Tuesday, March 6, 2018

Adhoore Panne@Zindgi

                    अधूरे पन्ने@जिंदगी
              (अधूरे इश्क़ की पूरी कहानी)

                       अध्याय-आठ
                    रीचार्ज वाले भईया

जल्दी ही उसके सारे दोस्तों को पता चल चुका था कि अपने जन्मदिन की पार्टी पर उसने इति को अपने घर बुलाया था और अब हर कोई उससे इसी बारे में बातें करता था।पहले तो उसे सबको बताते हुए बहुत मजा आता था लेकिन इसके बाद धीरे-धीरे उसे इससे चिढ़ होने लगी।
"भाई तू तो शेर निकला सीधे उसे घर लेके चला गया!"
विराट ने कहा।
"सही है भाई।"
अमित ने भी उसका समर्थन किया।
"यार ये विनीत को आज क्या हो गया है?"
उनकी बातों पर ध्यान दिये बगैर ध्रुव ने दूर खड़े विनीत की ओर इशारा करते हुए पूछा।
"पता नहीं सुबह से कहाँ बिजी है ये हम कुछ पूछते हैं तो जवाब नहीं देता।"
दोनों ने एक साथ जवाब दिया।
"अच्छा!मैं बात करता हूँ।"
कहने के साथ ही ध्रुव वहां से उठकर विनीत की ओर चला गया असल बात यह थी कि उसे उन दोनों से पीछा छुड़ाना था।
"क्या हुआ विनीत भाई?"
ध्रुव ने उससे सवाल किया जबकि किसी सोंच में डूबा हुआ विनीत अचानक उसकी आवाज सुनकर चौंक उठा।
"अर कुछ नहीं!"
उसने जल्दीबाजी में जवाब दिया और ध्रुव कंधे उचकाते हुए वापस जाने के लिए मुड़ा ही था कि विनीत ने उसे आवाज दिया।
"अर... ध्रुव भाई दरसल एक बात है लेकिन किसी और को बताना मत!"
"हाँ ठीक है तू बात तो बता।"
ध्रुव के कहने पर उसने बाकियों की नजरों से बचाते हुए एक कागज का टुकड़ा उसकी ओर बढ़ा दिया जिसे एक मिनट तक ध्यान से देखने और पढ़ने के बाद ध्रुव के अधरों पर मुस्कान खेलने लगी।
"क्या बात है भाई लव लैटर और लो भी लड़की का किसने दिया?"
ध्रुव ने उसे चिढ़ाते हुए पूछा।
"उस फुटकर ने क्या नाम है उसका!हाँ शायद नेहा नाम है।"
विनीत ने उसे बताया और ध्रुव काफी देर तक उस लेटर को घूरता रहा।
"तो क्या सोंचा।"
ध्रुव ने लेटर से नजरें हटाकर विनीत की ओर देखते हुए पूछा।
"किस बारे में इसके?"
विनीत ने उस लैटर की ओर इशारा किया और बुरी तरह नाक सिकोड़ लिए जैसे वह कोई गंदी चीज हो।
"हाँ!"
ध्रुव ने आराम से जवाब दिया।
"सोंचना क्या है उस चुड़ैल को मैं नहीं पसंद करता बल्कि मैं तो उससे बदला लेना चाहता हूँ।"
विनीत ने गुस्से में बिफरते हुए कहा।
"पक्का न?"
"हाँ!"
"तो चल!"
बोलने के साथ ध्रुव उसे अपने पीछे-पीछे खींचते हुए क्लास से बाहर लेकर चला गया।
"और फिर हम दोनों हेडमास्टर के आॅफिस में चले गए लेकिन वहाँ हेडमास्टर तो नहीं थे पर हमें अनुराधा मैम और मदन सर मिल गये।"
लंच पीरियड में ध्रुव सुबह हुई घटना के बारे में बाकि सबको बता रहा था जबकि विनीत पागलों की तरह मुस्कुरा रहा था।
"और तूने सर से बता दिया?"
प्रद्युम्न ने हैरान होकर पूछा जबकि आसपास बैठे बाकी लड़के-लड़कियां भी बुरी तरह हैरान थे।
"हाँ दोनों को, और सिर्फ बताया ही नहीं बल्कि लैटर भी उन्हें दिखा दिया।"
"फिर क्या हुआ?"
उत्सुकता और जिज्ञासा से भरे अरविंद और जय ने उसके करीब खिसकते हुए पूछा।
"फिर क्या मदन सर ने उसे बुलाया और फिर दोनों ने उसे बहुत डाँटा जबकि अनुराधा मैम ने तो उसे चार-चार थप्पड़ भी जड़ दिया।"
ध्रुव ने हँसते हुए जवाब दिया और एक साथ सभी ने खिड़की से बाहर इति की क्लास में देखा जहां अब भी वो लड़की बेंच पर सिर रखकर रो रही थी मगर ये देखकर ध्रुव को पछतावा होने लगा और अचानक ही ऐसा लगने लगा जैसे उसके सीने पर किसी ने अचानक कोई भारी पत्थर रख दिया हो और एक पल पहले जिस चेहरे पर खुशी थी वहां अब घोर आत्मग्लानि और पश्चाताप दिख रहा था।
"यार आज तो मजा आ गया।"
विराट और जय ने खुश होकर कहा।
"मुझे नहीं लगता कि ये मजेदार था?"
भभकते हुए अंदाज में बोलने के साथ ही अमित अचानक वहां से उठकर बाहर निकल गया।
"अब इसे क्या हुआ?"
वीर ने हैरानी से बाकी सबका मुँह ताकते हुए पूछा।
"मुझे क्या पता?"
उत्कर्ष ने भी कंधे उचकाए और अपनी बेंच की तरफ बढ़ गया।
खैर चूंकि आज इति स्कूल नहीं आई थी इस वजह से बार-बार उसका दिल इति को देखने को कर रहा था और उससे बातें करने को जबकि पिछली रात उसने फोन पर इति से घंटों देर तक बात की थी।रात को बात करना शुरू किया तो सुबह छः बजे उसे याद आया कि उसे कोचिंग भी जाना था और इसके बाद उनींदी हालत में कोचिंग गया।
सिर्फ उसका ही नहीं जय प्रद्युम्न देवांश प्रतीक और उत्कर्ष का भी यही हाल था हालांकि जय अपनी गर्लफ्रेंड से फोन पर बातें नहीं कर पाता था फिर भी दोनों स्कूल में मिलकर बातें करते थे।बहरहाल उनकी बातचीत होती भी थी ये कहना ध्रुव के लिए मुश्किल था क्योंकि वो दोनों जब भी एक दूसरे से बातें करने के लिए मिलते तो उनका आधे से ज्यादा वक्त एक-दूसरे से शर्माने में निकल जाता था।
बहरहाल आज ध्रुव का दिल बार-बार इति की आवाज़ सुनने को कर रहा था और इसीलिए घर पहुंचते ही उसने सबसे पहले इति को काॅल किया।
"हाय इति जी क्या हुआ आज आप स्कूल क्यों नहीं आईं थीं?"
इति के काॅल रिसीव करते ही उसने पूछा।
"ओह हाँ मेरी तबीयत थोड़ी खराब थी।"
उसने बुझे-बुझे से स्वर में जवाब दिया।
"अर... अब कैसी हो आप ठीक तो हो न?डाॅक्टर को दिखाया आपने?"
ध्रुव ने परेशान होते हुए कहा।
"अरे नहीं यार इतना भी नहीं था बस आराम करने का मन किया तो आराम कर रही थी इसीलिए आज स्कूल नहीं गई।"
"हाँ!अच्छा किया।"
ध्रूव के मन में अभी भी इति को लेकर हलचल मची थी और अचानक उसे देखने का मन करने लगा।
"क्या मैं आ जाऊँ वहां?"
ध्रूव ने अपने दिल की बात रखी।
"क्यों!अर.... मेरा मतलब है नहीं आप यहाँ आके क्या करोगे।"
इति ने हड़बड़ी में उसकी बात काट दी और ध्रुव का दिल डूबने लगा।
"नहीं बस ऐसे ही मिलने का मन कर रहा था।"
ध्रुव ने निराशा भरे लहजे में जवाब दिया।
"नहीं रहने दो वैसे भी कल से पेपर है हमारा और आपका भी तो है तो पढा़ई कीजिए बाद में बात करते हैं।"
"ओके!बाय!"
