Monday, April 9, 2018

Ek Pyali Chaay

                     एक प्याली चाय

"अरे बहू मेरा चश्मा कहाँ है?"
बड़े से मकान के बाहर लाॅन में रखी गद्दीदार आरामकुर्सी पर बैठे धूप सेंकते गोपाल बाबू ने रोज की तरह जोरदार और रूखे स्वर में चिल्ला कर पूछा और फिर हमेशा की तरह बड़बड़ाने लगे।
''ये आजकल की नई जनरेशन अपने आप को पता नहीं क्या समझती है।एक हमारे बाप-दादा का वक्त था जब उनकी बहुएं उनकी सेवा करने के लिए एक टांग पर खड़ी रहती थीं और एक हमारी बहू है कि जबतक चार बार चिल्ला कर न बताओ तब तक कोई काम सुनती ही नहीं है!''
मध्यमवर्गीय परिवार के मुखिया गोपाल बाबू जो कभी टेलीफोन एक्सचेंज में नौकरी करते थे परन्तु आज पिछले दस सालों से रिटायर होकर पेंशन पर गुजर-बसर कर रहे थी।चार साल पहले पत्नी सुभद्रा देवी के गुजर जाने के बाद से न जाने क्यों पर गोपाल बाबू स्वाभाव से बेहद चिड़चिड़े हो गए थे।हमेशा खुशमिजाज और मिलनसार रहने वाले गोपाल बाबू इन दिनों हमेशा उखड़े-उखडे़ ए रहते थे और वक्त के साथ-साथ और भी तुनकमिजा़ज हो चले थे।
अभी वे बड़बड़ाने में लगे ही थे उनकी बहू चाय की ट्रे के साथ न्यूज़ पेपर और उनका चश्मा लेकर आई।
और सबकुछ आरामकुर्सी पर बैठे गोपाल बाबू के सामने मेज पर रखने के बाद उसने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिये।स्वाभाव के साथ-साथ घरेलु कामकाज में भी गोपाल बाबू की बहू का कोई जोड़ नहीं था।और अपनी सास के गुजर जाने के बाद उसने घर का बोझ अपने कंधों पर ले लिया जिसे आज तक वह बखूबी निभाती चली आ रही थी।
"बस!बस!खुश रहो!"
गोपाल बाबू ने दबी हुई मुस्कान के साथ कहा और साथ ही गौर वर्ण के हल्के झुर्रियों वाले उनके चेहरे पर सजी मोटी-मोटी भूरी मूँछें गरिमापूर्ण अंदाज़ में फड़कने लगीं।
"बाबूजी आप चश्मा स्नानघर में ही भूल आये थे!"
उनकी बहू ने मुस्कराते हुए कहा और फिर अंदर चली गई।
''भूल गया था!और जैसे कि ये याद दिलाने की जरूरत थी इस नई जनरेशन के बच्चों को तो बस बुजुर्गों का अपमान करने का जरा सा मौका भर मिल जाये और जरा सा भी नहीं चूकते हैं।''
उन्होंने एकबार फिर बड़बड़ाना शुरू कर दिया और फिर चश्मा आँखों पर चढ़ाने के बाद न्यूज़ पेपर पढ़ने लगे।
''ये लो फिर वही ट्रंप और किम जोंग की खबर जैसे मेरा घर उन्हीं की वजह से चलता है!इन बेवकूफ़ अखबार वालों की बुद्धि को न जाने आजकल क्या हो गया है।''
खुशबूदार चाय की हल्की चुस्की लेकर उन्हेंने पन्ना पलट दिया और अगले पन्ने की खबर पढ़ने लगे।
और तभी उनकी नजर एक ऐसी खबर पर पड़ी जिससे उनको बड़बड़ाने का एक और मुद्दा मिल गया।
"ये क्या खबर छपी है... गत रात्रि डालीगंज निवासी मायाराम चौधरी उर्फ ननकू जी को उनके ही बहू-बेटे ने घर से बाहर निकाल दिया।"
खबर पढ़ने के बाद उन्होंने सिर हिलाया और एक बार फिर लोगों को कोसने लगे।
"भगवान का शुक्र है कि मैं अभी पेंशन पर हूँ वरना क्या पता मेरे बेटे और बहू भी मुझे घर से बाहर निकाल देते।क्या हो गया है इस दुनिया को सब अपने-अपने बारे में ही सोंचते हैं दूसरों के साथ क्या होता है इसकी किसी को परवाह ही नहीं है।"
अभी गोपाल बाबू लोगों को कोसने में व्यस्त थे कि तभी अंदर मुख्य दरवाजे पर किसी दस्तक दी और आवाज सुनकर थोड़ी देर बाद गोपाल बाबू की बहू ने दरवाजा खोला।जबकि भीतर बैठे गोपाल बाबू ने अंदाजा लगा लिया था कि दरवाजे पर कौन होगा और उनके पड़ोसी बंशीधर बाबू कि आवाज ने उनके कयास की पुष्टि कर दी।
"लो आ गया ये भी एक तो इसके खुद के बच्चे इसको छोड़कर विदेश में सेटल हो गए हैं पर ये है कि रोज सुबह इसी वक्त एक कप चाय पीने आ धमकता है और चाय तो ठीक है लेकिन आते ही मेरे हाथ से न्यूज़ पेपर भी छीन लेगा!"
