Monday, June 11, 2018

Hatyara Prem

                      हत्यारा प्रेम

सुबह से लगातार कई काॅल्स आ रहे थे पर मेरी एक बुरी आदत है कि जब तक मेरी नींद न पूरी हो जाये मैं फोन को हाथ भी नहीं  लगाता बहरहाल आखिरकार मैंने काॅल पिक कर ही लिया।
"हैलो!"
मैंनें बिना काॅलर का नाम देखे उनींदी आवाज में जवाब दिया और उधर से एक खरखराती सी आवाज़ उभरी जिसने मेरे रोम-रोम में बिजली भर दी और मैं उछल कर बेड पे बैठ गया।
"र.... रूद्र!"
वो पापा की आवाज थी इसीलिए मैं इतनी बुरी तरह से हलकान था क्योंकि आमतौर पर पापा की आवाज में जो रौब का पुट होता था वो इस वक्त नदारद था बल्कि उनकी आवाज़ में एक कसक महसूस किया मैंने।
"पापा... क्या हुआ पापा?सब ठीक तो है न वहाँ!"
मैंनें घबराहट भरे स्वर में पापा से पूछा हालांकि दूसरी ओर से बस खामोशी सुनाई दे रही थी जो दहशत से भरी थी।
और अचानक धम्म से किसी के गिरने की आवाज़ आई और दूसरी तरफ शोरगुल होने लगा।
"हैलो!होलो पापा... पापा!"
मैं फोन पर चीखता रहा पर पापा जवाब नहीं दे रहे थे और यह मेरे लिए चिंता का विषय था क्योंकि तेईस साल जिस इंसान के पास रहकर पला बडा़ हुआ हूँ ये  सब उसकी आदत में नहीं था।
"बेटा जल्दी से घर आजा!"
अचानक शोर-शराबे में फोन पर ताऊजी की आवाज उभरी और फिर फोन कट गया।
"किर्र... किर्र... किर्र... "
मैं हैलो-हैलो चीखता रहा पर उस ओर सिर्फ खामोशी थी।ऐसा लग रहा था जैसे मैं कुछ पलों के लिए जड़ हो गया था खैर तभी मेरे भीतर की चेतना जागी और मैंने मोबाईल बिस्तर पर फेंका और वाॅशरूम की ओर दौड़ पडा़ मुश्किल से पाँच या सात मिनट लगे होंगे और मैं नहाकर-फ्रेश होकर तैयार था झट से मैंनें खूंटी पे टंगी शर्ट-पैंट उठाई और पहनने लगा।
बदन पे कपडा़ डालने के फौरन बाद मैंनें फुर्ती से पर्स और फोन जेब में किया और रूम की चाभी लेकर दरवाजे की ओर बढ़ गया।
आनन-फानन में दरवाज़ा लाॅक करके सड़क की ओर दौड़ पडा़ अच्छी बात ये थी कि रेलवे स्टेशन मेरे रूम के पीछे ही था बस थोड़ी दूरी पर और बुरी बात ये थी कि घर की ओर जाने वाली ट्रेन पटरी पर खड़ी थी चलने को तैयार खैर मैं वक्त पर पहुंच गया और चूंकि अगली ट्रेन छह घंटे बाद की थी इसलिए आवा देखा न ताव और झट से ट्रेन पर चढ़ गया।
और इसी तरह शुरू हुआ लखनऊ टू बलरामपुर का मेरा छोटा सा सफर।मैंनें अगले स्टेशन पर उतर के एक बिश्लेरी और टिकट ले लिया और वापस अपने कम्पार्टमेंट में आ गया जो कि लगभग खाली था।
आखिर क्या हुआ था ऐसा जिसने मेरे पापा को इतना परेशान कर दिया था ये सोच-सोचकर मेरा दिल बैठा जा रहा था और जाने कैसे-कैसे ख्याल दिल में आ रहे थे।
खैर करीब सवा घंटे के सफर के बाद मैं अपने घर के सामने खड़ा था।रिक्शेवाले को पैसे देकर वापस मुड़ने पर पाया कि घर का दरवाज़ा खुला हुआ था और बाहर काफी भीड़ थी ज्यादातर लोग गली-मुहल्ले के ही थे।
पास ही एक पुलिस वैन भी मौजूद थी जिसकी बोनट पर क्लिपबोर्ड रखकर एक पुलिसकर्मी कुछ नोट कर रहा था और पेजर पर किसी से आदेश ले रहा था।
"जल्दी से थाने पर रिपोर्ट करो!ओवर एंड आऊट किर्र.... "
ये सब देखकर मेरा दिल और भी डूबा जा रहा था ऐसा लग रहा था जैसे मेरे पैरो में किसी ने भारी पत्थर बाँध दिये हों।
तिवारी और मिश्रा अंकल पहले भी आज कुछ अजीब बर्ताव कर रहे थे।पहले मुझे देखकर वे हमेशा मुस्कुराते थे पर आज उनके चेहरों की वो मुस्कान वहाँ मौजूद नहीं थी जाने क्या पहाड़ टूट पड़ा था।
पहाड़ ही टूटा था...
मेरे दिल पर,
मैं अंदर जा रहा था और किसी ने मुझे नहीं रोका यहाँ तक की मझली बुआ ने भी इस बार नहीं कहा..
"अरे बिट्टू तू कब आया और सफर कैसा था तेरा!"
उनकी आँखें तो बुरी तरह पथराई मालूम हो रही थीं और मुझे देखते ही उनमें से झरना फूट गया।
रोते हुए उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया इतनी तेज कि मेरी साँसें फूलने लगीं वो तो भला हो फूफाजी का जिन्होंने आगे बढ़कर मेरी जान बचाई पर क्या मेरी जान बची थी... सचमुच?
आगे बढ़ने पर मैंने पाया पापा सोफे पर निढा़ल होकर पडे़ थे और घर की औरतें आँगन में बैठी हुई थीं जमीन पर माँ देखती तो सचमुच बहुत नाराज होती उसे साफ-सफाई बहुत पसंद थी न लेकिन माँ भी उन्हीं के साथ बैठी हुई थी क्यों ये मेरी समझ में नहीं आया पर अचानक मुझे देखते ही वो फूट-फूटकर रोने लगी।
मेरे सब्र का बाँध टूट रहा था कुछ ऐसा था जो नश्तर की भांति मेरे दिल में चुभ रहा था।और तभी मेरे दिमाग़ में छोटू का ख्याल आया तीन साल छोटा था मुझसे पर गुस्से में मुझसे भी चार कदम आगे मेरी जान बसती थी छोटू में।उससे दूर रहकर बीटेक की पढ़ाई मैं कैसे कर पा रहा था यह बस मेरा दिल ही जानता था।मैं जब भी घर लौटता था तो झट से आकर चिपक जाता था मुझसे और अपने काॅलेज और यार दोस्तों का जिक्र छेड़ दिया करता था।
"भाई तुझे पता है काॅलेज में नयी टीचर आई है यार कसम से क्या लगती हैं।"
और तब तक बकवास बंद नहीं करता जब तक कि मम्मी आकर उसके कान नहीं उमेठती थीं।
"बस कर आते ही शुरू हो गया अब जरा भाई को हाथ पैर तो सीधे कर लेने दे।"
और तपाक से वो जवाब देता।
"हाथ पैर मेरे मरने के बाद सीधे कर लेना अभी तो बात सुन मेरी!"
ये सुनकर मम्मी उसे मारने के लिए दौड़ पड़ती और
और वो पूरे कमरे में उछल-कूद करते हुए बचने की कोशिश करता।
लेकिन आज वो दौड़ कर मेरे पास नहीं आया न ही उसने मुझे सीने से लगाया और तब पहली बार मुझे एहसास हुआ कि दिल का दर्द क्या होता है।
अचानक तेज हवा का झोंका आया और आँगन में रखी उस बेजान चीज पर पड़ी सफेद चादर थोड़ी सी हट गई।
वो बेजान चीज जिस्म था मेरे जान से प्यारे छोटे भाई का मेरे छोटे का जो जमीन पर सफेद चादर से लिपटा हुआ पडा़ था।
धम्म् से मैं जमीन पर गिर पड़ा और हवा में मेरी ओर कई हाथ मुझे थामने के लिए उठ गए पर उनमे वो दो नन्ही बाहें कहीं नही दिख रही थीं जो बचपन में दिन भर मेरे गले से चिपकी रहती थीं।
वो बाहें अब बेजान उस आँगन में पड़ी थीं जिसमे एक बड़ा सा घाव था पंजे के ठीक ऊपर बायें हाथ की नाडी़ पर जैसे ब्लैड से कई बार काटा गया हो उसे।
हर तरफ बस बहते आँसुओं का शोर था।उस शोर के बीच कोई कह रहा था-
"बडा़ ही प्यारा और होनहार बच्चा था अभी कुछ दिन पहले ही जिला टाॅप करने की खुशी में दोस्तों के साथ पार्टी कर रहा था यहीं पास के एक पार्क में।
किसी बेहया लड़की ने प्यार में धोखा दे दिया और इसने इतना बड़ा कदम उठा लिया।"
"अरे राम राम ये तो बडा़ जुल्म हो गया क्या बीत रही होगी बच्चे के माँ-बाप पर!"
किसी बुजुर्ग की मनकेदार आवाज उभरी।
माँ-पापा पर क्या गुजर रही थी ये मैं बखूबी समझ रहा था पर मेरे दिल पर क्या गुजर रही थी ये सिर्फ मैं
महसूस कर रहा था।
अभी कल ही की बात हो जैसे जब छोटू मुझे फोन पर अपनी गर्लफ्रेंड के बारे में बता रहा था।
"श्रेया बहुत अच्छी लड़की है भाई वो भी मुझसे बहुत प्यार करती है मैं उससे ही शादी करूँगा वरना किसी से नहीं।"
उसने अपने मासूमियत और गुस्से भरे स्वर में कहा।
"हाँ-हाँ बडा़ भाई कुँवारा बैठा है और तुझे अभी शादी करनी है चल तू अपनी पढ़ाई पे ध्यान दे मैं हूँ यहाँ।"
"ओके भाई आई लव यू तुम मेरी जान हो!"
झूठ बोलता था वो मैं उसकी जान नहीं था वरना इतनी आसानी से न दे देता वो।
उस लड़की से बडा़ धोखेबाज वो था मेरा अपना भाई जिसने धोखा दिया मुझे।
मैं चीख-चीख कर रोना चाहता था पर मेरे गले से आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी।
"उफ्फ एक छोटा सा काँटा भी चुभ जाता था तो सारा घर सिर पर उठा लेता था और आज देखो कैसे कसाईयों की तरह नसों के टुकड़े कर दिये थे उसने।
मैं उस तड़प और वेदना सिर्फ का अंदाजा भर लगा सकता था जिसने मेरे भाई को अपनी जान लेने पर मजबूर कर दिया।"
"कितना दर्द सहा होगा उसने कितना तड़पा हो गा उसने जो आत्महत्या... नहीं ... नहीं ... हत्या है और हत्यारिन है वो लड़की जिसने मेरे भाई के जिस्म से उसकी रूह छीन ली, एक बाप से उसका बेटा, एक माँ से उसके कलेजे का टुकड़ा और भाई से उसकी जान को छीन लिया उफ्फ कितनी निर्दयी होगी वो लड़की.... पिशाचनी.....