ध्रूव ने बुझे मन से काॅल डिस्कनैक्ट करने की कोशिश की मगर दोबारा इति की आवाज सुनकर उसने अपना फैसला बदल दिया।
"अर सुनिए क्या आप मेरा एक काम कर देंगे?"
"हाँ यार ये भी कोई पूछने की बात है आप तो बस हुक्म करो!"
"यार ये दीदी का फोन है और मेरी गलती से इसका सारा बैलेंस चला गया तो प्लीज आप रीचार्ज करवा दो, मैं बाद में आपको वापस कर दूँगी।"
इति ने रिक्वेस्ट किया।
"अरे यार ये भी कोई पूछने की बात है मैं बस अभी रीचार्ज करवा देता हूँ।"
ध्रुव ने खुशी-खुशी जवाब दिया।
"ओह थैंक्स यार मेरी तबीयत खराब नहीं होती तो मैं खुद जाकर रीचार्ज करवा लेती आपसे नहीं कहती लेकिन क्या करें मजबूरी पड़ गई।"
इति ने गहरा अफसोस प्रकट किया।
ध्रूव को इस बात कि खुशी थी कि उसे प्यार करने वाली लड़की उस पर अपना हक मानती थी और ये बात उसे अच्छी लगी थी।लेकिन उसे नहीं मालूम था कि यह सिलसिला कहाँ जाकर थमने वाला था।
उस दिन उसने इति के नम्बर पर सौ रुपए का बैलेंस डलवा दिया और फिर इसके बाद आये दिन इति उससे रीचार्ज करवाने के लिए रिक्वेस्ट करती थी।
वह ये सोंच के खुश रहता कि इति उसे अपना मानती थी इसीलिए उसे कहती थी।हालांकि हर बार वो यही कहती थी कि एक दिन वो उसका पैसा वापस कर देगी पर ध्रुव हमेशा मना कर देता था बहरहाल इति का वह एक दिन पूरी जिंदगी न आना था और न आया।
अगले दिन पेपर था और उसने इति से कह रखा था कि वह उसके साथ ही स्कूल जायेगा और उस वक्त इति ने हाँ भी कर दिया मगर अगले दिन एक घंटे तक इंतजार करने के बाद भी जब इति नहीं आई तो वह अकेला ही स्कूल चला गया जहाँ इति पहले से ही मौजूद थी।
"मैं आपका इंतजार कर रहा था।"
ध्रुव ने गुस्से भरे लहजे में कहा।
"ओह साॅरी यार मैं भूल गई थी।"
कहने के बाद इति बिना उस पर ध्यान दिए अपनी सहेलियों के बीच चली गई और हँसते हुए उनसे बातें करने लगी।बहरहाल उसके चेहरे पर मुस्कराहट देख ध्रुव का गुस्सा कफूर हो गया और वो भी अपने दोस्तों के पास चला गया।
"वाह ध्रुव भाई आज तो भाभी तुमसे खूब बतिया रही थी।"
अरविंद ने उसे छेड़ते हुए कहा और ध्रुव बिना कुछ बोले बस मुस्कुराता रहा जबकि उसके गाल सेब जैसे लाल हो गए।
"और भाई तैयारी कैसी है पेपर की?"
जय ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उससे सवाल किया।
"बस भाई ठीक-ठाक ही हो पाया है।"
"चल तेरा तो ठीक है भाई हम तो बिना पढ़े ही आ गए हैं।"
जय ने उसे बताया।
"क्यों?"
"अर... कल दिन भर क्रिकेट खेल रहे थे।"
प्रद्युम्न ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया जैसे इग्जाम जैसी छोटी-छोटी चीजें उसके लिए कोई मायने न रखती हों।
"तुझे क्या हुआ चश्मिश!"
ध्रुव ने अकेले एक कोने में खड़े उत्कर्ष के पीठ पर धौल जमाते हुए पूछा।
"मुझे क्या हुआ मैं ठीक हूँ!"
कहने को तो उसने कह दिया पर उसकी जुबान लड़खड़ा रही थी और ध्रुव ने फौरन भांप लिया कि उसे कोई प्रॉब्लम थी।
"क्या प्रॉब्लम है मुझे बता भाई हूँ न तेरा!"
ध्रुव ने गंभीरता के साथ उससे पूछा।
"अर... क्या बताऊँ यार मुझे तो समझ नहीं आता इन लड़कियों का दिमाग किस तरह काम करता है।यार तृप्ति हमेशा मुझसे झगड़ती रहती है।"
उत्कर्ष ने जज्बाती होते हुए बताया और ध्रुव को इस बात कि फिक्र थी कि कहीं वो रो न पड़े।
"हुआ क्या है तुम दोनों के बीच?"
"यार पहले तो वो खुद काॅल करती है और फिर जब मैं काॅलबैक करता हूँ तो मुझसे झगड़ा करने लगती है मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा।"
उत्कर्ष ने बेहद मासूमियत के साथ अपने दिल के जज़्बातों को ध्रुव के सामने बयान कर दिया और ध्रुव भी इस बारे में गंभीरता से सोंचने लगा।
"हाँ थोड़ी अजीब तो होती हैं!एक काम कर उसे एक अच्छा सा गिफ्ट और एक प्यारा सा रोज़ दे दे।"
ध्रुव ने अपनी राय उसके सामने रखी।
"हुम्म्!ये शायद अच्छा रहेगा।"
बोलने के साथ उत्कर्ष भी जरा़ खुश नजर आने लगा।
"चलो बेल बज गई।"
उत्कर्ष के पीछे खड़े आकर्षित ने उसे इशारा किया और बाकियों के साथ वो भी बडे़ मैदान में अपने क्लास की लाइन में खड़ा हो गया।जहां एक तरफ नील सर विजय सर और विनय सर लड़कों की तलाशी ले रहे थे वहीं दूसरी ओर अनुराधा और वीणा मैम लड़कियों की तलाशी ले रही थीं क्योंकि इक्जाम सुपरवाइजर प्रमोद सर नहीं चाहते थे कि परीक्षा में कोई नकल करे खैर करीब दस मिनट बाद ध्रुव आगे पहुंचा जहाँ विजय सर उसकी तलाशी लेने लगे।
"कोई पर्ची-वर्ची तो नहीं है जेब में।"
"पर्ची तो नहीं है सर पर फोन है लेना है तो ले लीजिए।"
ध्रुव ने हाथ ऊपर उठाते हुए कहा ताकि विजय सर उसकी तलाशी अच्छे से ले सकें मगर उन्हें कोई फोन नहीं मिला और उन्होंने उसे जाने दिया।इसके बाद उत्कर्ष की भी अच्छे से तलाशी ली जिसके निकलने के बाद आकर्षित आगे आ गया और उसके होठों पर जबर्दस्त मुस्कान थी।
"अरे छोटे प्रिंसिपल जी आप जाइए।"
विजय सर ने मजाक में हाथ जोड़कर कहा और यह देखकर बरबस ही ध्रुव की हँसी छूट गई।
बहरहाल वहां से निकलने के बाद सबको अपना रोल नम्बर और कमरा खोजना था काफी मेहनत के बाद ध्रुव को उसका कमरा मिल गया और वह थोड़े उदास मन से बड़े हाॅल के आखिरी कमरे में चला गया क्योंकि उसके बाकी दोस्त जय प्रद्युम्न वीर विनीत और विराट सभी आगे वाले कमरों में थे।
पहली लाइन में लास्ट से दूसरी बेंच पर सबसे बाहर बैठने के बाद उसने चारों ओर नजरें दौडा़ई और पाया कि भरत उसके आगे बैठा था जिसके आगे रजत और उत्कर्ष बैठे थे।सीटिंग प्लान इस तरह अरेंज किया गया था कि एक बेंच पर एक इंटरमीडिएट का स्टूडेंट और दूसरा हाईस्कूल का स्टूडेंट बैठा था जबकि दोनों के बीच में छठी क्लास के बच्चे बैठे थे।
"हाय तुम्हारा नाम क्या है?"