अभी गोपाल बाबू बड़बड़ा ही रहे थे कि तभी बाल्कनी का दरवाज़ा खोलकर बूढ़े मगर रौबदार चेहरे वाले हट्टे-कट्टे बंसीधर बाबू आ धमके और आते ही पास रखी आरामकुर्सी खींच कर उसी पर पसर गए।
“और बताईये गोपाल बाबू क्या हाल-चाल हैं?”
बसींधर बाबू ने आरामकुर्सी पर कमर सीधी करते हुए पूछा।
“अजी हाल-चाल क्या पूछना एक दिन में कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा!”
गोपाल बाबू ने भड़कते हुए जवाब दिया और न्यूज़ पेपर अपने पीछे छिपाने की कोशिश करने लगे लेकिन तब तक देर हो चुकी थी।बंसीधर बाबू ने उछल कर उनके हाथ से न्यूज़ पेपर छीन लिया।
“अहा!एक प्याली गर्म चाय और ये न्यूज़ पेपर जिंदगी तो बस इसी पर टिकी है!”
उन्होंने हँसते हुए कहा जब गोपाल बाबू की बहू ने एक ट्रे में चाय की प्याली और टोस्ट उनके सामने रख दिया।
“जी चाचाजी!”
जिस तरह बंसीधर बाबू अपने बहू-बेटे के विदेश सेटल हो जाने के बाद गोपाल बाबू के बेटे और बहू को अपने बच्चों की तरह मानते थे उसी तरह गोपाल बाबू के बच्चे भी पिता की तरह उनका आदर और सम्मान करते थे हालांकि गोपाल बाबू को इससे बहुत चिढ़ होती थी कि वे रोज सुबह एक ही वक्त पर उनके यहाँ चाय पीने आ जाते थे और गोपाल बाबू को इसी बात से बहुत चिढ़ महसूस होती थी और वे हमेशा हिसाब लगाते रहते थे कि कम से कम अब तक तो हजारों कप चाय बंसीधर बाबू उनके यहाँ पी ही गये होंगे।
लेकिन जिस दिन किसी कारणवश वे नहीं आते थे उस दिन गोपाल बाबू भी पूरे समय छटपटाते रहते थे और बार-बार अपनी बहू से उनके न आने की वजह पूछते रहते थे।वैसे तो बंसीधर बाबू सरकारी बैंक के रिटायर्ड कर्मचारी थे लेकिन फिर भी उनका घर काफी बड़ा था लेकिन अपना ज्यादातर वक्त वे या तो गोपाल बाबू के साथ उनके ही घर पर बिताते थे या फिर उनके पोते के साथ खेलते हुए बिताते थे।
“पुनीत स्कूल गया है क्या?”
बसींधर बाबू ने चाय की चुस्कियां लेते हुए गोपाल बाबू की बहू से पूछा।
“जी चाचाजी!”
कहने के बाद गोपाल बाबू की बहू घर के बाकी कामकाज निपटाने भीतर चली गई और बंसीधर बाबू की नजरें न्यूज़ पेपर के पन्ने पर गड़ गईं।जबकि गोपाल बाबू उँगलियाँ चटकाते हुए चश्मे के नीचे से उन्हें घूर रहे थे जैसे सामने बैठे बंसीधर बाबू का गला दबाना चाहते हों।
“ये देखो ये ट्रंप और किम जोंग लग रहा है तृतीय विश्व युद्ध छेड़ ही देंगे।“
बंसीधर बाबू ने आफसोस जताते हुए कहा।
“हमें क्या करना है?”