◼️◼️◼️

सात साल बाद,

"पिछले सात सालों में मेरे लिए सब कुछ बदल गया था सब कुछ मैंने लास्ट सेमेस्टर में इंजीनियरिंग छोड़ दी और रुद्र चतुर्वेदी से बन गया आईपीएस रुद्राक्ष चतुर्वेदी।"
"खैर इस वक्त सुबह के साढे़ छः बजने को हैं और मेरी गाड़ी स्वाभिमानपुरम् की ओर बढ़ रही है दरसल एक नया केस आया है।"

सात साल बाद एक गठीले और सुडौल जिस्म का मालिक बनकर बेहद आकर्षक दिख रहा था रुद्र साथ ही आईपीएस अधिकारी की वर्दी में जो रुआब झलक रहा था उसका तो क्या कहना!
खैर स्वाभिमानपुरम् में लोगों की भीड़ लगी हुई थी पर एक सरकारी अधिकारी की गाड़ी देखकर लोगों का मजमा़ बिखरता चला गया और उस सरकारी गाड़ी की राह अपने-आप तैयार हो गई।
करीब तीन मिनट बाद गाड़ी रुकने पर एक महिला और दो पुलिस कांस्टेबलों के साथ रुद्र भी गाड़ी से उतरा और चेहरे से गॉगल्स हटाते हुए उसने सामने मौजूद तिमंजिला मकान पर निगाह डाली।
"घर का मालिक काफी अमीर लगता है और अय्याश भी।"
संगमरमरी फर्श को अपने जूतों तले रौंदते हुए वो आगे बढ़ रहा था।अभी वो कुछ दूर ही गया होगा कि सामने से मीडिया और कुछ पुलिस कांस्टेबल आते हुए दिख गए।
"जय हिंद सर!"
कांस्टेबलों ने एक साथ सैल्यूट किया और बदले में रुद्र ने हल्के से सिर हिलाया।
"सर!एक सवाल सर इस हत्या के मामले में आप क्या कहना चाहेंगे।"
एक नौजवान न्यूज रिपोर्टर ने दूसरे को पीछे धकेलते हुए रुद्र से सवाल किया।
"एक सवाल सर!हाल ही में हुई ऐसी हत्या का यह कोई इकलौता मामला नहीं है बल्कि पिछले एक महीने से भी कम समय में हुई यह तीसरी हत्या है और पुलिस प्रशासन पूरी तरह से खामोश है। इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे।"
एक खूबसूरत न्यूज रिपोर्टर ने आगे आकर सवाल किया बहरहाल रुद्र ने किसी भी सवाल का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा और धडधडा़ता हुआ अंदर घुस गया जबकि दो कांस्टेबलों ने काफी जद्दोजहद के बाद उन न्यूज रिपोर्टरों को रोका और आखिरकार हार मानकर वे भी लौट गये।
"जैसा कि आप सब देख रहे हैं हाल में हो रही इन घटनाओं पर पुलिस प्रशासन पूरी तरह खामोश है इससे साफ जाहिर होता है कि..... "
इससे आगे उस न्यूज रिपोर्टर ने क्या कहा ये सुने बिना ही रुद्र उस मकान के भीतर दाखिल हो गया।
"क्या हालात है?"
मकान में दाखिल होते ही रुद्र ने वहाँ पहले से ही मौजूद एक इंस्पेक्टर से सवाल किया।
"जय हिंद सर!छान बीन जारी है मगर अभी तक कातिल का कोई भी सुराग नहीं मिला।"
"क्या शिवाजी इतना धीरे काम करोगे तो कैसे चलेगा ऊपर से प्रेसर आ रहा है यार!"
रुद्र ने उसके कंधे पर हाथ रखकर उसके साथ-साथ चलते हुए बताया।
"सर हमारी टीम पूरी कोशिश कर रही है।"
"मर्डर किसका हुआ है?"
रुद्र ने पहला सवाल किया।
"एक लड़की सर!काॅल सेंटर में जाॅब करती थी रूही चौधरी नाम था उसका।ये मकान उसने किराये पर ले रखा था और यहाँ अकेली रहती थी।"
"और मकान मालिक?"
"वो विदेश में रहता है सर साल या छः महीने पे आता है यहाँ।"
"अमूमन कितने बजे हुआ है मर्डर?"
चारों ओर नजरें दौडा़ते हुए रुद्र ने सवाल किया।
"कल रात दस बजे तक तो लड़की बाहर ही थी सर दोस्तों के साथ पार्टी कर रही थी और पडो़स के एक पंडित ने इसे ग्यारह बजे मकान में घुसते हुए देखा और सुबह जब कामवाली बाई आई तो घर में लाश देखकर उसने पुलिस को कॉल कर दिया अभी तक इतना ही पता चला है सर।"
इंस्पेक्टर शिवाजी ने आराम से जवाब दिया।
"हुम्म्!लाश कहाँ है?"
रुद्र ने सवाल किया।
"वो रही सर, बहुत बुरी हालत में है लाश।"
इंस्पेक्टर ने घबराहट भरे स्वर में जवाब दिया और पास में ही पड़े एक सोफे की ओर इशारा किया।
लाश दरसल एक सोफे और कांच के मेज के बीच में रखी हुई थी जिसके सिरहाने पर दो महिला कांस्टेबल रूमाल से मुँह ढ़ककर खड़ी हुई थीं और उनकी हालत बेहद खराब लग रही थी।
"बुरी हालत में है मतलब?"
कहने के साथ ही रुद्र ने एक महिला कांस्टेबल को उस लाश पर पडा़ कपडा़ हटाने को कहा और न चाहते हुए भी महिला कांस्टेबल ने कपडा़ हटा दिया और उस लाश को देखते ही रुद्र तीन कदम पीछे हट गया।
ये सब अचानक से हुआ और उसका सिर घूमने लगा ऐसा लग रहा था जैसे उल्टियाँ आने वाली हों।
"व..... वाॅशरूम!"
रुद्र ने अपनी साँस रोकते हुए पूछा और इंस्पेक्टर ने फौरन दांयी ओर दिख रहे एक दरवाजे की तरफ इशारा कर दिया।
लगभग तीन मिनट बाद जब रुद्र बाहर आया तो ऐसा लग रहा था जैसे काफी दिनों से उसकी तबियत खराब हो।
"वो सचमुच कोई वहसी दरिंदा रहा होगा सर जिसने इस मासूम सी बच्ची का पूरा जिस्म चाकुओं से चीर डाला और तब भी जब उसका दिल नहीं भरा तो उसने उसी नश्तर से इसके वक्ष स्थल और माथे पर मैं बेवफा हूँ गोद दिया।"
इंस्पेक्टर ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा और रुद्र ने दोबारा उस लाश को देखा।उसके जिस्म पर एक भी कपड़ा नहीं था और उसका पूरा शरीर खून और चाकुओं के गहरे घावों से भरा हुआ था।
"दरिंदा था वो पर क्या सचमुच?"
"अगर ऐसा ही था तो उसने उस लड़की के जिस्म पर मैं बेवफा हूँ ऐसा क्यों गोद दिया था।क्या वाकई में इस लड़की ने उसे धोखा दिया था छल किया था उसके साथ?"
"और क्या इतनी बड़ी सजा जरूरी थी उस छल के लिए जो भी हो मैं इस वक्त सिर्फ एक कानून का रखवाला हूँ और वो एक सनकी हत्यारा और उसे सजा देना मेरा फर्ज है और फर्ज के आगे भावनाओं की कोई बिसात नहीं?"
रुद्र के मन में चल रहे इस अन्तर्द्वंद ने कहीं न कहीं उसके अतीत को उसके सामने लाकर खड़ा कर दिया था।प्यार में धोखा खाने का दर्द वो बखूबी समझता था आखिर इसी दर्द के चलते सात साल पहले उसने अपना भाई खोया था और कहीं न कहीं वो दर्द और वो टीस आज भी उसके सीने में उभर रही थी।
"लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दो और पंचनामा तैयार करो केश फाइल करो शहर में हाई एलर्ट जारी करवा दो हमारे शहर में कोई सीरियल किलर खुला घूम रहा है, और हाँ इंस्पेक्टर मुझे बाकी तीनों केसैज की डिटेल्स चाहिए जितनी जल्दी हो सके।"
अपने अतीत के पन्नों को वापस बंद करते हुए रुद्र ने इंस्पेक्टर को आर्डर दिया और बाकी कमरों की छानबीन करने के बाद वो वापस चला गया।
"जी सर अब से मैं ये केस पर्सनली हैंडल कर रहा हूँ कल कुछ लोगों को पूछताछ के लिए थाने बुलाया है उनसे पूछताछ के बाद ही कोई रिपोर्ट सबमिट कर पाऊंगा।"
गाड़ी में ड्राइवर के पीछे बैकशीट पर बैठा रुद्र फोन पर सीनियर से बातें कर रहा था।
"ओके सर!जय हिंद!"
कहने के साथ ही रुद्र ने काॅल डिस्कनैक्ट कर दिया।
"जफर जरा गाडी़ आगे किसी होटल के पास रोक देना और मेरे लिए थोड़ी बिरयानी पैक करवा लेना और हाँ अपने लिए भी कुछ लेना हो तो बेझिझक ले लेना।"
कहने के साथ ही रुद्र ने शर्ट की जेब से सिगरेट और बैक पॉकेट से लाइटर निकाल कर सिगरेट सुलगा लिया।
"क्या जिंदगी है जफर भाई दिन रात खून चोरी डकैती मियाँ हमसे अच्छी जिंदगी तो आप ही की है।"
सिगरेट की लम्बी कश लेते हुए रुद्र ने ड्राइवर से कहा और पैर पसार कर आराम से बैठ गया।
"कहाँ सर आपकी सैलरी और मेरी सैलरी में जमीन आसमान का फर्क है मगर हाँ सर अपने लिए यहीच ठीक है।"
जफर ने हँसते हुए जवाब दिया और उसका जवाब सुनकर हमेशा कि तरह रुद्र ने फिर मुस्कुरा दिया।
खैर लगभग पंद्रह मिनट बाद रुद्र को उसके घर छोड़ के और पुलिस जीप वहीं गैराज में पार्क करने के बाद ड्राइवर जफर अपनी बाइक लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा और रुद्र ने बैक पाॅकेट से चाभी निकाल कर दरवाजा खोला और अंदर जाकर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
लाइट आॅन करने के बाद धम्म से सोफे पर गिरा और लेट गया।शायद काम की थकावट के वजह से वहीं लेटे-लेटे सो गया और जब उठा तो काफ़ी रात हो गई थी।
"ओह शिट दस बज गये।"
कहने के साथ ही अंगड़ाईयाँ लेता हुआ रुद्र फ्रैश होने के लिये अपने बेडरूम से अटैच बाथरुम में चला गया।
नहा कर निकलने के बाद उसने पास रखी गोदरेज अलमारी में से एक कुरता और ट्राउजर निकाल लिया और इसी बीच एक कागज का टुकड़ा भी जमीन पर आ गिरा खैर उस कागज के टुकड़े पर उसका ध्यान तब गया जब उसने कपड़े पहन कर अलमारी बंद की।
कागज का टुकड़ा देखते ही उसने फौरन उसे उठा लिया और कुर्ते की बाँह से रगड़ कर साफ करने लगा जैसे वो कागज का टुकड़ा उसके लिए बेहद बेशकीमती हो।