ध्रुव ने अपने बगल बैठी छोटी लड़की से पूछा।
"मान्सी!"
उसने मासूमियत से जवाब दिया।
"और आपका?"
"मेरा ध्रुव।"
"वाऊ सुपर कमांडो ध्रुव!"
अचानक ध्रुव की बेंच पर दूसरी ओर बैठी हाईस्कूल की लड़की ने दोनों के बीच में दखल देते हुए कहा।
"क्या?"
कामिक बुक के हीरो का नाम सुनकर ध्रुव को खांसी आने लगी।
"हाँ तुम सुपर कमांडो ध्रुव हो!है न?"
बादामी रंग के चेहरे वाली उस लड़की ने सपनीले अंदाज में पूछा।जबकि ध्रुव की नजरें कुछ पल के लिए उस पर ठहर गईं और उसने पाया कि मोटे भौंहों और बादामी चेहरे वाली वह लड़की काफी अजीब थी और उसके चेहरे पर हमेशा हैरानी का भाव बना रहता था जैसे वह किसी असमंजस में हो।खैर अचानक ध्रुव को ध्यान आया कि उसका पेपर था आज।
"अर... नहीं!बिल्कुल नहीं मैं सिर्फ ध्रुव हूँ।"
उसने अटपटा सा जवाब दिया और अगले ही पल वह खुद भी अपने जवाब पर हैरान था।
खैर उसका जवाब सुनकर उस अजीब सी लड़की ने सिर को झटका दिया और दोबारा अपने हाथों पर पेन से मेंहदी बनाने लगी जब ध्रुव को ऐसा लग रहा था जैसे किसी बच्चे ने आड़े-तिरछे लाइन खींच दिये हों।
"वो थोड़ी सी पागल है न?"
ध्रुव के पास बैठी छोटी लड़की ने उसके कानों में फुसफुसा कर कहा।
"मुझे तो ऐसा ही लगता है।"
कहने के बाद उस बच्ची के साथ वो भी हँसने लगा जबकि पाठक सर उन्हें चुप रहने का इशारा करने लगे।
खैर इसके बाद उसने दोबारा जाँच की और पाया कि उसी लाइन में सबसे आगे तृप्ति भी बैठी हुई थी जबकि दूसरी लाइन में सबसे आगे मोहन बैठा था जिसके पीछे आदित्य अक्षय लक्ष्मी और प्रतीक बैठे हुए थे जबकि तीसरी लाइन में सबसे आगे देवांश बैठा था जिसके पीछे शिवन्या गौतम गौरव और सुमन बैठे हुए थे।सब के सब बैठे हुए एक दूसरे को देख रहे थे और क्वेश्चन पेपर मिलने का इंतजार कर रहे थे जबकि कुछ लड़के-लड़कियां अपनी-अपनी कापियों पर हासिये खींचने मे व्यस्त थे।
बहरहाल उसकी नजरें अचानक प्रतीक के पास बैठी लड़की पर पड़ी जो देवांश की गर्लफ्रेंड निशी थी जबकि देवांश के पास प्रतीक की गर्लफ्रेंड बैठी थी और प्रतीक को घूर रही थी जोकी निशी से बातें करने में मशगूल था।पर उसे घूरने वाली वह अकेली नहीं थी दरसल देवांश भी यही कर रहा था और ये देखकर ध्रुव को बहुत मजा आ रहा था खैर अचानक उसने महसूस किया कि अगर इति उसके पास बैठी होती तो कितना अच्छा होता पर वो जानता था कि यह मुमकिन नहीं था क्योंकि इति वक्त उससे दूर छठी क्लास में बैठी हुई थी।
और आखिरकार बेल बजते ही पाठक सर सबको पेपर बाँटने लगे और पेपर मिलते ही ध्रुव उसे ध्यान से पढ़ने लगा और जल्दी-जल्दी पूरा पेपर देखने के बाद उसे काफी खुशी महसूस हुई क्योंकि उसे सिर्फ पाँच नम्बर के दो क्वेश्चन नहीं आते थे जबकि बाकी सारे सवालों के जवाब वह जानता था।कम से कम उसे तो यह भरोसा था ही।
बहरहाल वह जल्दी से जल्दी अपना पेपर खत्म करना चाहता था क्योंकि उसे यकीन था कि इति को ज्यादा कुछ नहीं आता होगा और यही सोंचकर वो जल्दी-जल्दी सवालों के जवाब लिखने लगा।
"भईया आप इसका आंसर जानते हैं?"
ध्रुव के पास बैठी छोटी लड़की ने उससे सवाल किया और ध्रुव पाठक सर की नजरों बचता उसके सवाल का जवाब बताने लगा।
"तडा़क!"
अचानक ही ध्रुव के गालों पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ पडा़ और मन ही मन भद्दी गालियाँ बकते हुए उसने सिर उठाकर देखा तो पाया कि उसे थप्पड़ मारने वाला कोई टीचर नहीं था बल्कि वही पागलों जैसी दिखने वाली लड़की थी जो उसके पास बैठी थी।
जोरदार थप्पड़ की आवाज़ सुनकर पाठक सर के साथ बाकी सब की नजरें भी ध्रुव की ओर मुड़ गई जबकि ध्रुव और मानसी दोनों उस लड़की को गुस्से और हैरानी के साथ घूर रहे थे जिसका नाम प्रियंका था।
"उसे बता क्यों रहे हो?"
प्रियंका ने ध्रुव को घूरते हुए पूछा।
"तुझसे क्या मतलब पागल!"
ध्रुव ने गुस्से भरे लहजे में जवाब दिया और अपने क्वेश्चन पेपर पर नजरें गडा़कर पढ़ने लगा हालांकि मन ही मन अब भी वह उसे गालियाँ दिये जा रहा था।
बहरहाल उसके क्लास में बैठे सारे लड़के-लड़कियां दबी सी हँसी हँस रहे थे।
बहरहाल इसके बाद पूरे दिन वह चुपचाप अपना पेपर ही लिखता रहा और सबसे पहले खत्म करने के बाद काॅपी सबमिट करने के लिए पाठक सर के पास पहुंच गया।
"हो गया?"
पाठक सर ने हैरानी से पूछा।
"जी सर!"
"अच्छा लेकिन अभी आधे घंटे का समय है तब तक जाकर अपनी बेंच पर बैठो।"
कापी रखते हुए उन्होंने उसे वापस बेंच पर जाकर बैठने को कहा लेकिन वह हिला भी नहीं।
"मैं उस पागल लड़की के साथ नहीं बैठ सकता।"
ध्रुव ने प्रियंका की ओर उँगली दिखाते हुए कहा और फौरन क्लास से बाहर निकल गया और बड़े मैदान की ओर चल पड़ा।
धीरे-धीरे पेपर खत्म कर चुके लोगों की भीड़ मैदान में बढ़ने लगी।
"पेपर कैसा गया?"
जय और प्रद्युम्न के साथ और भी कई दोस्तों ने उसके पास बैठते हुए पूछा जबकि दूसरी तरफ शोभित दोबारा अपने जवाबों की जाँच कर रहा था।
"अच्छा हुआ!"
जय ने रूखे स्वर में जवाब दिया।
"क्या हुआ भाई तुझे?"
विराट ने उसका चेहरा देखकर पूछा लेकिन ध्रुव ने कुछ नहीं कहा तभी दूसरी ओर से प्रतीक और देवांश भी आ गए और उन्होंने सारी बा बता दी।
"अबे छोड़ उसे वो पागल है!"
प्रद्युम्न ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
"मुझे लगता है पहले सवाल के बी पार्ट में सूफी कवियों के बारे में पूछा गया था और मैंनें दूसरे कवियों के बारे में लिख दिया।"
शोभित ने अफसोस करते हुए कहा।
"अबे ज्ञानदास निकल यहाँ से एक बार ही पेपर देना काफी है।"
प्रद्युम्न ने झल्लाकर जवाब दिया और शोभित उनसे दूर चल दिया।
"देख पागलों की हरकतों का कोई भरोसा नहीं जाने दे।"
विराट ने उसे समझाया।
"भाई भाभी आ गई अब तो खुश हो जा!"
