Friday, March 23, 2018

Chandni

                            चाँदनी

जाने क्यों मैं हर बार उसे देखते ही बस उसकी ओर खिंचा चला जाता था।ऐसी कौन सी कशिश थी उसकी भूरी आँखों में ये आज तक समझ नहीं पाया था मैं।काफी भागदौड़ और उथल-पुथल करने के बाद किसी तरह दोस्तों से मिन्नतें करते और उन्हें बंशी काका के दुकान की चाय पिलाने के बाद आखिरकार मुझे उसका नाम पता चल ही गया।
चाँदनी!
जैसा कि उसका नाम था चाँदनी और ठीक उसी प्रकार उसका चेहरा चाँद के उजले किरण की तरह ही हमेशा चमक-दमक से भरा और खिला-खिला रहता था।दूधिया रंगत के उसके चमकदार चेहरे पर आँखों के आगे से झाँकती उसकी लटें बस दिल चीर जाती थीं मेरा।
जबकि मैं दुबला पतला सा मगर सामान्य कद वाला असामान्य लड़का था।हमेशा की तरह आज भी मैंने बडी़ और बिना फिटिंग वाली सर्ट और सूती के कपड़े की पैंट पहन रखी थी।मैं बालों में ढे़र सारा तेल और पानी लगाकर हमेशा बालों को गीला और चिपका कर रखता था जो कि कईयों को बेहद बकवास लगता था सिवाय मेरे जिगरी दोस्त ऊँकार के जो लगभग मेरी तरह ही दिखता था बस उसकी कद काठी मुझसे ज्यादा बेहतर थी।
"यार पांडेय तू उससे बात क्यों नहीं कर लेता?"
मेरे अजीज दोस्त ऊँकार ने हर रोज कि तरह आज फिर मुझे उकसाने की कोशिश की।
"प.... प... पागल ह... है क... क्या?"
मेरे अंदर एक बहुत बड़ी कमी थी और यही सबसे बड़ी वजह थी जिसके कारण मैंने कभी उससे बात करने की कोशिश नहीं की और ये था मेरा हकलाना।
मुझे ये कोचिंग जाॅइन किये हुए करीब एक हफ्ते से ज्यादा हो गया था और तब से कोई मुझे हकला, कोई छुकछुक गाड़ी तो कोई ढक्कन बुलाता था और उन सबका मुँह तोड़ने का मन करता था लेकिन अपना डेढ़ पसली का शरीर और उनका एक फुट ऊँचा कद देखकर मैं शांत रह जाता था।
"क्यों क्या दिक्कत है?"
ऊँकार ने एकबार फिर सवाल किया।
"क.... क.... क..... कोई दिक्कत.... न.... नहीं है।"
मैंनें उसकी बात काटते हुए कहा पर असल में मैं भीतर से दहक रहा था और ऐसा लग रहा था जैसे मेरे भीतर कोई ज्वालामुखी दहक रहा हो।
"यार ये अंग्रेजी अपने पल्ले नहीं पड़ती।"
जोरों से काॅपी पटकते हुए ऊँकार ने खहा और जम्हाई लेते हुए बेंच पर सिर रखकर लुढ़क गया।
"इसीलिए तो अंग्रेजी भाषा की कोचिंग पढ़ने आते हैं।"
मैंने कटुता से जवाब दिया और वह प्रैराग्राफ अनुवाद करने लगा जो कविता मैडम ने करने को कहा था।और आखिरी लाइन का अनुवाद पूरा करते ही मैं झट से खड़ा हो गया।
"ह.... ह....!"
मैंनें बोलने की कोशिश की पर जाने क्यों मैं बोल नहीं पाया और ज्यादातर लड़के-लड़कियाँ मुझ पर हँस रहे थे सिवाय कविता मैम और ऊंकार को छोड़कर।
"ओये ह.... ह.... हकले जल्दी बोल वरना कोचिंग का टाइम निकल जायेगा।"
आनंद ने फिर आज मेरा मजाक उड़ाया पर अब मुझे इसकी आदत हो चुकी थी लेकिन हाँ, बुरा तो अब भी लगता था।इसलिए मैंनें सोंचा मेरा वापस अपनी जगह पर बैठ जाना ही ठीक होगा।
"हो गया मैम हम दोनों का।"
इससे पहले कि मैं बैठता एक मधुर आवाज मेरे कानों में घुलती चली गई।और हालांकि मैंने उसकी ओर देखा पर उससे पहले ही मेरे दिल ने मुझे बता दिया था कि यह आवाज उसी की थी चाँदनी की।
मैं बस हैरान इस बात पर था कि उस वक्त मेरी ओर देखते समय उसके होंठों पर मुस्कान तो थी मगर मेरा मजाक उड़ा रही हँसी उन भूरी आँखों में कहीं भी नहीं थी।
"आओ!"
