जल्दी से लेटर पढ़ने के बाद जय ने उन दोनों की ओर देखते हुए कहा।
"हाँ।"
प्रद्युम्न और ध्रुव एक साथ बोले।
जय लैटर हाथ में लेकर दरवाजे की ओर बढ़ा वहीं दोनों लड़कियाँ आपस में बातें करते हुए वापस जाने लगीं।हालांकि उन दोनों की नजरें जय और ध्रुव पर भी थीं।ध्रुव और जय के साथ-साथ प्रद्युम्न का दिल भी जोरों से धड़क रहा था।
"यार मैं नहीं कर सकता।"
उन लड़कियों के एकदम पास आ जाने के बाद जय ने कहा और पीछे हटने लगा लेकिन प्रद्युम्न ने तेजी से लैटर उसके हाथ से छीना और उन लड़कियों के पास फेंक दिया और ये उसने इतनी तेजी से किया कि उसकी इस हरकत को सिर्फ ध्रुव ही देख पाया जबकि उन लड़कियों को लगा कि ये जय ने ही किया था।पर  असली बात सिर्फ वही तीनों जानते थे।
इधर जय मुँह फाड़कर कभी प्रद्युम्न को तो अंशिका और उसकी सहेली को देख रहा था जबकि अंशिका ने तेजी से वह कागज का टुकड़ा उठा लिया और बिल्कुल सामान्य होकर अपने क्लास की ओर चली गई।
"भाई तुझे पता है मेरा दिल अब भी जोर-जोर से धड़क रहा है।"
जय ने गुस्से में प्रद्युम्न को घूरते हुए कहा।
"हमारा भी।"
प्रद्युम्न और जय ने एकसाथ बोला और एक दूसरे की तरफ देखकर मुस्कुराने लगे।
"अरे यार तुझे पता हे अगर उसने टीचर को बोल दिया तो मेरी तो बैंड बज जायेगी।"
जय ने निराश होकर बेंच पर बैठते हुए कहा हालांकि अभी भी उसके हाथ पैर काँप रहे थे।
"कुछ नहीं होगा भाई देखना अभी थोड़ी देर में जवाब आ जायेगा और उसकी तरफ से भी हाँ ही होगा।"
प्रद्युम्न ने उसे प्रोत्साहित करते हुए कहा और सचमुच यही हुआ भी।
लंच पीरियड में जय को उसका जवाब मिल गया जो हाँ में ही था।
"तू सच कह रहा है भाई!यार आज मैं बहुत खुश हूँ।"
ध्रुव ने कहा और फिर हमेशा की तरह खिड़की से अपनी इति को देखने लगा।
खैर इसके बाद उन सबका पूरा दिन काफी अच्छा गुजरा और ध्रुव अपने साथ-साथ जय के प्यार की कामयाबी के बारें में सोंचते हुए काफी खुश था।
"हाय इति जी कल मेरा बर्थ-डे है और मैं चाहता हूँ आप मेरे घर पे आओ।"
कुछ दिनों बाद एक शाम इति के घर पर उससे बातें बातें करते हुए ध्रुव ने कहा।दोनों इति के घर के बाहरी गलियारे में खड़े थे और घंटों से एक-दूसरे से बातें कर रहे थे।
जबसे इति ने उसका प्यार एक्सेप्ट किया था वे दोनों घंटों फोन पर बातें करते रहते थे और अक्सर ध्रुव इति के बुलाने पर उसके घर भी चला जाता था जहाँ उसी गलियारे में खड़े होकर अक्सर वे एक-दूसरे से ढे़र सारी बातें किया करते थे।हालांकि ध्रुव को लगता था कि इति की बड़ी बहन जिसका नाम ममता था।उसे ध्रुव का उनके घर आना और इस तरह घंटों इति से बातें करना बिल्कुल भी पसंद नहीं था।जबकि इति की छोटी बहन नेहा अक्सर उसे देखकर मुस्कुरा देती थी।
"चाय पीयोगे?"
इति ने चाय का एक कप उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा जो तुरंत नेहा लाकर दे गई थी।
"अर... अकेले पीना अच्छा नहीं लगेगा।"
ध्रुव ने शर्माते हुए कहा।
"अकेले क्यों दोनों पियेंगे न!"
इति ने मुस्कुराते हुए कहा और उसकी ओर देखकर उसने हल्के से आँख मारी।
"पर यहां तो सिर्फ एक कप है न!"
ध्रुव ने मुस्कराते हुए कहा।
"तो क्या हुआ!"
और इसके बाद ध्रुव ने कप उसकी ओर बढ़ा दिया।
"पहले आप!"
इसके बाद दोनों उसी कप से चाय पीने लगे हालांकि इस दौरान दोनों एक दूसरे से नजरें मिलाने से करता रहे थे पर ध्रुव के दिलो-दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था।इसी बीच नेहा इति के लिए भी चाय लेकर आ गई पर जब उसने दोनों को एक ही कप से चाय पीते हुए देखा तो शर्मा कर हँसती हुई वापस लौट गई।
"अच्छा मैंनें आपसे कुछ पूछा था आपने बताया नहीं!"