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"भईया सबसे पहले तो अपने छोटे को माफ कर देना  जब तक तुम इसे पढो़गे मैं इस कमजर्फ़ दुनिया को छोड़ कर जा चुका होऊँगा।
व्हाटस्एटप और हाइक जैसे चैटिंग एप्स के जमाने में आपको चिट्ठी लिख रहा हूँ।सोंचने में ये बहुत अजीब लग रहा पर क्या करूँ ये सब जो कुछ मैं इस चिट्ठी में लिखकर जा रहा हूँ सीधे तौर पर कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।शायद इसीलिए इस काग़ज़ के टुकड़े का सहारा लेना पड़ा आपको तो पता ही है भाई जब से मैंनें होश सम्हाला था तभी से मैं आईपीएस अधिकारी बनने के लिए कितना पागल था पर पिछले तीन महीनों से मुझ पर एक नया जुनून सवार हो गया।
साला प्यार का नशा भी अजीब है एक बार चढ़ जाये तो बस जान लिये बिना पीछा ही नहीं छोड़ता।श्रेया के बारे में तो मैंनें आपको बताया ही था पहली बार उसे बैडमिंटन कोर्ट में देखा था और उसी वक्त मेरा बेचारा दिल घायल हो गया था।तीन महीने पीछा करने के बाद एक दिन आखिर मैंनें डरते-डरते उसके सामने अपने दिल की बात रख ही दी और पहले तो उसने एकदम से मना कर दिया और नाराज़ भी हो गई लेकिन फिर कुछ दिनों बाद उसने मुझे दोस्ती आॅफर की और मैंनें झट से कुबूल कर लिया वक्त के साथ-साथ हम दोनों एक दूसरे के काफी करीब आ गये और फिर मेरी काफी कोशिशों के बाद एक उसने कुबूल कर लिया कि वो भी मुझसे प्यार करती थी।मैं उस दिन इतना खुश था कि मैंनें सारे दोस्तों को इकठ्ठा किया और बड़ी सी पार्टी दे डाली खैर वक्त के साथ हमारा प्यार बढ़ता ही गया पर इसी बीच फाइनल के इग्जाम्सगए और हम दोनों ने तय किया कि हमें पढा़ई पे ध्यान देना चाहिए और यही सोचकर हमने थोड़ी दूरी बना ली और यही मेरे जीवन कि सबसे बड़ी गलती साबित हुई।हालांकि मैंनें जिले में टाॅप किया था पर मैं खुश नहीं था क्योंकि श्रेया का बिहेवियर इन दिनों कुछ बदला-बदला सा लग रहा था जोर देने पर पता चला कि वो रिलेशनशिप तोड़ना चाहती थी और ये जानकर मुझे बहुत जबर्दस्त धक्का लगा।मैंनें उससे वजह पूछी पर काफी कोशिश के बाद भी उसने मुझे कोई भी सीधा जवाब नहीं दिया और आखिरकार एक दिन उसने अपना नमबर भी चेंज कर दिया।
आप पूछते रहते थे न कि मैं दाढ़ी क्यों बढ़ा रहा था उस बीच तो शायद यही वजह थी।खैर सबसे ज्यादा बुरा मुझे तब लगा जब पता चला कि मेरे क्लास का एक लड़का जो हर मामले में मुझसे पीछे रहता था अब वो उसके साथ घूमने लगी थी और मुझे देखकर ऐसे नजरें फेर लेती थी जैसे मैं कोई घिनौना सा मकोडा़ था।मैंनें बहुत कोशिश की उसे भुलाने कि इसके लिए मैंनें बियर और सिगरेट का भी सहारा लेना शुरू कर दिया पर वो सिर्फ मेरे ख्यालों में नहीं बल्कि मेरे दिल में बसी थी इसलिए भुला नहीं पाया मैं उसे।पिछले तीन दिनों में मैंनें तीन बार जान देने की कोशिश की लेकिन आप तो जानते ही हो कि मुझसे दर्द नहीं बर्दाश्त होता पर अब इस दर्द से भयानक वो दर्द लगने लगा था जो मेरे दिल में था।और इसीलिए मैंनें ये फैसला लिया है जानता हूँ ये गलत है पर क्या करूँ दिल के हाथों मजबूर हूँ हाँ बस आपसे एक गुजारिश है कि हो सके तो मेरा ख्वाब आप पूरा कर दीजिएगा।काश मैं आपको आईपीएस की वरदी में देख पता खैर मेरी बदकिस्मती ओके भाई अब जा रहा हूँ और अब बस इतनी सी ख्वाहिश रह गई है सीने में कि काश अगले जन्म में आपका बेटा बन के वापस आऊँ..... बाय!आपका छोटू!"