कविता मैम ने हमें पास बुलाया और एक साथ हम अपनी-अपनी नोटबुक लेकर आगे बढ़े।मैं अपने दिल को बार-बार उसकी ओर देखने से रोक रहा था पर कम्बख्त ऐसा लग रहा था जैसा मेरा दिल किसी और की जी हजूरी करने लगा हो।कविता मैम के पास पहुंचने के बाद मैंनें पहले उसे मौका दिया ताकि वह अपने जवाब की जाँच पहले करा सके।हालाँकि मेरा ऐसा करने के पीछे यही कारण था कि मैं कम से कम कुछ देर ज्यादा उसके पास खड़ा रह सकूं।
कविता मैम उसकी काॅपी में लिखा जवाब चेक कर रही थीं जबकि मेरी नजर उसकी हैंडराइटिंग पर जमी हुई थी।
"वाह क्या खूबसूरत राइटिंग है इस लड़की की।"
मैंनें मन ही मन कहा कि और धीरे-धीरे डरते हुए अपनी नजरें उसके चेहपर घुमाई।और ठीक उसी वक्त उसने अपना चेहरा मेरी ओर घुमाया और उसने मुस्कुरा दिया पर और मेरा चेहरा फौरन शर्म के मारे लाल हो गया।और जल्दी से मैंनें अपनी नजरें उस पर से हटा लीं ओर नीचे अपने पैरों की ओर देखने लगा।
"क्या कर रही हो चाँदनी बेटा यहाँ एन नहीं द का प्रयोग करना था।"
कविता मैम ने उसे समझाते हुए कहा।
"साॅरी मैम!"
एक बार फिर कानों में मिश्री घोलने जैसी उसकी आवाज़ सुनाई दी और मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा।
"कोई बात नहीं बाकी सब सही है।"
कहने के साथ ही कविता मैडम ने उसकी काॅपी उसकी ओर बढ़ा दी।
इसके बाद वो वापस मुडी़ और हिरनी जैसी चाल चलते हुए अपनी बेंच पर जाकर बैठ गई।
"और अविनाश बेटा घर पे सब कैसे हैं?"
कविता मैम ने मेरी काॅपी चेक करते हुए मुझसे पूछा।
"ठ... ठीक हैं।"
मैनें आराम से जवाब दिया खैर इसके बाद कविता मैम ने एक-दो सवाल और पूछे और फिर उन्होंने मेरी काॅपी मेरी तरफ बढ़ा दी।
"लो एकदम सही है कोई गलती नहीं।"
उन्होंने गर्व से कहा और वापस अपनी बेंच की ओर लौटते वक्त मैं फूल कर कुप्पा हो रहा था।
खैर इसके बाद कोचिंग खत्म होते ही सारे लड़के-लड़कियाँ एक-एक करके बाहर निकलने लगे।
"तू चल मैं फीस क्लियर करके आता हूँ।"
बोलकर ऊँकार ने जबरदस्ती मुझे बाहर निकाल दिया और मैं बाहर निकल कर ये सोंचते हुए उसका इंतजार करने लगा कि आखिर जब हम दोनों ने कोचिंग एक साथ स्टार्ट किया था और इस महीने की फीस पिछले हफ्ते ही हमने एक साथ भर दिया था तो वह अब कौन सा फीस क्लियर करने गया था।
"अच्छा काम किया।"
अभी मैं इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था कि अचानक चांदनी की आवाज़ सुनकर मुझे झटका सा लगा।
"थ.... थ..... थ.... थैंक्स!"
मैंनें एक बार फिर हकलाहट भरे स्वर में जवाब दिया बहरहाल फौरन ही मेरा मन खुद का गला दबाने का करने लगा।मैं हर बार उसके सामने अपनी बेइज्जती करवा देता था।
"तुम मेरी एक हेल्प करोगे?"
उसने संकोच भरे लहजे में मुझसे पूछा जबकि मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था।
"ह..... ह..... हाँ क.... क्यों न... नहीं।"
मुझे अब खुद पर शर्म आ रही थी क्योंकि आमतौर बोलते वक्त मैं इतना ज्यादा भी नहीं फँसता था।लेकिन आज मेरी आवाज़ को न जाने क्या हो गया था।ऐसा लग रहा था जैसे मेरी आवाज़ की ग्रंथियों ने मेरे खिलाफ किसी अदृश्य जंग का ऐलान कर दिया था।
"कुछ खास बात नहीं थी बस तुम्हारा नोट्स चाहिए था।दरअसल मैं बीच में कुछ दिन कोचिंग नहीं आ पाई थी न इसीलिए।"
चाँदनी ने मुस्कुराते हुए कहा।
"ओके ये लो!"
कहने के साथ ही मैंने अपना नोट्स उसकी तरफ बढ़ा दिया।
"थैंक्स!ओके कल मिलते हैं बाय!"