गोपाल बाबू ने रूखे लहजे में कहा और कंधे उचका कर बागीचे में लगे गुलाब के पौधों को घूरने लगे जैसे उनके घूरने से गुलाब की कलियाँ खिल उठेंगी।जबकि उनकी आदत से परिचित बंसीधर बाबू हँस पड़े।
“अरे गोपाल भाई अगर विश्व युद्ध शुरू हुआ तो इससे हमारा देश भी अक्षूता नहीं रहेगा और आजकल जैसे नयी तकनीकी के हथियारों का आविष्कार हो रहा है इसे देखते हुए तो लगता है धरती का विनाश भी हो सकता है।“
बंसीधर बाबू ने तर्कपूर्ण ढंग से अपनी बात उनके सामने रखी लेकिन गोपाल बाबू को देखकर लग रहा था जैसे उन्होंने उनकी आधी बात भी नहीं सुनी होगी।
खैर बंसीधर बाबू चाय की चुस्कियों का आनंद लेते हुए हमेशा की तरह गोपाल बाबू को नई-नई खबरें पढ़कर सुनाते रहे।
“आजकल की जनरेशन का कोई भरोसा नहीं कब लात मारकर घर से बाहर निकाल दे।“
गोपाल बाबू ने एक बार फिर व्यंग्य कसते हुए कहा लेकिन उनकी बात सुनकर बंसीधर बाबू हँसने लगे जैसे उन्होंने अभी-अभी कोई मज़ेदार चुटकुला सुना हो।
“अरे गोपाल बाबू आप खुद को अभी से बूढ़ा मानने लगे अजी बूढ़े आप नहीं आपकी सोंच है लेकिन मुद्दे की बात यह है कि हम सब उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं जहाँ हम यह कह सकते हैं कि हमने अब तक सबकुछ देख लिया।जैसे-जैसे हमारी उम्र ढलती है हम अपनी सोंच को भी बूढ़ा और कमजोर बनाने लगते हैं लेकिन यह गलत है हमारी सोंच बूढ़ी नहीं होनी चाहिए।जरा़ एकबार इस नई जनरेशन को समझने की कोशिश तो कीजिए गोपाल बाबू और फिर मैं वादा करता हूँ श्रवण कुमार भी आपको यहीं दिख जयेगा और कैकयी भी।“
बंसीधर बाबू ने बेहद समझदारी भरे लहजे में उन्हें समझाने की कोशिश की।
“अरे ये सब सिर्फ कहने की बातें होती हैं इस दुनिया में तो अपना सगे-संबंधी भी सगा नहीं होता यहां अपना कहने लायक सिर्फ एक चीज है पैसा।“
गोपाल बाबू ने हमेशा की तरह चिढ़ते हुए जवाब दिया।
“अरे क्या गोपाल बाबू आपकी सोंच तो बरसों पुरानी है और बेहद अपरिपक्व।हर जगह सिर्फ पैसा ही सबकुछ नहीं होता बल्कि प्यार और रिश्तों की सबसे ज्यादा अहमियत होती है।जितना हो सके रिश्तों और रिश्तेदारों को संजो कर रखना चाहिए क्योंकि कभी-कभी पैसों के पीछे भागते-भागते हमारे हाथ से हमारी सबसे कीमती चीजें फिसल जाती है, हमारे रिश्ते और हमारे अपने।“
बोलते-बोलते अचानक बंसीधर बाबू की आँख नम हो गई और वे दूसरी ओर देखने लगे।
और अचानक उसी वक्त एक तेज धमाका हुआ और सबकुछ पल भर में हो गया।बंसीधर बाबू धमाके की आवाज सुनकर बुरी तरह चौंक उठे जबकि गोपाल बाबू अपनी छाती पर हाथ रखे जमीन पर गिरे बुरी तरह छटपटा रहे थे।
ठीक उसी वक्त गोपाल बाबू की बहू भागती हुई आई ये देखने के लिए कि आखिरकार यह आवाज कैसी थी लेकिन अपने बाबूजी को इस हालत में देखकर जड होकर वहीं खड़ी रह गई खैर वह एक बेहद समझदार महिला थी इसलिए उसने फौरन एम्बुलेंस का नम्बर डायल करके अपना पता लिखवा दिया।
और तीन-चार दिन बाद जब एक शाम को धीरे-धीरे गोपाल बाबू की आँख खुली तो उन्होंने पाया कि वे एक बेहद नर्म और आरामदेह बिस्तर पर लेटे थे लेकिन चूंकि उनकी आँखों पर चश्मा नहीं था इसलिए उन्हें सबकुछ धुँधला नजर आ रहा था तभी किसी ने उन्हें चश्मा पहना दिया और फिर धीरे-धीरे सब कुछ साफ होने के बाद उन्होंने देखा कि उनकी बहू उनके पास खड़ी थी जिसने उन्हें चश्मा पहनाया था।
चारों ओर अच्छी तरह से देखने के बाद उन्होंने पाया कि वे किसी बेहद साफ-सुथरे और मँहगे हास्पिटल के बेड पर लेटे हुए थे।उन्होंने उठने की कोशिश की मगर फौरन उनकी बहू ने उन्हें सम्हाल लिया और आराम से उन्हें बैठा दिया।
“क्या हुआ था?”