मोहन ने कहा और फौरन ध्रुव का चेहरा खिल उठा पर चारों ओर देखने के बाद भी उसे इति कहीं नहीं दिखी।
"ओये होये देखो तो भाभी का नाम सुनते ही कैसे खिल गया लड़का।"
मोहन ने दोबारा उसे छेड़ते हुए कहा और एक बार फिर ध्रुव हँस पड़ा।खैर कुछ देर बाद सचमुच वहां इति आ गई और दोनों साथ-साथ घूमते हुए बातें करने लगे।
"कैसा गया पेपर?"
इति ने चहकते हुए पूछा।
"अर.... अच्छा।"
ध्रुव ने सामान्य सा जवाब दिया।
"मेरा तो बहुत अच्छा गया।"
इति ने खुशी से चहकते हुए कहा।
"हुम्म्!ये तो वाकई अच्छी बात है।"
"ओये ध्रुव!"
अचानक पीछे से आकर्षित और उत्कर्ष दोनों भागते हुए आये और उसे बुलाने लगे।
"क्या है?"
उसने गुस्से में फुफकारते हुए पूछा।
"भाई तुम्हारे वजह से रजत को पापा अपने आॅफिस में ले गए हैं।"
आकर्षित ने हाँफते हुए कहा।
"मेरी वजह से क्यों?"
उसने हैरानी से पूछा जबकि इति भी उसके जितनी ही हैरान थी।
"अरे उसने प्रियंका को थप्पड़ मार दिया।"।
अबकी बार उत्कर्ष ने जवाब दिया और तीनों एक दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगे जबकि इति को कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
"क्या!किसने किस लड़की को मारा?सबके विपरीत हैरान इति ने ध्रुव से पूछा और कुछ पल रुककर तीनों ने उसे पूरी बात बता दी जिसे सुनकर इति के चेहरे पर भी गुस्सा और रोष झलकने लगा।"
"उस पागल को तो मैं देखती हूँ!"
कहने के बाद इति तेजी से वापस चली गई जबकि बाकी तीनों एक दूसरे को हैरान होकर घूर रहे थे"अब भाभी क्या करने वाली है?"
आकर्षित ने ध्रुव से सवाल किया।
"पता नहीं!चल रजत को देखते हैं।"
कहने के साथ ध्रुव बाकी दोनों को लेकर हेडमास्टर के आॅफिस की ओर चल पड़ा।
बहरहाल जब तक वो तीनों हेडमास्टर के आॅफिस
रजत अपने छड़ी की मार से लाल पड़ चुके हाथों को सहलाते हुए वापस आता हुआ दिख गया।
"अबे तूने उसे क्यों मारा?"
ध्रुव ने रजत का हाथ देखते हुए पूछा जबकि रजत मुस्कुराने लगा।
"उसने भी तो मारा था तुम्हें!"
उसने साधारण सा जवाब दिया।
"अबे पागल थी वो जाने देता।"
कहने के साथ ही ध्रुव ने एक झटके से गले लगा लिया और फिर तीनों पेपर के बारे में बातें करते हुए मैदान में खड़े अपने बाकी दोस्तों की ओर चल पड़े।
"तुम लोगों का पेपर कैसा गया?"
उसने वहाँ खड़े अपने सारे दोस्तों से पूछा।
"बढि़या।"
प्रद्युम्न और विराट को छोड़कर बाकी सबने यही जवाब दिया।
"तुम दोनों का क्या हुआ?"
उसने दूसरी ओर मुंह घुमाकर देख रहे विराट और प्रद्युम्न से पूछा।
"ये लोग कल पूरा दिन साथ ही पढ रहे थे और दोनों बराबर जानते थे और आज दोनों अगल-बगल बैठे हुए थे।"
किसी और के बोलने से पहले अरविंद ने उन्हें बताया।
"तो ये अच्छा तो हुआ।"
ध्रुव ने कंधे उचकाते हुए कहा।
"खाक अच्छा हुआ सोलह क्वेश्चन आये थे पेपर में।पाँच इसे नहीं आता था, पाँच मुझे नहीं आता था और पाँच तो हम दोनों को नहीं आता था।आखिरी एक क्वेश्चन बचा था वही हम दोनों को आता था।"
"कौन सा?"
ध्रुव ने पूछा।
"अरे आखिरी वाला रामायण के लेखक का नाम जिसमें पूछा था।"
प्रद्युम्न ने गर्व से बताया।
"और तुम दोनों ने क्या लिखा?"
ध्रुव ने सवाल किया।
"वेद व्यास!"
"गणेश जी!"
दोनों ने एक साथ जवाब दिया।
" अबे वेद व्यास जी ने तो सिर्फ बोला था लिखा तो गणेश जी ने था अपने दांत से।"
प्रद्युम्न ने विराट की बात को काटकर जवाब दिया।
"हाँ सही कहा तूने!"
विराट ने उसकी हाँ में हाँ मिलाकर कहा।
"अबे कमीनों वो रामायण नहीं महाभारत थी।"
कहने के साथ ही ध्रुव बुरी तरह हँसने लगा और सिर्फ वही नहीं बाकियों की भी हँसी छूट गई।
खैर इसके बाद ध्रुव इति के साथ-साथ घर चला गया।
बहरहाल अगले दिन स्कूल के लिए तैयार होते समय अचानक ध्रुव का फोन बजने लगा।
"ये क्यों काॅल कर रही है इस वक्त?"
सोंचते हुए ध्रुव ने उसे काॅल कर दिया और उसके काॅल रिसीव करते ही इति की झनकती हुई आवाज उसके कानों में पडी़।
"हाय ध्रुव!"
"हाँ बोलो जान!"
उसने प्यार से जवाब दिया।
"अर... यार देखो मुझे कुछ रुपयों की जरूरत है।"
इति ने संकोच में कहा जबकि ध्रुव के होंठ सूखने लगे।
"यार मेरी तबीयत कल से बहुत खराब है और डाक्टर की फीस के लिए पाँच सौ रुपए चाहिए।मुझे पता है कि अभी कल ही आपने मुझे एक नया फोन और सिम खरीद कर दिया था और इस वक्त आपके पास पता नहीं रुपये होंगे भी या नहीं पर यार कहीं से एडजस्ट कर लो प्लीज़ मेरे लिए।"
इति ने रिक्वेस्ट भरे स्वर में कहा जबकि ध्रुव एकदम खामोश सुनता रहा।
"अर...मैं देखता हूँ।"
ध्रुव के मुँह से बस इतना ही निकला।
"यार प्लीज़ किसी तरह कर लो और स्कूल में दे देना।"
"हुम्म्!"
ध्रुव ने सिर हिलाया।
"ओके पापा है घर पे तो बाद में बात करते हैं बाय!"
कहने के साथ ही बिना कुछ सुने उसने फोन काट दिया और यहां ध्रुव गहरी सोंच में डूबा स्कूल की ओर चल पड़ा।रास्ते भर वह सिर्फ उन पैसों के बारे में सोंचता रहा।
"यार पर अभी कल ही तो तुमने उसे एक फोन खरीद के दिया था।"
जय ने चिढ़ते हुए कहा।
"वो भी चार हजार में जबकि खुद दो हजार का फोन यूज करता है।अबे तुझे क्या हो गया है वो बस तुझसे रीचार्ज करवाती है और कुछ नहीं।"
पेपर खत्म होने के बाद प्रद्युम्न और जय ने उसे समझाने की कोशिश की।
"नहीं यार ऐसी बात नहीं है उसे जरूरत है!"
ध्रुव ने इति के बचाव में कहा।
"अबे उसे इतनी ही जरूरत है तो वो अपने पापा से माँगेगी या तुझसे कहेगी।और आज तक हम में से किसी ने भी अपनी गर्लफ्रेंड्स का रीचार्ज कभी नहीं कराया।"
देवांश ने भी प्रद्युम्न का समर्थन किया।
"ऐसी बात नहीं है वो बस अपने पापा से पैसे लेने में संकोच करती है।"
ध्रुव ने जवाब दिया।
"और तुझसे माँगने में नहीं।कमाल है!"