कहने के साथ अपनी साईकिल पर बैठकर वो आगे चली गई तभी ऊँकार भी आ गया।
"कहाँ रह गए थे?"
मैंने ऊँकार का थोड़ा अस्त-व्यस्त हूलिया देखकर पूछा।
"कहीं नही चल घर चलते हैं।"
ऊँकार के कहने पर मैं भी कँधे उचकाते हुए घर की ओर चल पड़ा तभी पीछे से आनंद और उसके दोनों चमचे निकले जिनका हूलिया तो ऊँकार से भी ज्यादा खराब लग रहा था।
"तूने उसे पीटा न?"
आनंद के नाक से बह रहे खून को देखकर मैंनें ऊँकार से पूछा पर उसने कंधे उचका दिये और फिर मैं मुस्कुराते हुए उसके साथ-साथ चल पड़ा।मुझे मालूम था कि उसने ही आनंद और उसके दोनों चमचों सूरज और चन्दन को पीटा था क्योंकि इसकी दो वजह थीं।पहली ये कि ऊँकार मुझे बहुत प्यार करता था और मुझे कोई बुरा-भला कहे ये उससे बर्दाश्त नहीं होता था और दूसरी वजह यही थी कि हम दोनो बचपन से ही आनंद और उसके चमचों से नफरत करते थे।
हमारे घर भी आस-पास ही थे और चूंकि आनंद के डैड सोसाइटी के सबसे बड़े और रईस आदमी थे इसलिए आनंद हमेशा पैसों के घमंड पर जीता था।
हम सब एक ही स्कूल में पढ़ते थे और सबको पता था कि मैऔ और ऊंकार उन्हें जरा भी पसंद नहीं करते थे।पर यह पूरा सच नहीं था दरसल मर्यम दोनों सिर्फ उसे नापसंद नहीं करते थे बल्कि उससे नफरत करते थे और इसकी वजह उसकी हरकतें थीं।
खैर कोचिंग पढ़ने के बाद ऊँकार और मैं मैच खेलने के लिए ग्राउंड में गये पर वहां पहले ही उसने सबको अच्छी-अच्छी चीजें और वीडियो गेम्स देने का लालच देकर अफनी तरफ कर लिया था और इसीलिए सबने हमारे साथ खेलने से इंकार कर दिया।यह सब देखकर ऊँकार एकबार फिर भड़क गया और उन सबको पीटने के लिए दौड़ पड़ा लेकिन मैंनें किसी तरह उसे समझा-बुझाकर शांत किया और हम वापस घर आकार होमवर्क करने लगे बहरहाल हमारे हिसाब से यह दुनिया का सबसे बोरिंग और मूर्खतापूर्ण काम था।
"यार जब ट.... ट..... टीचर्स को इतना सारा ह.... ह... होमवर्क देना होता है तो हम स्कूल क्यों जाते हैं?"
मैथ्स का एक एक्सरसाइज खत्म करने के बाद मैंनें अपनी उँगलियों को चटकाते हुए पूछा।
"शायद होमवर्क्स लेने!"
उसने मजाक उडा़ते हुए कहा और उसकी बात सुनकर मैं जोरों से हँस पड़ा।और मुझे कहीं पढ़ी हुई एक बात याद आई कि दो अच्छे दोस्त वो नहीं होते जो एक ही चीज को पसंद करते हों बल्कि वो होते हैं जो एक ही चीज से नफरत करते हों।
अगले दिन मैं और ऊँकार आपस में मस्ती मजाक करते हुए कोचिंग की ओर बढ़ रहे थे कि उसने अचानक चाँदनी का जिक्र छेड़ दिया और मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी सी होने लगी।
"यार पांडेय तुझे पता है कि हमारे कोचिंग में सौ से भी ज्यादा लड़के-लड़कियाँ पढ़ते हैं।"
"हाँ।"
मैंनें उसकी बात का सीधा सा जवाब दिया।
"फिर भी उसने तुझसे ही काॅपी माँगी!"
ऊँकार ने गहरी निगाहों से देखते हुए मुझसे सवाल किया।
"हाँ तो?"
मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा क्योंकि मुझे पता था कि अब वो क्या कहने वाला था क्योंकि पिछली पूरी रात मैं इसी के बारे में सोंचते हुए जागा रहा था।
"यार मुझे लगता है कि वो भी तुझे पसंद करती है कम से कम एक बार उससे बात करने की कोशिश तो कर।"
"हुम्म्!"