उस चिट्ठी के आखिरी शब्दों को पढ़ते ही रुद्र की आँखों से जलधारा बहने लगी और उसके गर्म आँसुओं की कई बूंदें उस चिट्ठी पर गिर पड़ी।
अचानक उसके दिल में गुस्से और नफरत की एक तेज लहर उठी और उसने सामने मेज पर रखा फ्लावर पाॅट उस आईने पर दे मारा जो उसे घूर रहा था जैसे उसका मजाक उड़ा रहा हो।
उसने चिट्ठी को एक और बार ध्यान से देखा और फिर मोड़कर उसे वापस अलमारी में रख दिया।
इससे पहले कि वह और कुछ सोंच पाता उसके मोबाइल की रिंग बजी और नम्बर देखने के बाद उसने फौरन काॅल पिक कर लिया जो किसी डाॅक्टर का था।कुछ देर बातें करने के बाद उसने काॅल डिस्कनैक्ट की और दरवाजे की ओर बढ़ गया।
करीब बीस मिनट बाद उसकी जीप एक मेंटल असायलम के बाहर रुकी और जीप से उतरने के बाद रुद्र धड़धडा़ता हुआ अंदर चला गया।
"हैलो डाक्टर!वो अब कैसे हैं?"
सायकायट्रिस्ट डाक्टर भगत शर्मा के केबिन में घुसते हुए हुए उसने पूछा।
"ओह!रुद्र माई ब्वाय कम आॅन तुम्हें देखकर सचमुच अच्छा लगता है अर... वैसे तुम्हारे माँ ठीक हैं बस ये बताने के लिए तुम्हें बुलाया कि तुम्हारी माँ को कल फिर से दौरा पड़ा था और इसमें उन्हें थोड़ी चोटें आ गई हैं पर घबराने की कोई बात नहीं है।"
उसे चिंहुकते हुए देख डाक्टर भगत ने कहा।
"अर.. क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?"
रुद्र ने सवाल किया।
"मिल सकते हो?हाँ बिल्कुल मैं किसी को तुम्हारे साथ भेंज देता हूँ इससे तुम्हें उन तक पहुँचने में आसानी होगी।
खैर इसके बाद डाक्टर ने एक नर्स को रुद्र के साथ भेंज दिया।

"काश तू आज हमारे साथ होता छोटे मैं बहुत अकेला पड़ गया हूँ यहाँ।तेरे जाने के तीन साल के अंदर ही बाबा गुजर गये और इस सदमें को बर्दाश्त नहीं कर सकी माँ जिसे आज यहाँ इस जगह रखना पड़ रहा है।तूने झूठ बोला था कि तू हमसे प्यार करता था तू नहीं करता था वरना यूँ हमें छोड़कर न जाता।एक गिरी हुई घटिया और मक्कार लड़की की गलतियों की सजा तूने हम सबको दी।"

ये सब सोंचते हुए उसकी आँखें एक बार फिर नम हो गईं और रुद्र ने अपनी निगाहें दूसरी ओर फेर लीं ताकि उसकी भीगी आँखें वो नर्स न देख सके।
बहरहाल नर्स उसे उस कमरे के दरवाजे पर छोड़ कर वापस चली गई और रुद्र उस कमरे के भीतर चला गया जहाँ एक बूढ़ी औरत का जिस्म बेजान होकर उस बेड पड़ा था।वो सो रही थी शायद किसी दवा या इंजेक्शन के असर से खैर रुद्र काफी देर तक वहीं उनके पास बैठा रहा जब तक कि उसका फोन नहीं बजा जो सीधा पुलिस स्टेशन से था।
फोन पर बात करने के बाद वो जीप स्टार्ट करके सीधे पुलिस स्टेशन की ओर निकल गया।
"हाँ शिवाजी केस की क्या रिपोर्ट है?"
पहुँते ही उसने सबसे पहले इंस्पेक्टर से सवाल किया।
"जय हिंद सर!हमने एक आदमी को अरेस्ट किया है अखिल नाम है इसका और ये उस लड़की का लवर था।"
इंस्पेक्टर शिवाजी एक केबिन की और बढ़ते हुए रुद्र को बता रहा था।
"ओह!उसने कुछ बताया?"
रुद्र ने अजीब ढंग से उसे घूरते हुए उससे सवाल किया।
"जी सर बहुत कुछ बताया उसने।"
"ओह अच्छी बात है मैं भी मिलना चाहुँगा उससे अभी इसी वक्त।"
"ओके फिर चलिये?"
इसके बाद दोनों इन्क्वायरी रूम तक साथ-साथ जाते हैं और रास्ते भर शिवाजी ने उसे काफी बातें बता दीं।
इन्क्वायरी रूम में काफी अंधेरा दाऔर रौशनी के नाम पर एक बल्ब कमरे के बीचों-बीच हवा में लटक रहा था जिससे कुछ फीट नीचे फर्श पर एक चौडा़ मेज रखा हुआ था और फिर केबिन में घुसते ही उसकी नजर मेज के पार रखी एक कुर्सी पर बंधे अट्ठारह साल के लड़के पर पड़ी जिसका चेहरा चोटों और मार की वजह से सूजा हुआ था।
वो बुरी तरह डरा हुआ लग रहा था और रुद्र को देखते ही उसकी आँखें डर के मारे और सिकुड़ गईं।
"क्या नाम है तेरा?"
रुद्र ने मेज के इस पार रखी कुर्सी पर बैठते हुए सवाल किया।
"अ.... अ.... अखिल!"
उसने कराहते हुए बताया।
"अच्छा तो अखिल बेटा अब पूरी बात बताओ तुमने उस लड़की की हत्या क्यों की?"
रुद्र ने साफ तौर पर सवाल पूछा।
"अर... मैनें नही की?"
अखिल ने डरते हुए जवाब दिया।
"तेरी बकवास सुनने के लिए मैं यहाँ नहीं आया जो सच है वो बता अब चल शुरू हो जा फटाफट।"
रुद्र ने गुस्से में भभकते हुए अंदाज में कहा और पहले से ही काफी डरा हुआ होने की वजह से अखिल ने बोलना शुरू कर दिया।
"हाँ ये सच है कि मैं कभी उसका ब्वॉयफ्रेंड हुआ करता था पर पिछले एक महीने से हम दोनों ने एक दूसरे से कोई कांटेक्ट नहीं किया।सच बात तो यह है कि एक महीने पहले ही उसका और मेरा ब्रेकअप हो चुका था।मैं इस बात से इतना ज्यादा दुखी हो गया था कि मैंनें कई बार खुद की जान लेने की कोशिश भी की पर अपने माँ-बाबा के बारे में सोचकर मैंनें ये विचार दिमाग से निकाल दिया हालांकि इसके बाद भी मैंनें उसे कई बार मनाने की कोशिश की पर थक हार कर मैं भी चुप होकर बैठ गया और मैंने उसे भूल जाने में ही अपनी भलाई समझी।"
अखिल ने उसे बताया।
"ओह तो तूने ये सब नहीं किया चल ठीक है तेरी बात मान लेता हूँ और तुझे छोड़ देता हूँ पर हाँ केस ओपेन रहने तक ये शहर छोड़ने की गलती मत करना अब घर जा और हाँ ये ले घर जाने से पहले हास्पिटल चले जाना।"
कहने के साथ ही रुद्र ने जबर्दस्ती उसके हाथ में कुछ रूपए पकड़ा दिये और आपनी किस्मत पर हैरान रुद्र के गुणगान करता हुआ वहां से निकल गया खैर एक पल के लिए रुद्र को उस लड़के में अपने छोटू की झलक दिखाई दे गई।
"आपने उसे जाने क्यों दिया सर?"
इंस्पेक्टर शिवाजी ने रुद्र से सवाल किया।
"ओह उसने कुछ नहीं किया खैर दूसरे को बुलाओ।"
रुद्र के आदेश पर इंस्पेक्टर कमरे से बाहर निकल गया और जब लौटा तो उसके साथ कोई और भी था।
और लगभग एक मिनट बाद वो अखिल की जगह बैठा था बावजूद इसके उसके चेहरे पर डर के बजाय रौब की झलक दिखाई पड़ रही थी।
"इंस्पेक्टर शायद तुम लोगों को पता नहीं मेरे काका यहाँ के विधायक हैं और अगर तुम लोगों ने जल्दी ही मुझे नहीं छोड़ा तो मैं तुम लोगों की वर्दी उतरवा दूँगा।
"ओ नवाब साहब हवाबाजी छोड़ और थोड़ा जमीन पर आ और ये बता कि तेरा उस लड़की के साथ क्या सम्बंध है।"
इंस्पेक्टर शिवाजी ने उसका काॅलर पकड़ते हुए उससे सवाल किया।
"तुझे उससे क्या तेरी कौन लगती है वो?"
उसने रौबदार आवाज में कहा और रुद्र ने बिना कुछ सोंचे चटाक से एक थप्पड़ उसके गाल पर रसीद कर दिया जिसकी वजह से उसके होठों के कोने से खून की धार बह निकली और दर्द से बिलबिलाता हुआ वो उन दोनों को गालियाँ बकने लगा।
"उसने जो पूछा उसका जवाब दे सीधे-सीधे वरना यहाँ से बाहर तू नहीं तेरी लाश जायेगी।"
रुद्र ने दाँत पीसते हुए इस अंदाज में बोला कि जिसे सुनकर इंस्पेक्टर शिवाजी तक के रोंगटे खडे़ हो गये फिर वो तो बच्चा था।
"वो... वो मेरी गर्लफ्रेंड थी हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते थे।"
"कबसे?"
"दो महीने से!"
"और तूने उसका खून क्यों किया?"
"क्या... मैंनें नहीं बिल्कुल भी नहीं मैंनें नहीं किया।बल्कि मैं तो उससे प्यार करता था।"
उस लड़के ने घबराहट भरे लहजे में कहा।
"झूठ मत बोल मौका-ए-वारदात पर तेरी अंगूठी मिली है ये देख।"
रुद्र ने खून से सना एक डायमंड रिंग हवा में लहराते हुए कहा।
"ये... ये तो?"
"किसकी है बोल?"
रुद्र ने चीखकर कहा।
"म... म.... मेरी है लेकिन मैंनें खून नहीं किया।"
उस लड़के ने गिड़गिडा़ते हुए कहा।
"ओह अच्छा!वारदात की जगह पर एक चाकू भी मिला है जिससे हत्यारे ने हत्या की थी और बडे़ कमाल की बात है कि उसी की जोड़ीदार चाकू हमें तेरे कमरे में मौजूद एक दराज से मिली है।"
"पर ऐसे तो और भी कई चाकू होंगे क्या सबूत है कि ये मेरा ही है?"
उसने अपना बचाव करने की कोशिश की।
"ओह जरूर होंगे पर उनमें से हर किसी पर तेरी उंगलियों के निशान मौजूद नहीं होंगे।"
रुद्र ने अंतिम दांव फेंका और अब वो बुरी तरह फँस चुका था हर सबूत उसके खिलाफ था हालांकि वो बार-बार चीख-चीख कर कह रहा था कि कत्ल उसने नहीं किया पर कोई फायदा नहीं था।
इंस्पेक्टर शिवाजी ने उसे अरेस्ट कर लिया और लाॅकअप में डाल दिया।
"सर!"
इंस्पेक्टर ने रुद्र को पीछे से टोका।
"हाँ?"
"आपको कैसे पता चला कि उस चाकू जैसी सेम दूसरी चाकू उसके घर में है ये बात तो मैं भी नहीं जानता था।"
इंस्पेक्टर ने उसे शक भरी निगाहों से उसे घूरते हुए पूछा।
"अर... मैंने बस दूर की कौड़ी फेंकी थी और वो फँस गया रिपोर्ट तैयार करके केस की फाइल बंद कर दो।"
रुद्र ने उससे नजरें चुराते हुए कहा और जीप स्टार्ट करके चल पड़ा।
बहरहाल इंस्पेक्टर के मन में इस वक्त जोरदार उथल-पुथल हो रही थी।