आकर्षित ने कहा।
"यार तू समझ क्यों नहीं रहा है वो सिर्फ तेरा यूज कर रही है।"
प्रद्युम्न ने एक आखिरी कोशिश की उसे समझाने की।
"भाई तुम्हें हो क्या गया है तुम प्यार में इतने अंधे कैसे हो गये हो।"
जय ने भी प्रद्युम्न का समर्थन किया और इससे ध्रुव को बहुत चिढ़ होने लगी वह बस जल्दी से जल्दी वहाँ से निकलना चाहता था।
"और रुपये इकट्ठे करने के चक्कर में तूने अपनी मेमोरी कार्ड भी बेंच दी विराट को।दो सौ की मेमोरी कार्ड पचास रुपए में।"
उत्कर्ष ने उससे पूछा और उसने सिर झुका लिया जबकि सब लोग विराट को गुस्से से घूरने लगे।
"यार अब तुम लोग मेरी तरफ ऐसे मत देखो ये इसका अपना आइडिया था।"
विराट ने ध्रुव की ओर इशारा करते हुए जवाब दिया और वहाँ से दूर चला गया।
" यार तू समझ क्यों नहीं रहा उसने सिर्फ तुझे रीचार्ज वाले भईया बना कर रख दिया है।कभी नेट पैक कभी मैसेज पैक कभी मिनट क्या तूने कभी सोंचा है कि इतने रीचार्ज क्यों करवाती है वो जबकि उसे हमेशा सिर्फ तू काॅल करता है और मिस्ड कॉल करने के लिए तो सिर्फ एक रुपया भी काफी है।"
प्रद्युम्न और जय ने उसे आखिरी बार समझाने की कोशिश की पर वो उठकर उनसे दूर चला गया।
"यार ये समझता क्यों नहीं कि इति इसे धोखा दे रही है उसने सिर्फ़ इसे रीचार्ज वाला भईया बनाकर रख दिया है।"
उसके चले जाने के बाद अफसोस करते हुए प्रद्युम्न और जय ने एक दूसरे को देखा और पाया कि दोनों एक ही बात सोंच रहे थे।
खैर इसके बाद रुपये लेकर वो इति की ओर चल पड़ा और उसने चुपचाप पैसे ले लिए जबकि बदले में उसे सिर्फ थैंक्यू मैसेज कर दिया।पर ध्रुव इससे भी खुश था उसे नहीं परवाह थी इति को वो पैसे देने के लिए उसने पहली बार अपनी माँ से झूठ बोलकर पैसे लिए थे या अपनी फेवरिट गानों से भरी मेमोरी कार्ड विराट को दे दी थी या उसने वीर और रजत से भी कुछ पैसे उधार लिए थे जो उसने बाद में लौटा दिये।
बहरहाल इसके अलावा पेपर देने में उसे बहुत मजा आ रहा था और सबसे ज्यादा मजा तो आखिरी पेपर के दिन आया।
"और फिर प्रद्युम्न ने विराट की काॅपी अपनी ओर खींच ली और धड़ल्ले से लिखने लगा तभी हिस्ट्री के टीचर कमल नयन जी काफी देर से दोनों के पीछे खडे़ थे वो अपनी घरघराती आवाज में बोले कि यहाँ क्या हो रहा है और ये दोनों झट से खडे़ हो गये पर तभी सर ने दोनों हाथों से दोनों के गाल पे एक साथ क्या साॅलिड तमाचा मारा।"
वीर उन्हें हँसते हुए बता रहा था जबकि ध्रुव और बाकी सब हँसे जा रहे थे।
"और फिर इन दोनों को पीटते हुए प्रमोद सर के पास ले गये वहाँ भी इनकी कुटाई हुई।"
अरविंद ने हँसते हुए बताया जबकि वो दोनों बैठे हुए सबको गुस्से से घूर रहे थे।
"इसका तो ठीक है पर अपने भरत का पता है आज फिजिक्स का पेपर था और बंदा केमिस्ट्री की नकल की पुर्जियाँ लेके आया था जिसका पेपर हम परसों ही दे चुके थे।"
ध्रुव ने हँसते हुए उन्हें बताया और सब भरत को चिढ़ाने लगे।
"वो सब तो ठीक है लेकिन ये साला पुर्जियाँ छुपाता कहाँ है कि इतनी चेकिंग के बाद भी नहीं पकड़ में आता।"
ध्रुव ने हैरानी से पूछा।
"क्योंकि वो पुर्जियां ऐसी जगह छुपाता है जहाँ टीचर हाथ नहीं लगाते।"
जय ने उसे आँख मारकर बताई और उसकी बातों का मतलब समझते ही ध्रुव का सिर वहीं पास में खड़े प्रतीक की ओर मुड़ गया।और लगभग फौरन ही सिर्फ उसकी ही नहीं बल्कि सबकी नजरें प्रतीक की ओर दौड़ गई जिसे अचानक उल्टियाँ आने लगीं।
"अब इसे क्या हुआ?"
सबने एक साथ हैरानी से पूछा जबकि देवांश और जय उसे सम्हलने लगे हालांकि वो अपने को भी बचाने की कोशिश कर रहे थे ताकि वह उनपर भी उल्टियाँ न कर दे।
"अर... जब हम पेपर दे रहे थे तो एक चिट भरत ने इसे दे दिया था लेकिन सर ने देख लिया और जब इसको लगा कि ये पकड़ा जायेगा तो इसने वो चिट झट से मुँह में रखा और निगल गया।"
ध्रुव ने हैरानी के साथ उन्हें सच्चाई बताई।
"क्या?"
ध्रुव की बात सुनकर सब एकसाथ चौंक पड़े और फौरन ही सब हँसते-हँसते लोटपोट हो गये।
"क्या हुआ भाई लोग किसका मजा ले रहे हो।"
अचानक वहाँ पहुँचे भरत ने सबसे पूछा जबकि उसे देखकर सब और भी ज्यादा हँसने लगे।
खैर फिर अमित ने उसे सबकुछ बता दिया और पूरी बात जानने के बाद वो भी मुस्कराने लगा।
"अबे गधे वो पुर्जियां मैंने वहां नहीं छुपाई थीं जहाँ तुमलोग सोच रहे हो।"
उसने अपनी बात रखी।
"सच मे?"
प्रशांत ने पूछा।
"हाँ।"
और तब जाकर कहीं प्रतीक को आराम मिला।
"अच्छा अगर वहां नहीं छुपाई थीं तो छुपाई कहाँ थी?"
अमित ने भरत से सवाल किया और सबके चेहरे भरत की ओर मुड़ गए, ध्रुव जय और प्रतीक के भी।
"मोजे के अंदर।"
भरत ने साधारण सा जवाब दिया और उसका जवाब सुनकर एक बार फिर प्रतीक उल्टियाँ करने लगा।क्योंकि पूरी क्लास को यह बात पता थी कि वो अपने मोजे महीने में सिर्फ एक बार धुलता था।
सभी खुश थे क्योंकि उनके हाफ इयरली इक्जाम खत्म हो चुके थे पर ध्रुव खुश नहीं था क्योंकि इक्जाम खत्म होते ही इति अगले दिन अपने छोटे भाई और मम्मी के साथ गाँव चली गई।और इस बात के लिए ध्रुव उससे काफी नाराज था क्योंकि वो उसे बिना बताए ही चली गई थी बहरहाल ध्रुव इससे बहुत उदास हो गया था।
"यार आप कमसे कम मुझे बताकर तो जा सकती थीं!"