मैंनें सिर्फ सिर हिला दिया जिससे वो थोड़ा सा चिढ़ गया लेकिन मैं जानता था कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि वो मेरे बिना एक पल भी नहीं रह सकता था।
"ह..... हकले तू आ गया देख ले कोई तेरा इंतज़ार तो नहीं कर रहा।"
आनंद ने उसे देखते ही तंज कसा जबकि उसके पीछे खडे़ वनमानुष जैसे आकार के चमचे सूरज और चंदन खी-खी करके हँसने लगे।
"कल की सूजन तेरे चेहरे पर अभी भी दिख रही मोटे गैंडे कहीं तू दोबारा अपनी नाक तो नहीं तुड़वाना चाहता है।"
अपनी उँगलियाँ चटकाते हुए ऊँकार एक बार फिर आनंद की ओर बढा़ पर मैंनें उसे रोक लिया।
"ज.... ज.... जाने दे इसे।"
मैंनें उसे कोचिंग क्लास के अंदर खींचते हुए कहा।
"ले जा ले जा हकले वरना आज इसका कचूमर बन जायेगा।"
आनंद ने उसे चिढ़ाते हुए कहा जबकि मैं ऊँकार को रोक रहा था ताकि वह उसपर छलांग न लगा दे।
"तूने मुझे क्यों पकड़ा आज तो मैं उस मोटे गैंडे और उसके चमचों कर भर्ता निकाल देता।"
ऊँकार ने गुर्राकर कहा।
"ज.... जाने दे।"
मैंने उसे समझाकर शांत किया और फिर चारों तरफ देखने के बाद मेरी नजरें चाँदनी पर ठहर गईं।वो भी मेरी तरफ देखकर हाथ हिला रही थी जबकि बाकी लड़के और लड़कियां मुझे घूरे जा रहे थे।
"ये लो अपनी काॅपी और तुम्हारे दोस्त को क्या हुआ?"
उसने मेरी तरफ काॅपी बढा़ते हुए पूछा पर मेरा ध्यान कहीं और ही था।पीले टी शर्ट और काली जींस पहने हुए वो सचमुच काफी खूबसूरत लग रही थी और उसका चेहरा उसके नाम के मुताबिक दमक रहा था।
उसकी खूबसूरती देखकर मेरा मुँह खुला का खुला रह गया था।
"क्या हुआ?"
उसने दोबारा थोड़ी तेज आवाज में कहा और मैं अपने यादों के सागर से फौरन बाहर आ गया।
"अर... क...... क.... क.... कुछ नहीं।"
उसके हाथ से काॅपी लेकर झेंपते हुए मैं अपनी बेंच पर बैठ गया।
मैंनें ऊँकार की ओर देखा और ये देखकर एकधम से हैरान रह गया कि थोड़ी देर पहले गुस्से में आग बबूला हो रहा लड़का अचानक से मुस्कुरा रहा था।
"तुम्हें क्या ह.... ह..... ह.... हुआ?"
मैंनें चिढ़ कर उसे पूछा जबकि उसने कुछ नहीं वाले अंदाज में सिर हिलाया।फिर इसके बाद कविता मैम आ गई और पढा़ने लगीं।
इस पूरे दौरान मैं पढाई़ पर ध्यान लगाए रखना चाहता था पर मेरा ध्यान बार-बार चाँदनी की ओर चला जा रहा था।
"भाई मेरी बात मान उसे बोल दे कि तू उसे पसंद करता है वरना कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाये।
" अच्छा!"
मैंनें ऊँकार की बात काटकर अपना ध्यान अपनी बुक पर लगाने की कोशिश करने लगा जिसका एक पैराग्राफ कविता मैम पढ़ रही थी।
"मनीष!"
अचानक कविता मैम ने मेरा नाम पुकारा और मेरा ध्यान फौरन उनकी ओर गया पर मैं जरा सा हड़बड़ा गया और इसी चक्कर में मेरा हाथ लग कर मेरी बुक्स और काॅपी गिर गई।
"स..... स.... स.......साॅरी!"
मैंनें बुक्स और कापियां उठाकर सामने बेंच पर रख दीं और इसके बाद थूक घूँटते हुए मैंनें अपना चेहरा कविता मैम की ओर मोड़ा।
"आगे का पैराग्राफ अब तुम पढो़!"
कविता मैम ने मुझसे पैराग्राफ पढ़ने को कहा और ये सुनकर मैं हक्का-बक्का रह गया जबकि मुझे ये देखकर आश्चर्य हो रहा था कि सारी क्लास मुझे ही घूर रही थी और मैं चाहता था कि काश वो सब ऐसे करना बंद कर दें।
"म..... म..... म.... मैं नहीं पढ.... सकता।"
मैंनें हमेशा की तरह अटकते हुए जुबान में कहा और कई लड़के-लड़कियाँ हँसने लगे।
"क्यों इंग्लिश नहीं आती क्या?"
मैम ने गुस्से में कहा और मैं चुपचाप जमीन को घूरने लगा।
"आगे मैं पढ़ती हूँ मैम!"