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बड़े-बड़े शहरों में अक्सर लोग शाम को घूमने-फिरने के लिए निकलते हैं।कुछ दोस्तों के साथ तफरी करने तो कुछ सहेलियों के साथ गप्पे लडा़ने,वहीं बुजुर्ग एक दूसरे के दुख-दर्द सुनने सुनाने जाते हैं और कभी-कभी या शायद अक्सर कुछ प्रेमी युगल एक दूसरे के दिल का हालचाल पूछने और बताने जाते थे।
"गोविंद तुम समझ क्यों नहीं रहे हो मैं अब थक गई हूँ इस सो काॅल्ड रिलेशनशिप का बोझ उठाते-उठाते!"
पार्क के एक किनारे लगे बेंच पर बैठी एक खूबसूरत लड़की ने सामने खड़े युवक से कहा।
उस लड़की उम्र करीब तेईस-चौबीस के बीच रही होगी और लगभग यही उम्र उस युवक की भी थी।
"लेकिन श्रेया मैं समझ नहीं पा रहा हूँ अभी एक हफ्ते पहले तक तो सबकुछ अच्छा चल रहा था हमारे बीच और मैंने तो मेरे मम्मी-पापा से हमारी शादी की भी बात कर ली है फिर अब अचानक ऐसा क्या हो गया कि तुम हमारा ये रिश्ता एकदम से खत्म करने पर अड़ गई हो।आखिर तुम्हारी प्राब्लम क्या है?"
उस आदमी ने खीझते हुए कहा।
"तुम.... तुम हो मेरी प्राॅब्लम।"
"क्या... क्या कहा मैं तुम्हारी प्राॅब्लम हूँ?तुम्हारे लिए मैंनें क्या-क्या किया यहाँ तक कि अपने प्रमोशन को भी मैंनें लात मार दी सिर्फ तुम्हारे लिए ताकि तुम्हारे साथ रह सकूं और तुम कहती हो कि मैं तुम्हारी प्राॅब्लम हूँ।"
उस युवक ने जिसका नाम शायद गोविंद था कुढ़ते हुए पूछा।
"हाँ-हाँ तुम हो मेरी प्रॉब्लम और अब मैं इस बारे में कोई और बात नहीं करना चाहती मैं जा रही हूँ!मुझे अब तुमसे कोई वास्ता नहीं रखना।"
कहने के साथ ही वो युवती पार्क से बाहर जाने वाले रास्ते की ओर चल पड़ी और गोविंद भी उसे मनाने उसके पीछे-पीछे दौड़ पडा़।
इस बीच उन दोनों में से किसी की निगाहें थोड़ी दूर पर मौजूद उस पेड़ के पीछे छिपे शख्स पर एक बार भी नहीं पडीं जो काफी देर से उनका पीछा कर रहा था और उनकी बातें भी सुन रहा था खैर न जाने क्यों मगर काले नकाब के पीछे छिपी उसकी आँखों में इस वक्त बेहद जबर्दस्त गुस्सा दिखाई दे रहा था।
कुछ सोंचने के बाद वो गुमनाम आदमी भी उन दोनों के पीछे-पीछे चल पड़ा जिन्हें उस आदमी की बिल्कुल भी फिक्र नहीं थी।
दिन ढलने के साथ ही हल्का अँधेरा सा छाने लगा चारों ओर और उसी अँधेरे में वो तीनों कहीं गुम हो गए।
अँधेरे और काले बादलों से तो रुद्र भी घिरा हुआ था शायद इसीलिए अपने बेडरूम में लेटा सिगरेट पी रहा था और कमरे में धुंए का कृत्रिम बादल बना रहा था जबकि बिस्तर पर उसके आस-पास ढे़र सारी फाइलें पडीं हुई थीं।
हालांकि वो उस सपने के बारे में सोंच रहा था जो उसने अभी कुछ देर पहले देखा था जिसमें वो एक बंद अंधेरे कमरे में मौजूद था और अचानक उन लाशों ने उस पर हमला कर दिया।वो उन्हीं लड़कियों की लाशें थी जिनका पिछले दिनों कत्ल हुआ था।
खैर इधर रुद्र ये सब सोंच ही रहा था कि तभी फोन की घंटी जोरों से घनघना उठी और उसकी तंद्रा टूट गई।
रुद्र फौरन बिस्तर से उछल कर फर्श पर खड़ा हो गया और उसने जिस्म पर कपड़े के नाम पर सिर्फ एक तौलिया लपेट रखा था।
फोन की घंटी और तेज हो गई जबकि उसने अपनी रिस्टवाॅच पर नजर डाली जिसकी सुईयाँ करेक्ट साढे़ दस बजा रही थीं।खैर उसने लपक कर तेजी से फोन उठा लिया।
"हैलो!एसीपी रुद्राक्ष हियर!"
रुद्र ने प्रभावशाली ढंग से कहा।
"हैलो!जय हिंद सर मैं इंस्पेक्टर शिवाजी।"
दूसरी ओर से इंस्पेक्टर शिवाजी की आवाज उभरी।
"हैलो इंस्पेक्टर इस तरह यूँ अचानक फोन किया कोई जरूरी काम था तो मेरे सेलफोन पर काॅल कर लेते!"
रुद्र ने सिगरेट का कश लेते हुए खुश्क आवाज में कहा।
"साॅरी सर सेलफोन पर ट्राई किया पर आॅफ आ रहा था इसलिए लैंडलाइन पर ट्राई किया।"
"कोई बात नहीं इंस्पेक्टर क्या मैं जान सकता हूँ इस वक्त तुमने मुझे क्यों डिस्टर्ब किया?"
"ओह हाँ सर!एक नई बात पता चली इन चारों मर्डर केसेज के बारे में तो सोंचा आपको बता दूँ?"
उधर से इंस्पेक्टर शिवाजी की आवाज़ सुनाई दी जो काफी गंभीर लग रही थी जबकि इंस्पेक्टर की बात सुनकर रुद्र एकदम से चौकन्ना नजर आने लगा यहाँ तक की उसने सिगरेट भी जमीनपर गिरा कर पैरों तले कुचल कर बुझा दिया जो अभी आधा भी खत्म नहीं हुआ था।
"और क्या है वो बात?"
रुद्र ने त्योरियाँ चढा़ते हुए पूछा।
"सर इन चारों केसेज में मैं कोई लिंक खोज रहा था और इस बात पर काफी हैरान था कि अब तक मुझे एक भी लिंक क्यों नहीं मिला पर अब सर मेरे पास एक नहीं बल्कि दो दो लिंक हैं।"
उधर से इंस्पेक्टर की आवाज़ एक बार फिर उभरी।
"क... क्या?"
रुद्र ने अपने माथे पर उभरते पसीने की गर्म बूंदों को नजरअंदाज करते हुए पूछा।
"अर!सर दरसल चारों केसेज में एक सिमिलरिटी है और वो ये कि चारों केसेज में मरने वाली लडकियों यानी विक्टम्स की उम्र लगभग तेईस से छब्बीस के बीच थी और हाल ही में उनका अपने-अपने ब्वॉयफ्रेंड्स के साथ ब्रेकअप हुआ था।"
इंस्पेक्टर ने एक सांस में कह दिया।
"ओह!"
रुद्र के माथे की त्योरियाँ गहराती जा रही थीं।
"और दूसरी बात सर जो मुझे ज्यादा परेशान कर रही है वो ये कि उन चारों लड़कियों का बचपन का नाम कभी श्रेया हुआ करता था या उनमें से पहली का नाम तो श्रेया ही था।"
"ओह!इंस्पेक्टर ये तो तुमने बहुत काम की जानकारी दी मगर फिलहाल तुम्हें घर जाना चाहिए काफी देर हो चुकी है।"
रुद्र नें अजीब से स्वर में कहा।
"ओके सर रखता हूँ जय हिंद!"
"जय हिंद!"
कहने के साथ ही रुद्र ने रिसीवर तेजी से फोन के डायल पर पटक दिया और कमरे में चहलकदमी करते हुए कुछ सोंचने लगा।
इस बीच उसने एक और सिगरेट सुलगा ली और उसके खत्म होने तक कमरे में चहलकदमी करता रहा।इंस्पेक्टर से बातें करने के बाद से वो बेहद परेशान नजर आने लगा था और उसका अतीत बार-बार उसके दिमाग में किसी फिल्म की तरह घूमता हुआ नजर आ रहा था साथ उन लड़कियों की लाशें भी चीख-चीख कर अपने लिए इंसाफ की गुहार लगा रही थीं।
खैर खत्म हो चुके सिगरेट के टुकड़े को पैरों तले कुचल कर बुझाने के बाद उसने अपने जिस्म पर मौजूद एकमात्र तौलिया खींच कर अलग करते हुए बिस्तर की ओर उछाल दिया और नहाने के लिए बाथरूम की ओर चल पड़ा।
खैर वहाँ से काफी दूर सरदार पटेल राजमार्ग पर इस वक्त काफी सन्नाटा पसरा हुआ था और उस गहरे सन्नाटे को चीरती हुई एक लड़की डरी सहमी तेज़ चाल से आगे बढ़ रही थी।
"हाँ पापा मैं बस फ्लैट पे ही जा रही हूँ वो मेरे आॅफिस में आज कुछ ज्यादा ही काम आ गया था इसलिए नाइट विजिट करना पड़ा।"
आँखों में अँधेरे का डर लिए हुए दाएं-बाएं ध्यान से देखती हुई वो अपने फ्लैट की ओर बढ़ रही थी।
वो श्रेया थी वही श्रेया जो दो दिन पहले पार्क में गोविंद से बातें कर रही थी बिना ये जाने कि दो अजनबी निगाहें उसका पीछा कर रही थीं उस वक्त भी और इस वक्त भी।
"नहीं पापा मैंनें गोविंद से मिलना-जुलना बंद कर दिया है और आप जहाँ कहेंगे मैं वहाँ शादी करने के लिए तैयार हूँ बस आप अपना और मम्मी का ख्याल रखिये और प्लीज कोई गलत कदम मत उठाइएगा।मेरे लिए आप दोनों से बढ़कर कोई और नहीं है!"
कहने को तो उसने पल भर में इतनी बड़ी बात कर दी थी पर उसकी आँखों में मौजूद आँसुओं की बूँदें उसके दिल का हाल बयाँ कर रही थीं।उसके भीतर उठ रहे दर्द और कसक की ज्वार को सिर्फ वही महसूस कर पा रही थी।
"ओके पापा बाय मैं फ्लैट पर पहुँच के मैसेज करती हूँ!"
कहने के साथ ही उसने काॅल डिसकनैक्ट किया और सेलफोन पर्स में रख लिया।अचानक पीछे से पौधों की एक झुरमुट में कोई हलचल सी हुई और यही पल था जब वो बिजली की फुर्ती से पलटी पर वहाँ सिवाय अँधेरे में चमकते जुगनुओं के कोई नहीं दिखा।