ध्रुव ने उदासी के साथ कहा।
"अरे यार मैं बताती कैसे मुझे मौका ही नहीं मिला।"
इति ने सपाट लहजे में जवाब दिया।
"यार कम से कम जाने से पहले एक बार मैसेज ही कर देती आपको बस स्टैंड तक छोड़ने तो आ ही सकता था।"
"क्या यार अभी रोज तो हम मिलते थे स्कूल में और कल वैसे भी मेरा मैसेज पैक खत्म हो गया था।"
उसने दोबारा तीखे स्वर में कहा।
"क्या यार आपके फोन मैं बैलेंस और मैसेज पैक मैं इसलिए डलवा देता हूँ ताकि आपका भी मन करे तो मुझे मैसेज कर सको और बातें कर सको पर नहीं सिर्फ एक या दो मैसेज आते हैं मुझे और आपका पूरा पैक खत्म हो जाता है जबकि हर दिन हमें सौ मैसेजेस फ्री मिलते हैं।"
उसने बेबसी भरे लहजे में कहा।
"यार रीचार्ज करवा दिया तो इसका ये मतलब नहीं कि मुझे खरीद लिया आपने या मैं आपकी गुलाम हो गई।अगर इतनी ही दिक्कत है तो आज के बाद मत करवाना रीचार्ज।"
कहने के साथ ही उसने बिना ध्रुव की कोई बात सुने एक झटके से काॅल डिसकनैक्ट कर दिया।हालांकि इसके बाद ध्रुव ने उससे बात करने की बहुत कोशिश की मगर हर बार वो फोन कट कर देती और आखिरकार उसने हार मान लिया और बिना कुछ खाये-पिये सो गया।
"और फिर उसने बोला कि आपसे एक काम था।"
" तो मैंनें सीधे-सीधे पूछा कि हाँ बोलो अब कितने का रीचार्ज करवाना है।"
"क्या कहा?तुम्हारा मतलब है मैं हमेशा सिर्फ तुमसे रीचार्ज करवाने के लिए काॅल करती हूँ।"
इति ने भी उखड़े लहजे में कहा।
"और ये बात तो गलत भी नहीं है है न!अगर आपका मैसेज पैक या बैलेंस न खत्म हो तो शायद आपको मेरी याद भी नहीं आती।"
कहने के बाद मैंने भी फोन रख दिया और अब हमारा झगड़ा हो गया।
उसने यह बातें जय और आकर्षित को बताई।
"ओह पर ये बुरा हुआ!"
दोनों ने गहरी आह भरते हुए जवाब दिया।
"यार ये लड़कियां कब क्या सोंचती हैं इनका कुछ पता ही नहीं चलता अब मेरी वाली को ही देख लो कल तक अच्छा खासा बात कर रही थी लेकिन कल अचानक ऐसा पता नहीं क्या हो गया जो वो मुझे इग्नोर करते जा रही है।"
जय ने आहें भरते हुए कहा।
"क्यों तुम दोनों के बीच क्या हो गया?"
ध्रुव ने हैरानी के साथ जय का चेहरा देखते हुए पूछा।
"कुछ नहीं वो बात ही नहीं करती मुझसे मिलने जाओ तो दूर भाग जाती है और घर तक साथ जाता हूँ तो बीच रास्ते में चकमा देकर कही निकल जाती है।"
जय ने उदास होकर कहा।
"भाई तुम लोगों का ही अच्छा है उत्कर्ष का तो और भी बुरा हाल है।कल पता नहीं किस बात पे तृप्ति ने उसकी कम्पलेंट अपने भाई विकी को कर दी और उसने बेचारे उत्कर्ष को कूट दिया।"
आकर्षित ने हँसते हुए बताया।
"अबे अभी कहाँ है वो?"
"घर पे है आराम कर रहा है।"
खैर इसके बाद वे सब फिजिक्स और केमिस्ट्री के प्रैक्टिकल करने में व्यस्त हो गए और लंच पीरियड तक सब थक कर बेहाल हो चुके थे।वापस क्लास में आने के बाद अचानक रजत काफी परेशान दिखने लगा और पूरे क्लास में उथल-पुथल करने लगा जबकि किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।
"मेरा बैग कहाँ गया?"
क्लास की सभी बेंचों को अच्छी तरह खंगालने के बाद रजत ने आकर्षित और मोहन से पूछा।
"हमें क्या पता!"
दोनों ने कंधे उचका कर जवाब दिया।
"मुझे पता है तुम लोगों ने ही छुपाया है।"
उसने दोनों पर झपटने के साथ ही गुर्राकर कहा।
जबकि उसके लगाये आरोप को सब नकार रहे थे।आखिरकार काफी वक्त बीत जाने पर भी जब उसका स्कूल बैग कहीं नहीं मिला तो वो नाराज होकर उपाध्याय सर के पास सबकी शिकायत करने चल पड़ा।
इधर उसके निकलते ही सब जल्दी-जल्दी अपना अपना बैग खाली करने लगे।किसी ने उसकी एक काॅपी छिपा रखी थी तो किसी ने दूसरी और ऐसे ही आधे क्लास में रजत की काॅपी-किताबें जो छिपी हुई थीं बाहर निकल आईं जबकि मोहन ने अपने बैग में उसका पूरा स्कूल बैग छिपा कर रख दिया था और देखकर ध्रुव को काफी हँसी आई।
इसके बाद जब तक रजत उपाध्याय सर को लेकर वापस आया तब तक उसका बैग अच्छी तरह से पैक होकर उसके बेंच पर रखा हुआ था जबकि सारे लड़के-लड़कियाँ अपने-अपने सामने बुक्स खोले पढ़ रहे थे।और जब उपाध्याय सर ने देखा कि ऊसने बेकार ही उन्हें वहां तक दौड़ा दिया था तो उन्होंने उसे खूब खरी-खोटी सुनाई और डाँट कर भगा दिया जिससे वो अपने दोस्तों से नाराज़ हो गया।
खैर बाद में उन सबने मिलकर उसे मना ही लिया पर छुट्टी के बाद घर जाते वक्त ध्रुव काफी उदास लग रहा था जिसका कारण इति की नाराजगी थी।अपनी गलती न होने पर भी वह पूरी रात उसे मैसेजे करके माफी मांगता रहा पर इति ने उसके एक भी मैसेज का रिप्लाई नहीं दिया।खैर घर जाते वक्त रास्ते में उसने इति के नम्बर पे मैसेज पैक डलवा दिया ये सोंचकर कि शायद रिप्लाई देने के लिए उसके पास पैक खत्म हो गया हो बहरहाल फिर भी इति का मैसेज या काॅल नहीं आया और आखिरकार उसने हार मान ली और उदास होकर कोचिंग चला गया।
"क्या हुआ तुम्हें आज काफी बुझे-बुझे से लग रहे हो?"
विजय सर ने उसे उदास देखकर पूछा।
"अर... कुछ नहीं सर!"
उसने चुपचाप सिर हिलाया और कोचिंग पढ़ने के बाद वापिस घर चल पड़ा।
अगले तीन-चार दिन स्कूल और कोचिंग में होली की छुट्टियां हो चुकी थीं इसलिए दोस्तों से मिलने का चांस भी कम हो चुका था और यह सब सोंचकर उसकी उदासी निराशा में बदल गयी।बहरहाल अभी वह ये सब सोंच ही रहा था कि इति का काॅल आ गया और फौरन उसका चेहरा गुलाब की पंखुड़ियों की तरह खिल उठा।
"हाय!"
उसने वापस काॅल करने के बाद कहा।
"हाय!क्या कर रहे हो?"
इति ने प्यार  से पूछा और ध्रुव की रही-सही नाराजगी भी कफूर हो गई।
"कुछ नहीं बस आपको याद कर रहा था।"
उसने प्यार से जवाब दिया।
"ओह यार आप इतना प्यार करते हो मुझसे बट एक मैं हूँ कि आपको हमेशा तंग करती रहती हूँ।"
खुद से नाराजगी जताते हुए इति ने कहा।
"ऐसा कुछ नहीं है।"
"नहीं यार सच में ऐसा ही है लेकिन मैं क्या करूँ यहाँ हर वक्त कोई न कोई मेरे आसपास हमेशा रहता है और दूसरे यहाँ कभी नेटवर्क नहीं रहता है इस सिम का सोंच रही हूँ एक नया सिम ले लूँ पर वो भी नहीं मिल रहा है यहाँ।"
उसने अफसोस करते हुए कहा।
"क्यों?"
ध्रुव ने हैरानी से सवाल किया।
"अर... यहाँ आसपास कोई दुकान ही नहीं है और यहां बस वोडाफोन का रीचार्ज मिलता है।हाँ एक काम हो सकता है और वो ये कि आप वहीं एक सिम ले लो ओर उसे घर पे नेहा को दे दो वो यहां भिजवा देगी।"
"हुम्म्!ठीक है।"
बिना कुछ सोंचे उसने हाँ कर दिया।
"ओह यार आप कितने अच्छे हो पता है यहाँ बहुत मजा आ रहा है।"
उसने चहकते हुए कहा।
"आप का ही अच्छा है!"