चाँदनी ने कहा और पढ़ने के लिए अपनी बुक उठाकर वह खडी़ हो गई।
"नहीं तुम बैठ जाओ!"
कविता मैम ने उसे डाँट कर बैठा दिया जिसका मुझे बहुत बुरा लगा।
"हाँ तुम पढो़!"
उन्होंने मुझसे आगे पढ़ने को कहा और न चाहते हुए भी मैं पढ़ने लगा।
"अरे रहने दीजिए मैम इस हकले से नहीं होगा।"
आनंद ने मेरी हँसी उड़ाने के लिए कहा और अपने चमचों के साथ खी-खी करके हँसने लगा।
"चुप रहो आनंद।"
मैम ने उसे डाँट कर चुप कर दिया मगर वह फिर भी हँसता रहा।
"तुम पढो़!"
कविता मैम ने अपनी आवाज तेज करते हुए कहा।
"अ.... आई नेवर इट म.... मोर दैन व...... व..... वन थ..... थ.... थ.... थिंग... मैं नहीं क.... क.... क.... कर सक... ता मैम।"
बोलने के साथ चुपचाप कपनी कापियां और बुक्स बैग में रखते हुए मैं क्लास से बाहर निकल गया
कविता मैम भी मुझे आवाज लगाती हुई मेरे पीछे आ गईं।
"मनीष!मनीष बेटा रुक जाओ।"
उन्होंने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा और आखिरकार मैं रुक गया पर मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे और ये देखकर कविता मैम को भी बहुत बुरा लगा क्योंकि वो मुझे बहुत मानती थीं।
"बेटा कमी हर किसी में होती है कोई भी परफेक्ट नहीं होता अगर ऐसा हो जाता तो हम इंसान भगवान न बन जाते।"
उन्होंने मुझे समझाने की कोशिश की लेकिन मैं चुपचाप खड़ा रहा।
"तुम बस थोड़ी मेहनत करो और देखो कितनी आसानी से तुम्हारी ये कमी दूर हो जाती है।"
उन्होंने प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।बहरहाल इसके बाद भी उन्होंने मुझे काफ़ी देर तक बहुत कुछ समझाया बुझाया और अंततः मैं वापस क्लास में आ गया लेकिन मैंनें तय कर लिया था कि अब से चाँदनी की ओर नहीं देखूंगा और फिर चुपचाप मैं जाकर ऊँकार के पास बैठ गया जिसकी नसें गुस्से में फड़क रही थीं।
मुझे पता था कि वो आनंद को पीटना चाहता था पर मैं नहीं चाहता था कि वो अपने लिए कोई मुसीबत खड़ी करे।
"मनीष!"
अचानक पीछे से किसी ने मुझे आवाज दिया और मैं पीछे मुड़कर देखने लगा और जैसा कि मैंनें आवाज़ से अंदाजा लगा लिया था।मुझे बुलाती हुई चाँदनी कोचिंग क्लास से निकल रही थी।
"चल!"
मैंनें ऊँकार को चलने के लिए कहा और आगे बढ़ गया मगर फिर पलट कर देखा तो पाया कि वो साथ नहीं आ रहा था और इसीलिये मुझे भी रुकना पड़ा।लेकिन मैं गुस्से और बेबसी से भरा उसे सिर्फ घूरने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता था।
"मनीष!आज तुम्हें क्या हो गया तुम मेरी बात क्यों नहीं सुन रहे।"
चाँदनी ने सहज भाव से पूछा।
"क्योंकि म.... म..... मैं अपनी और बेइज्जती नहीं करवाना चाहता।"
मैंनें गुस्से में उसे दो टूक जवाब दिया और तभी मेरी नजर उस मोटे आनंद पर पड़ी जो थोड़ी दूर खड़ा हमें घूर रहा था।
"मैं तो बस काॅपी लेने आई थी।"
बोलने के साथ ही अपनी गीली आँखें पोंछते हुए वो मुझसे दूर चली गई और मैं वहाँ खड़ा खुद को ठगा हुआ सा महसूस करने लगा।मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक मुझे हो क्या गया था क्योंकि इससे पहले मैं कभी इतना गुस्सा नहीं हुआ था।
पर आज अचानक मुझे क्या हो गया ये मैं समझ नहीं पा रहा था।
"ये तूने गलत किया भला दूसरों का गुस्सा तू उसपे कैसे निकाल सकता है।"
बोलने के साथ ही गुस्से में पैर पटकते हुए मेरा बेस्ट फ्रैंड ऊँकार भी मुझसे दूर चला गया।
घर पहुंच कर मैंनें बार-बार इस बारे में सोंचा और लर बार मैं खुद को पहले से भी ज्यादा शर्मिंदा महसूस कर रहा था।