उसने अपने कदमों की चाल और तेज कर दी और लगभग थोड़ी ही देर में अपने फ्लैट के दरवाजे के सामने खड़ी थी।इस बीच उसने कई बार अचानक से पलट कर देखा पर वहां कोई मौजूद नहीं था और उसे  लगा कि ये सिर्फ उसका वहम था कि कोई उसका पीआ कर रहा था।
"कमआॅन श्रेया तू ख्वामख्वाह ही डर रही है तेरा पीछा कोई क्यों करेगा।"
उसने अपने आपको तसल्ली दी और पर्स में हाथ डालकर चाबियाँ खोजने लगी।
लगभग पन्द्रह सेकेंड में चाबियों का गुच्छा उसके हाथ में आ गया और उसने आराम से दरवाज़ा खोला और हल्के से धका दिया, भीतर घुप्प अँधेरा था।
अचानक यूँ ही उसके कानों में हल्की सी सरसराहट उभरी और एक बार फिर उसे लगा जैसे उसके पीछे कोई था और यही पल था जब वो एक बार फिर बेहद तेजी से पीछे मुडी़ पर इससे पहले कि वो अपनी निगाहें ठीक से दौड़ा पाती कोई भारी सी चीज उसके सिर से टकराई जैसे कोई गमला और अगली ही पल उसके होम गुम हो गये।बेहोश होते-होते उसके आँखों में एक धुँधली सी परछाईं दिखी जिसके हाथ में फ्लावर पाॅट जैसा कुछ था और वो बेहद हिंसक अंदाज़ में हँस रहा था।
जाने कितनी देर बेहोश रही वो लड़की पर जब धीरे-धीरे होश आया तो उसने खुद को अपने बेडरूम में पाया जहाँ रौशनी के नाम पर सिर्फ एक नारंगी रंग का जीरो वाॅट का बल्ब जल रहा था।
उसने तेजी से उठने की कोशिश की पर कुछ ही पलों बाद उसे ये एहसास हुआ कि उसकी कलाईयाँ जो कि कमर से पीछे थीं और एड़ियाँ किसी मजबूत तार से बँधी हुईं थीं और मुँह में कपडे़ का टुकड़ा फँसा होने के कारण उसके मुँह से सिर्फ गूँ-गूँ की आवाज़ निकल रही थी।
अचानक उसे अपनीं दायीं ओर पीठ के पीछे से कुछ दूर हल्का खुटका सा महसूस हुआ और किसी तरह ज़हमत उठाकर उसने अपनी नजरें उस ओर घुमाईं और फौरन उसकी नजऱ उस रोलिंग चेयर पर बैठे शख्स पर पड़ी जिसके हाथ में करीब नों इंच के तीखे फल वाला खंजर अंधेरे में भी बेतहाशा चमक रहा था।
उस आदमी और उसके हाथ में मौजूद धारदार खंजर को देखकर श्रेया की पुतलियाँ उसकी आँखों से जैसे बाहर ही आ रही थीं।
खैर श्रेया ने कुछ बोलने की कोशिश की मगर इस बार भी उसके मुँह से सिर्फ गूँ-गूँ की आवाज़ ही निकली और ये देखवर रोलिंग चेयर पर बैठा आदमी जोरों से हँस पड़ा।
हालांकि अँधेरे में होने के कारण श्रेया को उसका चेहरा जरा भी याद नहीं आ रहा था फिर भी उसे उस आदमी के चेहरे पर नाचती क्रूर हँसी भीतर तक कँपकपाती महसूस हो रही थी।
अचानक वो उठा और खंजर लहराता हुआ तेजी से उस लड़की की ओर बढा़।श्रेया की पुतलियाँ बुरी तरह फैल रही थीं और अँधेरे में भी उसके चेहरे पर गर्म पसीने की बूँदें छलछला उठीं।उसका दिल इस वक्त बेहद तेजी से धड़क रहा था पर उस आदमी को इन सबकी परवाह नहीं थी बल्कि वो बेफिक्री से खंजर लहराता हुआ उसके करीब जा रहा था।
उसने खंजर वाला हाथ आगे बढा़या और खरखराती सी आवाज़ में बोला।
"जरा़ भी आवाज़ की तो हमेशा के लिए खामोश कर दूँगा।"
और फिर कुछ पल तक उस लड़की के चेहरे पर मौजूद डर के भावों को देखने के बाद उसने उसके मुँह में ठूँसा हुआ कपडे़ का गोला बाहर खीँच लिया पर डरी सहमी श्रेया की निगाहें सिर्फ उस आदमी के हाथ में मौजूद खंजर पर टिकी थीं।
"क... क... कौन हो तुम?"
उसने सहमे हुए स्वर में पूछा पर उस आदमी ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया।
"तुमने उसे धोखा दिया!"
उस आदमी ने बेहद ठंडे लहजे में कहा और पैनी निगाहों से उसकी ओर घूरने लगा।
"क्.... किसे धोखा दिया मैंने?"
डरते-डरते श्रेया ने सवाल किया जिसका जवाब देने के बजाय वो आदमी उसे घूरता रहा इस बी श्रेया नकाब के पीछे छिपी उन आँखों को पहचानने की कोशिश कर रही थी।
"वो तुमसे प्यार करता था यहाँ तक कि तुम्हारे लिए जान देने को भी तैयार था और बदले में तुमने उसे धोखा दिया।तुमने छल किया उसके साथ।"
उस आदमी का लहजा सख्त और कर्कश हो रहा था जबकि श्रेया का दिल बेहद तेजी से धड़क रहा था।
"मैंनें उसे कोई धोखा नहीं दिया बल्कि मैंनें पहले ही गोविंद को बता दिया था कि मैं सिर्फ मम्मी-पापा के मर्जी से शादी करूँगी पर एक मिनट तुम कौन हो और तुम मेरे और गोविंद के बारे में कैसे जानते हो?"
श्रेया के माथे पर शिकन उभरी।
जाने क्यों मगर बार-बार उसे ऐसा लग रहा था जैसे नकाब के पीछे मौजूद उन आँखों को वो पहचानती थी और वो याद करने की कोशिश करने लगी की उसने उन पहले आँखों को कहाँ देखा था पर उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था।
"मैं गोविंद की बात नहीं कर रहा उस मुद्दे पर हम बाद में चर्चा करेंगें अभी मैं जिसकी बात कर रहा हूँ वो घटना सात साल पुरानी है।सात सालों पहले जब हमने जवानी की दुनिया में पहला कदम रखा था उस वक्त तुमने उसे धोखा दिया था जो मेरे बहुत करीब था भाई था वो मेरा और तुमने उसकी जान ले ली।"
उस आदमी चीखते हुए कहा और इस वक्त उसके लहजे में बेहद जबर्दस्त गुस्सा और दर्द झलक रहा था जबकि श्रेया का छटपटाता हुआ जिस्म बंधनों से आजाद होने की पुरजोर कोशिश में लगा हुआ था पर सिवाय दर्द और तकलीफ़ के उसे कुछ भी हासिल नहीं हुआ।
"म... मैंनें किसी की जान नहीं ली!मैंनें किसी को धोखा नहीं दिया!"
श्रेया बुरी तरह चीख रही थी और उसके आँखों से आँसुओं की धारा बह रही थी।
"तुम!तुम!और सिर्फ तुम हो उसकी कातिल तुम्हारे धोखे को बर्दाश्त नहीं कर सका वो मासूम और उसने अपनी जान दे दी।"
कहते वक्त नकाब के पीछे छिपा उसका चेहरा गुस्से की ज्वाला में धधक रहा था।
“मुझे जाने दो प्लीज मैंनें कुछ नहीं किया मैंने किसी को धोखा नहीं दिया।मुझे तो पता भी नहीं कि तुम किसकी बात कर रहे हो मेरा यकीन करो मैंनें किसी को धोखा नहीं दिया।“
वो बुरी तरह गिड़गिडा़ रही थी पर उस आदमी चेहरे पर सिर्फ नफरत का लावा उबलता दिख रहा था।
“तू नहीं जानती!नहीं जानती तो फिर ये कौन है?”
चीखकर कहने के साथ ही उसने सामने की दीवार पर लगी एक छोटी सी फोटो फ्रेम झटके से खींचकर उसे उसके सामने फेंक दिया।
फर्श पर गिरते ही उस फोटो फ्रेम में लगे काँच के टुकड़े-टुकड़े होकर उसी फर्श पर बिखर गये और श्रेया की नजर उस तस्वीर पर पड़ी जोकि असल में तस्वीर न होकर किसी पुराने न्यूजपेपर की कटिंग थी जिसकी हेडलाइन थी –
“बलरामपुर जिले के सेंट अमुक स्कूल के दो विद्यार्थियों ने बारहवीं की परीक्षा में मारी बाजी।“
और इसी के साथ नीचे स्कूल ड्रेस पहने कुछ बच्चों और उनके एक-दो टीचर्स की भी तस्वीर छपी थी जिनमें सबसे आगे वही खड़ा था,
शिवम उर्फ छोटू!
हाँ वही छोटू जिसने सात साल पहले खुदकुशी कर ली थी रुद्र का जान से प्यारा छोटा भाई।खैर उसी के बगल एक और लड़की खड़ी थी जो छोटू की तरह ही उँगलियों से वी बना कर लहरा रही थी।वो फोटो खिंचवाते वक्त सब इतने खुश थे कि उन्हें देखकर ही खुशी का असल मतलब पता चलता था पर उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि आने वाला वक्त अपने भीतर कितने तूफान संजोए हुए बैठा था।
“देख ये है मेरा भाई जिसे तूने धोखा दिया प्यार के नाम पर उसके दिल उसके जज्बातों से खेला तूनें और वो नासमझ प्यार में हारा अपनी ही जान का दुशमन बैठ गया।तूने सिर्फ उसकी ही नहीं उसके पूरे परिवार की जिंदगी तबाह कर दी यहाँ तक कि तुझे ढूँढने के चक्कर में तीन बेगुनाह लड़कियों ने भी अपनी जान दे दी।नहीं उन्होंने भी धोखा दिया था किसी को वो भी किसी का भाई और किसा का बेटा रहा होगा।तुम लड़कियाँ ऐसी ही होती हो प्यार के बदले सिर्फ धोखा देना जानती हो पर अब बस अब तू किसी और को धोखा देने के लिए जिंदा नहीं बचेगी।“
कहने के साथ बेहद तेजी से खंजर लहराता हुआ वो नकाबपोश उसकी ओर लपका जबकि श्रेया भीगी आँखों से सिर्फ उस तस्वीर को निहार रही थी और उसकी आँखों सें दुख और पश्चाताप के आँसू तेज धार बनकर बहते जा रहे थे।