ध्रुव ने निराश होकर कहा।
"ऐसे क्यों बात करते हो यार इससे मुझे गुस्सा आता है।अब आपके लिए मैं दुखी तो नहीं रह सकती।"
इति ने चिढे़ हुए स्वर में कहा।
"हाँ समझता हूँ वैसे कब आ रही हो आप?"
"कम से कम होली के बाद अगले हफ्ते।"
"ओह!"
ध्रुव ने आह भरी।
"अच्छा बाद में बात करते हैं नीचे बड़े पापा बुला रहे हैं।"
इति ने जल्दी से कहा।
"ओके बाय!"
कहने के साथ ही ध्रुव ने काॅल खत्म करने के लिए उँगलियों को हिलाया मगर दोबारा इति की टर्र-टर्र जैसी आवाज सुनकर उसने अपने हाथों को वहीं रोक लिया।
"यार ये क्या आप दोस्तों जैसे बाय बोल रहे हो आप ब्वायफ्रैंड हो मेरे कम से कम आई लव यू तो बोल दिया करो।"
"ओके!"
ध्रुव ने लड़कियों के जैसे शर्माते हुए कहा।
"यार मैं थोड़ी बेशर्म हूँ इसलिए मुझसे ओपनली बात करो मुझे अच्छा लगेगा।"
उसने ध्रुव को समझाने के अंदाज में कहा।
"हुम्म्!वो तो मैं भी करना चाहता हूँ पर मैं ये सोंचता हूँ कि कहीं आपको बुरा न लग जाए।"
"नहीं यार मैं बुरा क्यों मानूँगी आपके बात का इतना प्यार जो करते हो आप मुझे।"
"अच्छा!वो तो है।ओके बाय बाद में बात करते हैं।"
"ओके बाय एंड आई लव यू!देखा पहले मुझे ही कहना पड़ा।"
"आई लव यू टू!"
कहने के साथ ही शर्माते हुए उसने काॅल रख दिया और बिस्तर पर जाते वक्त वह काफी खुश लग रहा था भले ही आज भी उसकी बात इति से काफी कम हुई थी लेकिन फिर भी उसके सारे गिले-शिकवे दूर हो चुके थे।
अगले दिन होली थी और सुबह उठते ही उसने सबसे पहले इति को मैसेज करके हैप्पी होली विश किया और इसके बाद में उसने अपने सारे दोस्तों को भी विश कर दिया हालांकि इसी चक्कर में उसने इति के पुराने नम्बर पर भी मैसेज कर दिया जो उसकी दीदी का था पर उसका ध्यान इस ओर तब तक नहीं गया जब तक कि उसका रिप्लाई नहीं आया।
"आपको भी हैप्पी होली!"
काफी देर बाद जब रिप्लाई आया उसे लगा इति ने ही उसे मैसेज किया था।
"हाय!कैसी हो?"
उसने टेक्स्ट मैसेज किया और रिप्लाई आने का इंतजार करने लगा।
"मैं अच्छी हूँ।पर इति गाँव गई है।"
ध्रुव अचानक यह मैसेज देखकर चौंक पड़ा उसने एक बार मैसेज को दोबारा पढ़ा और आखिरकार उसे उसकी गलती नजर आ ही गई।
"ओह साॅरी मुझे लगा था कि ये नम्बर उसी के पास है।"
उसने हड़बड़ी में रिप्लाई दिया।
"कोई बात नहीं।"
दूसरी तरफ से रिप्लाई आया।
"ओके बाय!"
ध्रुव ने बात बंंद करने के गर्ज से कहा।
"क्यों आप मुझसे बात नहीं करना चाहते?"
दूसरी तरफ से इति की बहन ने रिप्लाई दिया वहीं ध्रुव जो अब तक सिर्फ इसी उधेड़बुन में था कि उसकी बात आखिर हो किससे रही थी नेहा से इति की बड़ी बहन ममता से।बहरहाल रिप्लाई पढ़ने के बाद उसका दिमाग घूमने लगा और उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह रिप्लाई करे तो क्या करे।
"नहीं ऐसी बात नहीं है पर क्या मैं ये जान सकता हूँ आप नेहा हो या ममता जी!"
उसने पूछा।
"हुम्म्!नेहा और आपको मुझे नेहा जी कहने की जरूरत नहीं है।"
"ओके!"
ध्रुव मैसेजिंग बंद करना चाहता था पर लगातार नेहा के रिप्लाई करने की वजह से वो ऐसा कर नहीं पा रहा था।
"कभी-कभी हमसे भी बातें कर लिया करिये या सिर्फ इति दी ही आपकी फ्रैंड हैं।"
"ऐसा कुछ नहीं है।"
खैर इसके बाद उसके दोस्त उसे बुलाने आ गये और वह उनके साथ घूमने चला गया।जमकर होली खेलने और इंजाॅय करने के बाद शाम को उसने इति को बता दिया कि आज नेहा से उसकी बात हुई थी पर जैसा कि उसने सोंचा था इति ने वैसा कुछ रियेक्ट नहीं किया।इस बीच उसकी बातचीत सिर्फ इति तक ही सीमित न रहकर ममता से भी होने लगी और चूँकि ममता उसकी क्लासमेट थी इसलिए जल्दी ही दोनों काफ़ी घुलमिल गये।
"यार दोनों से बातें करने के पीछे मेरी कोई गलत भावना नहीं है बल्कि मैं बस सबसे घुलना मिलना चाहता हूँ ताकि बाद में जब सबको मेरे और इति के रिलेशनशिप का पता चले तो उन्हें बुरा न लगे।"
छुट्टियों के बाद पहली बार स्कूल खुलने पर ध्रुव ने जय को बताया।
"सही है भाई!"
जय ने उसका समर्थन किया।
"तुम बताओ तुम्हारा और अंशिका का क्या चल रहा है आजकल?"
उसने जय से सवाल किया।
" क्या बताऊँ भाई कुछ समय में ही नहीं आ रहा दिन में घंटों मैं उसके घर के चक्कर लगाता हूँ और स्कूल जाते वक्त उससे बातें करने की कोशिश करता हूँ पर वो मिलती ही नहीं और मिलती है तो बात तक नहीं करती।"
जय ने अपना हाल-ए-दिल बयान किया।
"फोन नम्बर दिया उसने?"
"नहीं!"
जय ने गर्दन हिलाते हुए कहा।
"यार तो एक काम करो कल उसे अपना नम्बर और एक कोई अच्छा सा गिफ्ट दे दो।"
ध्रुव ने उसे सुझाव दिया।
"अब इसे क्या हुआ?"
उसने प्रतीक की ओर इशारा करते हुए देवांश से सवाल किया।
"हुआ क्या दोनों के घर पे इनका मैटर पता चल गया।घसीटामार राइटिंग में नोट्स लिख रहे जय ने उन्हें बताया।
"कैसे?"
दोनों ने एकसाथ पूछा।
"अरे भाई क्या बताऊँ मैंनें कहा था कि एक दूसरे के लेटर्स पढ़ के फाड़ देना।लेकिन इन्होनें नहीं मानी मेरी बात अब भुगत रहे हैं।"
जय ने गुस्से में गुर्राते हुए कहा जबकि उसका उदास और निराश चेहरा देखकर बाकी दोनों को बहुत बुरा लगा।
"एक काम करते हैँ आज शाम को प्रद्युम्न के साथ चलकर उसके लिए कोई अच्छा सा गिफ्ट लेते हैं और कल उसे दे देना।"
ध्रुव ने उसे समझाते हुए कहा।
"हुम्म्!ये ठीक है।"
और इसके बाद अगले दिन तीनों ने मिलकर उसके लिए एक खूबसूरत गिफ्ट पैक करवाया और अगले दिन स्कूल के टाइम से दस मिनट पहले पहुँचकर ध्रुव और जय अंशिका का इंतजार करने लगे।
"यार काफी देर हो गया मुझे नहीं लगता कि वो आज आयेगी।"
काफी देर से उनके इंतजार में स्कूल के गेट पर खड़े जय ने कहा।
"भाई तुम सब्र करो वो आयेगी, लो आ गई देखो!"
ध्रुव ने सामने इशारा करते हुए कहा जहाँ से अंशिका और उसकी सहेली दोनों साथ आ रही थीं।कुछ देर पहले तक जो लड़कियाँ हँसते हुए और आपस में बातें करती आ रही थीं उन्हें वहाँ देखकर एकदम से खामोश हो गईं।
"जाओ!"