अगले दिन ऊँकार के साथ कोचिंग जाते वक्त मैं बार-बार यही सोंच रहा था कि आज उससे साॅरी कह दूंगा और अपने दिल की बात भी चाहे उसका अंजाम जो भी हो।
बहरहाल इस वक्त हम दोनों बेहद खामोशी से आगे बढ़ रहे थे जैसा कि आमतौर पर कभी नहीं होता था।हम दोनों अपना ज्यादातर वक्त एक दूसरे के साथ बिताते थे और हर वक्त बातें करते थे जिनका हमारी पढा़ई लिखाई से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं होता।
हम अक्सर ऊल-जलूल और अजीब चीजों के बारे में सोंचते और बातें करते थे।पर आज वह बिल्कुल शांत था और आनंद के तानों से या चाँदनी के रूठ जाने से भी ज्यादा बुरा मुझे इस बात का लग रहा था।
"मैं आज उससे साॅरी कह दूँगा।"
आखिरकार कुछ बातचीत शुरू करने के इरादे से मैंनें कहा लेकिन उसने बस हुम्म् करके सिर हिला दिया और सिर नीचे करके चलता रहा जैसे रोड पर पड़ी गिट्टयों को गिन रहा हो।
"और मैं आज उसे अपने दिल की बात भी बता दूँगा।"
मैंनें शांत स्वर में कहा और फौरन ऊँकार की नजरें मुझपर आ टिकीं जैसे वह मेरा एक्सरे कर रहा हो।इसके बाद उसने दो-तीन बार कुछ कहने के लिए मुँह खोला और फिर बिना कुछ कहे बंद कर लिया।
मुझे मालूम था कि उसके अंदर भयंकर उथल-पुथल मच रही होगी इस समय।एक तरफ तो मुझसे नाराजगी के कारण वह मुझसे बात भी नहीं करना चाहता था तो वहीं दूसरी तरफ इस बारे में बात किये बिना वह रह भी नहीं पा रहा था।
"सच कह रहा है?"
उसने मेरी ओर देखकर ऐसे पूछा जैसे वह लाई डिटेक्टर पर मेरा टेस्ट ले रहा हो।
"हुम्म्!"
मैंनें उड़ते अंदाज में कहा।
"ये हुई न मर्दों वाली बात तू बोल दे जो होगा हम देख लेंगे।"
"हुम्म्!"
खैर इसके बाद हम इसी विषय पर बातचीत करते हुए आगे बढ़ते रहे और थोड़ी ही देर में हम कविता मैम के घर पहुंच गये।क्लास में जाने के बाद मैंनें चारों और उसे बहुत खोजा पर वो नहीं मिली और इस बात से मैं हैरान था क्योंकि वो हमेशा वक्त से पहले कोचिंग पहुंच जाती थी पर फिर आज न जाने क्या हो गया था।
खैर मैं अपनी बेंच पर जाकर बैठ गया और उसके आने का इंतजार करने लगा जबकि आनंद और उसके चमचे किसी लड़की को तंग कर रहे थे।
"आ गई।"
अचानक ऊँकार ने मेरा कंधा थपथपाया और दरवाजे की ओर इशारा किया।लाल और नीले रंग की फ्राक और काली लैगी पर हील वाली सैंडिल कुल मिलाकर आज वो किसी खूबसूरत एक्ट्रेस से भी ज्यादा अच्छी लग रही थी।उसे देखते ही मैंनें उसकी ओर हाथ हिलाकर इशारा किया लेकिन आज वो मेरे इस व्यवहार से पहले तो थोड़ा हैरान रह गई लेकिन फिर एकदम से पलट कर सीधे देखने लगी और जाकर अपनी बेंच पर बैठ गई।
इधर मैं समझ गया कि वो मेरे कल के बर्ताव से अभी भी नाराज थी और यह सही भी था।बहरहाल इसके लिए मैं भी बेहद शर्मिंदा था और उससे मामी माँगना चाहता था।
खैर मुझे लगा कि इसका सही समय शायद कोचिंग छूटने के बाद ही होगा।और इसीलिए कोचिंग में पूरे समय मैं कई बार उसकी ओर देखता रहा।एकाध बार उसकी नजर भी मुझपर पड़ी पर उसने मुझसे नजरें फेर लिया और मैं मुस्कुराने लगा।
"कोचिंग से छूटते ही उसे प्रपोज कर देना।"
ऊँकार ने चौथी बार मुझे याद दिलाया जैसे कि मुझे अल्जाइमर हो।
"मैं जानता हूँ।"
मैंनें खीझते हुए जवाब दिया।
कहने को तो मैंनें जोश में आकर कह तो दिया था लेकिन कोचिंग खत्म होने तक तो मेरे पसीने छूटने लगे।मेरे दिल की धड़कनें ऐसी तेज हो गईं जैसे मैं कोई ब्लडप्रेशर का पेशेंट हूँ।
इसके बाद कोचिंग छूटते ही मैं तेजी से बाहर निकल गया और मेरे पीछे ऊँकार भी निकल आया।हम दोनों बाहर थोड़ी दूर पर चाँदनी के आने का इंतजार करने लगे।
"जा न!"