ध्रुव ने उसे एक बार फिर अपना सवाल याद दिलाया।
"क्या?"
इति ने जानबूझकर कहा जैसे उसने पिछली बार सुना ही न हो।
"यही कि कल मेरा बर्थडे है तो क्या आप घर आओगी मेरे?"
ध्रुव ने अपना सवाल दोहराया और ध्यान से उसकी ओर देखने लगा जबकि अचानक इति दरवाजे के पास बाहर आपस में खेल रहे पिल्लों में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी लेने लगी।
"आपके घर में और कौन-कौन है?"
इति ने ध्रुव की ओर कनखियों से देखकर पूछा।
"अर.... मैं मेरे माॅम-डैड और मेरी दीदी बस हम चार लोग ही हैं।"
ध्रुव ने एकटक उसकी ओर देखते हुए जवाब दिया।
"हुम्म्!देखो पक्का तो नहीं कह सकती पर कोशिश जरूर करूंगी।यार असल में मेरे पापा बहुत स्ट्रिक्ट हैं और अगर उन्हें जरा भी पता चला गन सबके बारे में तो मेरी हालत खराब हो जायेगी।"
इति ने अपनी ही जगह पर तेजी आगे-पीछे होते हुए कहा।
"ओके कोशिश करना।मैंनें अपना बर्थडे कभी सेलिब्रेट नहीं किया क्योंकि मेरे पापा को पसंद नहीं और आज तक कभी किसीने मुझे मेरे बर्थ-डे पर कोई छोटा सा गिफ्ट भी नहीं दिया।"
ध्रुव ने उदास होकर कहा।
"ओह मेरा प्यारा बाबू मैं आ गई हूँ न अब आपकी लाइफ में अब आपका बर्थ-डे भी सेलिब्रेट किया जायेगा और आपको गिफ्ट भी मिलेगा।"
इति ने उसके कँधों पर अपनी बाँहें डालते हुए कहा और अपना प्यार जताया।
"तो कल क्या हुआ?"
अगले दिन स्कूल में ध्रुव के पास वाली बेंच पर बैठे जय ने पूछा जबकि प्रद्युम्न वीर और उत्कर्ष अपनी-अपनी गर्लफ्रेंड्स से बातें कर रहे थे और बाकी लड़के लड़कियाँ या तो नोट्स वगैरह पूरे कर रहे थे या फिर आपस में गप्पे लडा़ रहे थे।बहरहाल सिर्फ अरविंद शोभित और आदित्य ही इकलौते ऐसे तीन स्टूडेंट्स थे जो दो दिनों बाद होने वाले इक्जाम के लिए हफ्तों पहले से जमकर तैयारी कर रहे थे और वहीं रजत आकर्षित और विनीत प्रतीक के साथ पंजा लडा़ रहा था।
"यार कल दोपहर को जब इति को मैंनें पूछा कि वो मेरे घर आयेगी या नहीं तो उसने कहा कि वो आने के लिए तैयार है।और उसने मुझसे शाम के चार बजे अपने स्कूल के पास आने को कहा।"
"फिर क्या वो आई?"
जय ने पूछा।
"हाँ!"
"उसे लेने बाइक से गये थे न!"
"नहीं उसने बाइक से आने के लिए मना किया था इसलिए मैं पैदल ही गया और शाम को तय किये हुए समय से थोड़ा पहले ही मैं स्कूल के पास पहुंच कर उसका इंतजार करने लगा जिसके कुछ देर बाद वो आ गई।लेकिन उसके साथ उसकी बहन नेहा भी थी पर मेरी नजरें तो मेरी इति पर ही ठहर गईं थी।लाल और काली बेहद खूबसूरत ड्रेस में वो कयामत ढा़ रही थी।यार वो एकदम अप्सरा जैसे लग रही थी और मेरा मन कर रहा था दौड़ कर बस उसे अपनी बाहों में कैद कर लूँ लेकिन फिर मैंनें अपने दिल को समझाया और उसकी ओर बढ़ गया।"
इतना बोलने के बाद वो ध्यान से चारों ओर देखने लगा और उसे ये देखकर काफी सुकून मिला कि उसकी बातें केवल जय सुन रहा था।
"कहाँ खो गये भाई फिर क्या हुआ ये तो बताओ?"