ध्रुव ने जय को धक्का देकर कहा और धड़कते हुए दिल के साथ जय अंशिका के पास पहुंचा।उसने उसे रुकने को कहा और फिर अपनी जैकेट की पाकेट से एक छोटा सा गिफ्ट का पैकेट बाहर निकाल कर अंशिका की ओर बढा़ दिया।जबकि लगभग दो मिनट तक अंशिका कुछ बोलती रही और जय सुनता रहा बहरहाल उसके बाद वो ध्रूव के पास वापस लौट आया।
"क्या हुआ?"
जय के हाथ में अभी भी वह गिफ्ट पैकेट था और ये देखकर उसे काफी हैरानी हुई।उधर अंशिका और उसकी सहेली स्कूल का गेट पार करके अंदर चली गईं जबकि इधर ध्रुव हैरान होकर जय का सफेद चेहरा देख रहा था और जय भी उतना ही हैरान लग रहा था।
"हुआ क्या भाई बताओ तो?"
आखिरकार प्रेयर खत्म करके क्लास में घुसते वक्त ध्रुव ने एक बार फिर जय के सामने वही सवाल दोहराया जो वो पिछले आधे घंटे से पूछ रहा था जबकि जय एकदम से स्थिर किसी रोबोट की तरह लग रहा था और यह देखकर ध्रुव का मन हो रहा था कि जय को एक लात जमा दे लेकिन उसे जय की दोस्ती प्यारी थी।
"कुछ बताओगे भाई?"
उसने आसपास किसी और को न देखकर एकबार फिर अपना सवाल दोहराया।जबकि जय पहले तो पलट कर उसे घूरने लगा और फिर उसने कुछ कहने के लिए अपना मुँह एकबार खोला और बिना कुछ कहे बंद कर लिया।
"अर... उसने मना कर दिया।"
अचानक काफ़ी देर बाद जय ने उसे बताया।
"क्या?हुआ क्या पूरी बात बताओ!"
हैरान ध्रुव ने उसका चेहरा देखा और उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह बुरी तरह उल्टियाँ करने वाला हो।
"अर.... कुछ नहीं उसने बस यही कहा कि वो ये सब नहीं कर सकती और मैंनें जब इसका कारण पूछा तो पहले तो उसने बताने से इंकार कर दिया और काफी पूछने के बाद बोली कि उसके घर पर ये सब अलाऊ नहीं है।इसलिए आज के बाद से मैं उसका पीछा छोड़ दूँ।"
"क्या?"
ध्रुव ने आजतक इससे पेचीदा और अजीब बात नहीं सुनी थी लेकिन ये सब सुन कर उसके मन में अंशिका के लिए बेहद गुस्सा उमड़ रहा था और इसी चक्कर में उसके मुँह से अंशिका के लिए एक भद्दी सी गाली निकल गई पर इसके लिए उसने जय से साॅरी बोल दिया।
"साॅरी भाई!"
ध्रुव ने शर्मिंदगी से कहा जबकि जय ने कोई रियेक्ट नहीं किया।
"अब इससे फर्क नहीं पड़ता।"
जयने गहरी सांसें लेते हुए कहा।
"अबे यार ये क्या बकवास है घर से परमीशन नहीं मिली।अबे परमीशन मांगता कौन है और वो भी प्यार एक्सेप्ट करने के बाद।यार उसका मतलब तो यही है कि अपने घरवाले हमें जबर्दस्ती यहां लड़कियाँ पटाने भेजते हैं अगर हर हफ्ते में हमने एक लड़की नहीं पटाई तो घरवाले हमें स्कूल से निकाल देंगे।साला अजीब सियापा पाल रखा है।"
ध्रुव ने अपनी भड़ास निकालते हुए कहा और इसके बाद धीरे-धीरे उसकी टोली में एक-एक करके प्रद्युम्न अमित उत्कर्ष विराट के साथ-साथ और भी कई दोस्त इसमें शामिल हो गए।
वीर का भी कुछ समय पहले उसकी गर्लफ्रेंड से ब्रेकअप हो चुका था वहीं उत्कर्ष के आँखों के नीचे तृप्ति के भाई के मुक्कों का निशान अभी भी मौजूद था जबकि उस दिन से दोनों की बातचीत बिल्कुल बंद थी।
"यार ये सारी लड़कियाँ पागल होती हैं क्या?"
अमित ने उससे पूछा।
"हाँ शायद!हमारी गर्लफ्रेंड्स इस बात का सबूत हैं।इति और मेरा एक बार फिर से झगड़ा हो गया।"
"क्या फिर से?क्यों?"
सबने उसे एकसाथ पूछा।
"अबे यार क्या बताऊँ जबसे गाँव गई है लगता है उसका दिमाग चल गया है।अगर जरूरत न तो वो दिनभर में एक बार भी मैसेज या काॅल नहीं करती जबकि मैंनें उसके पास अच्छा सा सिम भिजवा दिया है जिसका नेटवर्क भी फुल रहता है वहां पर उसे मेरी परवाह कतई नहीं है।सिर्फ तभी काॅल करेगी जब उसका रीचार्ज खत्म हो जायेगा और इसके बाद भी अपना काम बोलने के बाद बाय बोल के जल्दी से काॅल काट देती है बस यही बात मैंनें उसके मुँह पर बोल दी तो बेचारी को बुरा लग गया।"
उसने सबकुछ एक साँस में कह दिया और सब उसे घूरने लगे।
"हद है यार!"
विनीत ने आह भरते हुए कहा।
"अभी तो कहानी शुरू हुई है अभी तक तो सिर्फ वही रीचार्ज कराती थी अब उसकी दोनों बहनें भी इसी काम में लग गईं एकाध बार सौ-दो सौ का रीचार्ज करवा भी दिया ये सोंचकर कि अपने हैं पर अब उनका रोज का यही काम हो गया है।और तो और छोटी वाली बार-बार मुझे पूछती है कि इति और मेरे बीच क्या चक्कर चल रहा है वहीं उसकी बड़ी बहन तो उससे भी चार कदम आगे है ऐसे-ऐसे मैसेज करती है कि साला कभी-कभी तो मुझे भी शक हो जाता है कि इति मेरी गर्लफ्रेंड है या वो।खुद तो मुझसे बात करती है और मुझे नेहा से बातें करने से मना करती है।अबे कल तो मिलने के लिए भी बुला रही थी घर पे और मेरा दिमाग घूम गया।"
"क्या?"
सबने एकसाथ हैरानी से सवाल किया और ध्रुव उन्हें अपने फोन के मैसेजेस दिखाने लगा जिसे देखकर सब हैरान रह गए और उन्होंने दोबारा उसकी बात काटने की कोशिश नहीं की।
"और जब मुझे लगने लगा कि अब मैटर ज्यादा सीरियस हो रहा है तो मैंनें उसे अपने और इति के रिलेशनशिप के बारे में खुलकर बता दिया जिसका शायद बेचारी को सदमा लगा है इसलिए दोबारा उसने रिप्लाई नहीं किया।सिर्फ इतना कहा कि उसे लगभग अंदाजा तो था पर मुझे लगता है कि बेचारी का दिल टूट गया।"
ध्रुव ने सबको अपनी आपबीती सुनाई और जिसे सुनकर हर कोई दुविधा में था।
"मेरे ख्याल से इति की दोनों बहनें तुमसे प्यार करने लगीं हैं।"
जय ने उसकी पूरी बात का निष्कर्ष निकाला और लगभग बाकियों की भी यही राय थी बहरहाल ध्रुव इससे चिंतित और परेशान नजर आ रहा था।
"अगर ऐसा है भी तो ये नहीं होना चाहिए।"
उसने खुद को कन्विंस करने की कोशिश की मगर भीतर से उसे भी लग रहा था कि कहीं कुछ तो गड़बड़ जरूर थी।और इस बात से उसे अपना और इति का रिश्ता गहरे अंधकार में डूबता हुआ महसूस हो रहा था... To Be Continued In Next Last Chapter
  
                                    Written By
                         Manish Pandey’Rudra’

©manish/pandey/06-03-2018

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