चाँदनी के बाहर निकलते ही वो मुझे धक्का देकर उसके पास भेजने लगा।
"धक्का क्यों दे रहा है बे जा रहा हूँ न!"
मैंनें उसे घूरते हुए कहा जबकि कनखियों से मैं चाँदनी को देख रहा था और मैंनें पाया कि वो भी मुझे देख रही थी।
न जाने क्यों पर उसके करीब जाते हुए मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था।
"च... च.... च.... चाँदनी!"
मैंनें अटकती हुई आवाज़ में उसे पुकारा हालांकि मुझे शर्म आ रही थी पर मैं उसके सामने यह जाहिर नहीं करना चाहता था।
"हाँ क्या है?"
उसने सपाट लहजे में जवाब दिया।
"अर.. काॅपी!तुम्हें काॅपी चाहिए थी न!ये लो।"
मैं घबरा गया और अनजाने में उसकी ओर अपनी काॅपी बढ़ा दी।बहरहाल वह एकटक मुझे घूर रही थी जैसे मेरा एक्स-रे कर रही हो लेकिन मैं चाहता था कि काश वो ऐसे न करे।
"हुम्म्!बस?"
उसने काॅपी पकड़ते हुए पूछा जबकि मेरी गर्दन जल्दी से न में हिलने लगी।
"ओह तो रास्ते से हटो भी!"
उसने आगे बढ़कर कहा जबकि मैं नहीं रुका रहा।
"अर... कल.. कल के लिए साॅरी मैं जानता हूं कि कल मैंनें ज्यादा रियेक्ट कर दिया था।"
मैंनें मासूम सा चेहरा बनाते हुए कहा जैसे कोई छोटा बच्चा मिठाई चुराते हुए पकड़े जाने पर करता है।
"हुम्म्!कोई बात नहीं।"
उसने काफी सोंच समझ कर जवाब दिया और अब वह हल्का फुल्का पहले जैसी नजर आने लगी।
मुझे यकीन था कि अब वो कहने का समय आ चुका था जिसके लिए मैं न जाने कबसे इंतजार कर रहा था।
"अर.... चाँदनी वो म.... म.... मैं त.... तुमसे कहना...."
अभी मेरी बात शुरू भी नहीं हुई थी कि वही हुआ जिसका मुझे डर था।हमारे बातचीत के बीच में वह मोटा आनंद और उसके चमचे आ गए।
"क्या कर रहा है हकले प्रपोज कर रहा है इसे क्या?"
उसने मुझे चिढ़ाने के कहा और अपने चमचों के साथ खी-खी करके हँसने लगा।
"अरे हकले तुझसे ये तो क्या कोई और लड़की भी नहीं पटेगी जब तक की वो कोई अँधी या पागल न हो।"
उसने फिर व्यंग्य किया जबकि ऊँकार उसे मारने के लिए आगे बढ़ा पर मैंने उसे इशारे से मना कर दिया।
"उससे इस तरह बात मत कर मोटे शुअर के कहीं के।"
अचानक चाँदनी ने जोरदार आवाज़ में उउसे फटकारा और मैंं कृतज्ञता और आश्चर्य से उसे घूरने लगा और यही हाल ऊँकार का भी था जबकि आनंद के माथे की नसें गुस्से में फूल और पिचक रही थीं और उसका चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वह उसे मुक्का मारना चाहता था।
"ओहो।मैं फिर भी कह रहा हूँ हकले तुझे ये तो क्या कोई भी लड़की पसंद नहीं करेगी।"
आनंद ने दोबारा मुझ पर तंज कसा।
"चुप रहो मोटे बंदर कहीं के ये फैसला तुम नहीं करोगे कि उसे कौन पसंद करेगा और कौन नहीं करेगा।और जहाँ तक मेरी बात है तो सुन मोटे गैंडे मैं उसे पसंद करती हूँ कई दिनों से।"
आखिरकार गुस्से में चाँदनी ने वह बात कह ही दी जो मैं खुद उससे कहना चाहता था।अचानक उसके मुँह से ये बात सुनकर मैं बुरी तरह हैरान रह गया था और ऐसा लग रहा था जैसे मैंने कुछ गलत सुन लिया हो या फिर शायद उसने यह बात मजाक में कही हो। खैर चाँदनी का चेहरा देखकर ऐसा नहीं लग रहा था कि उसने कोई मजाक किया हो बहरहाल मैं और ऊँकार ही नहीं आनंद और उसके चमचे भी उसे घूर रहे थे।
"क्या ये सच है?"
मैंनें चाँदनी से पूछा।
"हाँ!"