◼️◼️◼️

श्रेया एक ओर फर्श पडी़ बुरी तरह छटपटा रही थी और खुद को बंधनों से आजाद करने की कोशिश कर रही थी जबकि वो आदमी जो सर से लेकर पाँव तक काले कपड़े में था उसकी ओर से पूरी तरह सतर्क था।
उन दोनों में से किसी को जरा़ सी भनक तक नहीं लगी थी कि वहाँ से थोड़ी ही दूरी पर दरवाजे के पीछे बार-बार कोई साया मँडरा रहा था।अगर उस कातिल को जरा सा एहसास भी होता तो शायद वो इतना बेखौफ न होता।
"दुनिया की नजरों में उसने खुदकुशी कर ली थी पर सच सिर्फ मैं जानता हूँ और सच ये है कि तूने उसे मारा है तू है उसकी कातिल।"
हाथ में तीखा धारदार खंजर लिए धीमे स्वर में गुर्राता हुआ वो कातिल धीरे-धीरे श्रैया की ओर बढ़ रहा था जबकि उसका चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था।
"मैंनें उसे कोई धोखा नहीं दिया था व.... वो मुझसे प्यार करता था पर मैंनें उससे कभी प्यार नहीं किया था ये मैंनें उसे बता दिया था।मैं.... मैं तो गोविंद से प्यार करती थी।"
श्रेया ने गिड़गिडाते हुए कहा।
"चुपकर हरामजादी!तूने उसे भी धोखा दे दिया अब जब तेरे बाप ने तेरी शादी किसी अमीर लड़के से तय कर दी तो तूने उसे भी धोखा दे दिया अरे तू वो नागिन है जो दूध पिलाने वाले को ही डस लेती है।"
उस कातिल के हलक से तेज गुर्राहट भरी आवाज़ निकली।
"तू बहुत चालाक थी तू जानती थी कि पेपर में तू उसके पीछे ही बैठने वाली थी और इसलिए तूने उससे दोस्ती की और वो नासमझ तेरी इस घटिया हरकत को तेरा प्यार समझ बैठा और स्कूल में हमेशा सामान्य नंबर लाने वाली तूने अचानक से जिले में सैकेंड रैंक ला दिया और अपना मतलब पूरा होते ही तूने उसे दूर जाने को बोल दिया।वो बेचारा तेरे प्यार में पागल उसने अपनी जान दे दी... "
कातिल बेखौफ चहलकदमी करता हुआ बोले जा रहा था।
"मैंने कुछ नहीं किया मुझे छोड़ दो मैंने किसी को धोखा नहीं दिया।प्लीज मुझे जाने दो!"
श्रेया ने एक बार फिर रोते और गिड़गिडाते हुए कहा पर उस कातिल की आँखों में दरिंदगी साफ झलक रही थी और उसने आखे बढ़कर अचानक से खंजर लहराया जो श्रेया गाल पर एक बड़ा और गहरा घाव करती चली गई।
श्रेया पागलों की तरह चिंघाड़ उठी जबकि वो आदमी खून से सना खंजर हवा में लहराता हुआ बुरी तरह ठहाका लगाकर हँस रहा था।
श्रेया के गाल पर से तेजी से रिसता हुआ खून संगमरमरी सफेद मार्बल के फर्श पर फैलता हुआ उसे लाल कर रहा था।
"कौन हो तुम?"
दर्द से चीखती बिलखती श्रेया ने उससे सवाल किया और बदले में कातिन उसे बुरी तरह घूरने लगा।
"मैं कौन हूँ मौत हूँ मैं तेरी!चल मरने से पहले अपनी मौत की शक्ल तो देखती जा!"
कहने के साथ ही उस कातिल ने अपने चेहरे पर से नकाब खींच कर दूर उछाल दिया।
"त.... त..... तुम इंस्पेक्टर....!"
श्रेया की लड़खड़ाती जुबान से सिर्फ इतना ही निकला खैर उसकी परवाह न करते हुए कातिल खंजर लेकर वापस उसकी ओर दौड़ पडा़ और इस बार श्रेया की मौत तय थी पर तभी यज हो गया।
अचानक भडा़क की जोरावर आवाज हुई और दरवाजा उखड़ कर सफेद मार्बल के फर्श फर गिर पड़ा।
उस दरवाजे के टूटने से उत्पन्न हुए आवाज की वजह से कातिल का सिर बिजली की सी फुर्ती से दरवाजे की ओर घूमा पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
धाँय!धाँय!
एक-दो सेकेंड के अंतराल पे दो गोलियाँ चली।पहली गोली का निशाना उस कातिल के हाथ में मौजूद खंजर था जो गोली की चोट से हवा में उड़ गया था।
और दूसरी गोली का निशाना उसकी छाती जहाँ से भल्ल-भल्ल करके गाढा़ लाल खून तेजी से बह रहा था।
वो रुद्र था जिसने गोली चलाई थी और ये इंस्पेक्टर शिवाजी था जो जमींन पर गिरा हुआ था।
उसके खून से भीगे हाथ उसकी छाती पर थे और वो तेजी से हिचकियाँ ले रहा था।
"शिवा!"
रुद्र के मुँह से सिर्फ यही लफ्ज निकल पाये और वो घुटने के बल जमीन पर गिर पड़ा जबकि उसकी धुँआ उगलती पिस्तौल भी उसके हाथ से छूटकर वहीं गिर पड़ी।
दोनों के आँखों में आँसू थे पर इंस्पेक्टर शिवाजी के चेहरे पर एक अजीब सा दर्द था जिसका उसकी छाती में मौजूद गोली से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था।
"भईया!हिच्च!आपको कब पता चला!"
हिचकियाँ भरते इंस्पेक्टर शिवाजी के मुँह से बस यही लफ्ज निकले।
"उसी दिन जिस दिन मैनें चौथी लड़की की के ब्वॉयफ्रेंड को जेल भिजवाया था ताकि तू मेरी तरफ से निश्चिंत हो सके पर मैं नहीं जानता था कि तू मेरा शिवा है मेरे छोटू का बचपन का दोस्त वही शिवा जो गलियों में झगड़ा करता था और फिर बचने के लिए मेरे पास आ जाता था और आज तू इतना बड़ा हो गया कि तूने चार-चार कत्ल कर दिये वो भी कानून का रखवाला बनकर।क्यों किया तूने ऐसा?"
रुद्र उसके करीब आता हुआ बोल पड़ा उसने अपने हाथों से उसकी छाती दबाकर खून बहना रोकना चाहा पर खून लगातार बह रहा था।
बेहिसाब दर्द सहने के बावजूद शिवा के चेहरे पर मुस्कान थी उसने अपनी जेब में हाथ डाला और एक कागज का टुकड़ा निकाल कर उसे रुद्र की ओर बढ़ा दिया।
रुद्र ने वो कागज का टुकड़ा लिया और उसे खोलने पर पता चला कि वो एक चिट्ठी थी शिवा के नाम काफी पुरानी।लिखावट देखते ही उसने फौरन पहचान ली वो उसके छोटू ने ही लिखी थी।