जय ने उसका ध्यान अपनी ओर खींचा।
"ओह हाँ!मैंने उससे कहा कि वो बेहद खूबसूरत लग रही है तो वो शर्मा गई और उसकी बहन नेहा ने पूछा कि क्या वो खूबसूरत नहीं लग रही तो मैंनें कहा ऐसा कुछ नहीं है वो भी खूबसूरत लग रही थी।खैर इसके बाद हम बातें करते हुए मेरे घर की ओर चल पड़े जबकि पूरे रास्ते भर लोग हमें घूर रहे थे और मुझे लगता है कईयों को तो मुझसे जलन हो रही थी।बहरहाल जल्दी ही हम मेरे घर पहुंच गये जहाँ दीदी और मैंने मिलकर पूरी सजावट की थी पर चूंकि हमारा घर काफी ज्यादा बड़ा था इसलिए हमने सिर्फ दो तीन कमरों में ही सजावट की थी और उन्हीं में से एक कमरे में मैंने उन्हें बैठाया जो असल में मेरा कमरा था।कल जिंदगी में पहली बार मैंनें अपने कमरे की साफ-सफाई की थी और हालांकि मम्मी और दीदी को मैंनें बोला था कि वो सिर्फ मेरी क्लासमेट है पर शायद वो लोग समझ गये थे।खैर इसके बाद दीदी और मम्मी से इति ने काफी बातचीत की लेकिन थोड़ी देर बाद वो दोनों खाना वगैरह लेने के लिए चले गए और फिर हम सब आपस में बातें करने लगे।पहले तो उसने खाना खाने से मना किया पर काफी रिक्वेस्ट के बाद वो खाने लगी।"
बोलते हुए ध्रुव बीच में रुक गया और सांसें लेने लगा।
"गजब भाई यहाँ हम लोग इस डर से मरे जाते हैं कि हमारे घरवालों को गलती से भी हमारे इस मैटर के बारे में न पता चले और तुम सीधे उसे लेकर घरवालों से मिलाने चले गए।"
जय ने इम्प्रेस होकर कहा जबकि ध्रुव मुस्कुराने लगा।
"और भाई कोई गिफ्ट दिया उसने?"
जय ने दोबारा सवाल किया।
"हुम्म्!"
ध्रुव ने धीरे से हाँ में सिर हिलाया।
"क्या गिफ्ट दिया भाई?"
जय ने बेंच पर उसके पास सरकते हुए पूछा वहीं ध्रुव के गालों पर गुलाबी सी उभरने लगी।
"अर... उस समय तो नहीं पर जब मैं उसे घर छोड़ने गया तो थोड़ी देर हो चुकी थी और रात के करीब सात बजने वाले थे।वहां हम दोनों एक बार फिर गलियारे में खड़े होकर बातें करने लगे।"
"आप यहीं रुकिए मैं आती हूँ कहने के साथ ही वह अंदर चली गई और जब लौट के वापस आई तो उसके हाथ में एक पैकेट था और एक गुलाब के फूलों का गुलदस्ता था जो उसने अपने हाथों से बनाया था। जिन्हें उसने मुझे दे दिया और फिर उसने मुझसे आँखें बंद करने के लिए कहा.... "
"क्यों?"
अचानक जय ने रोमांचित होते हुए उसकी बात बीच में काट दी।
"अर... यही मैंनें भी पूछा तो उसने कहा कि मुझे उस पर भरोसा नहीं है और मैंने झट से बिना कुछ सोचें आँखें बंद कर लीं।मेरी धड़कनें तेज हो गईं और अचानक माहौल में काफी गर्माहट भर गई ऐसा लग रहा था जैसे मेरी साँसों की गर्मी मेरा गला जला रही हों और फिर उसने अपने रसदास गुलाबी होंठों को मेरे होठों पर रख दिया।और ऐसा अजीब सा एहसास मुझे आज से पहले कभी नहीं हुआ था मैंने बिना कुछ सोंचे अपनी बाहों को उसके कमर पर रख दिया और उसके नर्म गुलाब की पंखुड़ियों से रसपान करने लगा पर अचानक ही वो पीछे हट गई और मैंनें उसकी आँखों में लजाहट की लाली देखी।उस वक्त हम दोनों एक-दूसरे से नजरें नहीं मिला पा रहे थे पर उसके चेहरे पर हया और होंठो पर मुस्कान थिरक रही थी।इसके बाद मैं घर चला गया पर मेरा मन वहीं उसी गलियारे में उसी वक्त की भँवर में फँस गया था और उस वक्त भी मैं उसके साँसों की गर्माहट और उसकी खुश्बू अपनी भीतर महसूस कर रहा था।और मैं सोंच रहा था काश वक्त उसी लम्हें में ठहर जाता सदियों के लिए।"
रुकने के बाद भी ध्रुव की सांसें धौंकनी की तरह तेज चल रही थीं।और जय उसे करुणा और आस्था के मिले-जुले भाव से देख रहा था।
"ये मेरा अब तक का सबसे अच्छा जन्मदिन था और सच कहूं तो पहला।इससे खूबसूरत तोहफा मेरे लिए और कुछ भी नहीं हो सकता था।"
अपनी यादों के भँवर में उलझे ध्रुव को अपनी आवाज़ भी कहीं दूर से आती महसूस हो रही थी... To Be Continued In Next Chapter On Next Thursday
                                    Written By
                         Manish Pandey’Rudra’

©manish/pandey/28-02-2018

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