उसने शर्माते हुए जवाब दिया और मैं समझ गया कि मैंनें कुछ गलत नहीं सुना था और न ही मेरे कान बज रहे थे।
"ओके कल मिलते हैं!"
बहरहाल इसके बाद वो उन तीनों को खा जाने वाली निगाहों से घूरती हुई अपने रास्ते पर चल पड़ी और मैं वहीं का वहीं खड़ा रह गया और उसको हाथ हिलाकर बाय करके जाता हुआ देखने लगा जबकि ऊँकार मेरी पीठ थपथपा रहा था और हम बहुत खुश नजर आ रहे थे।
खैर शाम को मैं एक छोटे से कैंटीन में बैठकर सामने लगी मिरर में दिख रहे शख्स को देख रहा था।
बढ़िया रंगीन और स्टाइलिश टी-शर्ट, हल्की नीली चुस्त जींस और बेहद नये और चमकदार जूते पहने और हाथ में मोबाइल लिए हुए वह शख्स और कोई नहीं मैं ही था।पर मैं अलग लग रहा था और आज मेरे बाल कोचिंग की तरह चिपके हुए तेल चुपडे़ न होकर सूखे और हल्के बिखरे हुए थे जिन्हें हेयर जेल लगाकर मैंनें घंटों की मेहनत से सँवारा था।और सच कहूँ तो मैं यही था इंग्लिश की कोचिंग में जो मैं जाता था वो मैं इस वक्त मिरर में दिख रहे मैं से बहुत अलग था।
लेकिन मिरर में दिख रहा मैं ही सच था।
"आ गए कमीनों कहाँ मर गए थे?"
मैंनें साफ-सुथरी और बिना अटकती आवाज में गाली देकर अपने दोस्तों को पुकारा और सामने पडी़ चेयर्स पर बैठने कहा।
हाँ मैं हकला नहीं था।
मेरे कहने के बाद वो चारों मेरे सामने बैठ गये ऊँकार आनंद सूरज और चंदन।
"साले तूने तो वादा निभा दिया आखिर पार्टी दे रहा है!"
आनंद ने मेरे कंधे थपथपाते हुए कहा जैसे हम बचपन के जिगरी दोस्त हों।
और एक बार फिर से मुझे कहना पड़ेगा कि यह सच था।
हम चारों बचपन के पक्के दोस्त थे एक ही स्कूल में पढ़े और एक ही मिट्टी में खेले कूदे।
"पार्टी क्यों न देता साले तुम लोगों की वजह से ही तो आज मेरा काम बना है।"
मैंनें सूरज और चंदन को टिप्पी मारते हुए कहा और सब हँस पड़े।
"लेकिन एक बात तो है मनीष वाकई तेरे प्लान को मानना पडे़गा तू साले सच में जीनियस है पक्का जीनियस।"
ऊँकार ने मेरी पीठ पर धौल जमाते हुए कहा और सब उसकी सुर में सुर मिलाने लगे।
"वाकई तेरा प्लान तो भाई माइंड ब्लोइंग था पर तुझे नहीं लगता कि प्यार पाने का ये रास्ता गलत है?"
चंदन ने अनिश्चितता में सवाल किया और मैं उसको देखकर मुस्कुराने लगा।
"प्यार को पाने के लिए हम कौन सा रास्ता चुनते हैं इससे फर्क नहीं पड़ता।बल्कि फर्क इस बात से पड़ता है कि हमारा प्यार सच्चा है या नहीं और दूसरा इस बात से कि कहीं इस रास्ते पर चलकर हम किसी का दिल तो नहीं दुखा रहे और मुझे कहना पडे़गा कि मैंने अब तक किसी का दिल नहीं दुखाया है और आगे भी मेरा ऐसा कुछ करने का इरादा नहीं है।"
इतना बोलने के बाद मैं रुक गया और उनके चेहरे पर सरसरी निगाह डालने के बाद आगे बोलने लगा।
"और रही बात प्यार की तो मैं उसे सच्चे दिल से प्यार करता हूँ उसी दिन से जिस दिन से उसे देखा था।मैं सचमुच उसे बेहद प्यार करता हूँ।"
और एक बार फिर मुझे ये कहना पडे़गा कि ये भी एकदम सच था।
"अब बोल बच्चन ही करना है कुछ आर्डर करें भूख लगी है।" सूरज के इतना कहते ही हम चारों खिलखिला कर हँस पड़े।
अगर आपका प्यार वाकई सच्चा है तो इससे फर्क नहीं पड़ता है कि आपने अपने प्यार को पाने का कौन सा रास्ता चुना लेकिन फर्क इससे पड़ता है कि कहीं आप उस रास्ते पर चलकर किसी का दिल तो नहीं दुखा रहे।

                                           Written By
                                Manish Pandey’Rudra'

©manish/pandey/23-03-2018

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