होश में आते ही उन्होंने सबसे पहला सवाल यही किया और उनकी बहू ने जवाब देने के लिए मुँह खोला लेकिन इसका जवाब उसे नहीं देना पड़ा क्योंकि ठीक उसी वक्त गोपाल बाबू की तरह दिखने वाला ठीक उन्हीं की कद-काठी और रंग-रूप वाला उनका बेटा डाक्टर के साथ कमरे में दाखिल हुआ जिसने नाक के ऊपर चश्मा चढ़ा रखा था।
“कुछ नहीं हुआ था बाबूजी बस हमारे घर के पास वाले मिश्रा जी के कार का टायर बर्स्ट हो गया था और उसकी तेज आवाज से आपको हार्ट अटैक आ गया था।”
बेहद गम्भीर और हल्के परेशान दिख रहे गोपाल बाबू के बेटे ने जवाब दिया जिसे सुनकर कुछ पल के लिए गोपाल बाबू अवाक् रह गए।
“लेकिन अब घबराने जैसी कोई बात नहीं है अब आप बिल्कुल ठीक हैं सिर्फ दो-तीन मामुली टेस्ट कराने के बाद आप घर भी जा सकते हैं!”
डाक्टर ने मुस्कराते हुए कहा और फिर कुछ देर बाद वो बाहर निकल गया।
“लेकिन इलाज के लिए पैसे कहाँ से आये?”
डाक्टर के जाते ही फौरन गोपाल बाबू ने वही सवाल किया जो इतनी देर से उन्हें परेशान कर रहा था।
“अर.. बाबूजी आपका इलाज कराने के लिए मुझे घर-बार सब बेंचना पड़ता तो मैं वो भी कर देता पर जबकि घर पहले से बैंक के पास गिरवी पड़ा था तो घर बेचकर भी हम आपका इलाज नहीं करा सकते थे और वो तो भला हो बंसीधर चाचाजी का जो उन्होंने आपके इलाज का सारा खर्च उठा लिया वरना शायद मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाता लेकिन मैं हार नहीं मानता।यहाँ तक कि बाबूजी मैं आपको बचाने के लिए अपने आप तक को बेंच देता पर आखिर तक हार नहीं मानता।”
कहने के साथ ही गोपाल बाबू का बेटा फफक-फफक कर रो पड़ा और उसी के साथ उसकी पत्नी भी रोने लगी जबकि अपने बेटे की बातें सुनकर गोपाल बाबू की आँखों से भी अश्रुधार बह निकली परन्तु यह पश्चाताप के आँसू थे जो उनकी आँखो के रास्ते से बाहर निकल रहे थे।जिस बेटे और बहू को वे आजतक कोसते आये थे और न जाने कितनी कड़वी बातें बोलते थे वही बेटा आज उनके लिए अपना जीवन और अपने जीवन का एकमात्र सहारा भी दांव पर लगाने को तैयार था।
वहीं दूसरी ओर उन्हें जिस व्यक्ति का उनके घर आकर एक प्याली चाय पीना भी अखरता था उसके बारे में तो गोपाल बाबू ने सपने में भी नहीं सोचा था कि बंसीधर बाबू एक प्याली चाय का कर्ज इस तरह चुकाएंगे।
पश्चाताप के बहते आँसूओं की धार के साथ उनके मन का हर मैल अब धुल चुका था।
बंसीधर बाबू ने उनके एक प्याली चाय का कर्ज चुका दिया था…
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                                             Written By
                                 Manish Pandey’Rudra’

©manish/pandey/09-04-2018

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