"शिवा तू जब ये चिट्ठी पढ़ रहा होगा तब तक मैं मर चुका होऊंगा।माफ करना यार इससे पहले मैं अपने हर काम में तुझे ही पार्टनर बनाता था पर इस बार बात कुछ और ही है।
भाई के अलावा अगर कोई मेरे सबसे ज्यादा करीब है तो वो तू ही है।तू मेरे बारे में सबकुछ जानता है ये भी कि किस तरह श्रेया ने प्रेम के नाम पर मुझे छला मेरा इस्तेमाल किया यार ये बात मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही मेरी जीने की इच्छा ही मर गई है।
इसीलिए मैं जा रहा हूँ पर जाने से पहले मैं तुझसे ये वादा लेना चाहता हूँ कि तू उसको ऐसा सबक सिखा कि प्यार में धोखा देने के बारे में सोचने वाली लड़कियों की रूह भी काँप उठे।मैं उससे इतना प्यार करता हूँ कि उसे अपने हाथों सजा नहीं दे पाऊँगा पर मैं चाहता हूँ तू ये काम करे।अलविदा मेरे दोस्त अपना रखना और भाई का भी।"

चिट्ठी के खत्म होते-होते रुद्र की आँखें पूरी तरह भीग चुकी थीं।
"अ.. अ.... आपको कैसे पता... "
शिवा ने रुद्र की ओर देखते हुए पूछा हालांकि इस बीच कई बार उसके मुँह से खून निकला।वहीं फर्श पर पड़ी श्रेया के चेहरे पर दुख और पश्चाताप के आँसू थे।
"तुम वाकई बहुत होशियार थे।तुमने हर बार बेहद सफाई से काम किया और तुम इस बार भी बच जाते अगर केस देसाई से ट्रांसफर होकर मेरे पास न आया होता।मैंनें आते ही पिलछले सारे मामलों की तहकीकात करनी शुरू कर दी और इस काम में मुझे तुम्हारे जूनियर जफर से बहुत मदद मिली।जल्दी  ही मैंनें कुछ बातें पता लगा लीं जैसे हत्यारे के खिलाफ सबूत पुख्ता थे जैसे कि फिंगर प्रिंट्स और फुट प्रिंट्स वगैरह जो कि बाद मे पता चला उस लड़के के थे जिसे हमने चौथे केस में गिरफ्तार किया था।
फिर मैंनें ध्यान दिया कि कातिल ने बेहद चालकी और सफाई से कत्ल किया था ऐसे में फिंगर प्रिंट्स और फुट प्रिंट्स वगैरह छोड़ना बेहद बचकानी हरकत लगी मुझे।
खैर मैंने पता लगाया और ये जानकर मुझे बेहद आश्चर्य हुआ कि वो लड़का बाकी तीनों लड़कियों को बिल्कुल भी नहीं जानता था पर ये नामुमकिन था क्योंकि चारो कात्ल किसी एक ही इंसान ने किये थे और फिर मैंने दो जुड़वा चाकुओं वाला दांव खेला जिनके बारे में सिर्फ मैं जानता था, वो लड़का जानता था और या फिर कातिल यानी तुम जबकि पुलिस रिपोर्ट में इसका कहीं भी जिक्र नहीं था क्योंकि इन्वेस्टिगेशन के दौरान उस चाकू का दूसरा जुड़वा मैंने रख लिया था और ये बात सिर्फ मुझे पता थी फिर इस हिसाब से तुम्हें उस चाकू के बारे में पता नहीं होना चाहिए था।इसके बाद मेरा शक तुम पर और भी गहरा हो गया और मैंनें एतिहात के तौर पर जफर को तुम्हारे पीछे लगा दिया और यहाँ तक पहुँच गया।"
रुद्र ने उसे सबकुछ बता दिया जबकि ये सब सुनकर आश्चर्यचकित हुआ दर्द में तड़पता शिवा मुस्कुरा रहा था।
"आप कमाल के हो भैया पर आपको ये कब पता चला कि मैं शिवा हूँ?"
उसकी प्रश्नवाचक निगाहें रुद्र के चेहरे पर जाकर ठहर गयीं।
"थोड़ी देर पहले जब तुमने मुझे फोन किया था उस समय मैं तुम्हारी ही फाइल पढ़ रहा था।"
रुद्र ने शांत मगर बेहद गंभीर लहजे में जवाब दिया।
"आह!"
अचानक इंस्पेक्टर शिवा के सीने में दर्द की तेज लहर उठी।
"म... मैं... जा रहा हूँ भईया अपना ख्याल रखना मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं है बस अफसोस इस बात का है कि मैं इसे खत्म नहीं कर पाया।अपने दोस्त से किया हुआ वादा पूरा नहीं कर पाया।इसे...."
पर इससे पहले कि वो और भी कुछ बोल पाता उसकी साँसों ने उसका साथ छोड़ दिया।धमनियां शांत पड़ गईं थीं और आत्मा शरीर छोड़ चुकी थी पर चेहरे पर अभी भी वो दर्द मौजूद था।
वहीं रुद्र की आँखोऔ से लगातार आँसू बहते जा रहे थे और हाथ में पिस्तौल पकडे़ हुए उसके हाथ बुरी तरह काँप रहे थे।
श्रेया निढाल होकर फर्श पर पड़ी थी और उसकी आँखें कुछ दूरी पर बेजान पडे़ शिवा के लाश पर टिकी हुई थीं।
अचानक उसने वायरलैस निकाला और आॅन कर दिया।
“हैलो!जफर टीम कहाँपर है?”
उसने धीरे से सवाल किया।
“जय हिंद सर सब बाहर ही हैं हमने चारों तरफ से बिल्डिंग को घेर लिया है वहाँ की सिचुएशन क्या है सर?”
वायरलेस पर दूसरी ओर से जफर की खरखराती सी आवाज़ उभरी और उसने सवाल किया।
“एवरीथिंग इज अंडर कंट्रोल जफर।“
रुद्र ने आराम से जवाब दिया।
“क्या वो जिंदा है सर मेरा मतलब इंस्पेक्टर शिवाजी!क्या वो जिंदा है?”
दूसरी ओर से जफर ने सवाल किया।
“अर... नहीं!मुझे गोली चलानी ही पडी़ पर यहाँ एक और गड़बड़ हो गई है।हमें यहाँ तक पहुंचने में देर हो गई इंस्पेक्टर ने अपना काम कर दिया।
“मतलब सर?”
“मैं उस लड़की को नहीं बचा पाया वो भी मारी गई!”
कहने के साथ ही रुद्र उस लड़की की तरफ़ मुडा़ और रुद्र की बातचीत सुनकर उसके चेहरे पर गहरे आश्चर्य का भाव आ गया।
“तुम टीम को ऊपर भेंज दो!”
कहने के साथ ही रुद्र ने वायरलैस आॅफ कर दिया और खूँखार निगाहों से श्रेया को घूरता हुआ पास पडे़ खंजर की ओर चल पड़ा।

                       The End

                                  Written By
                         Manish Pandey 'Rudra'

©manish/pandey/11-06-2018

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